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Moradabad News: दर्द का मरहम न मिर्गी की दवा, जांच रिपोर्ट भी 24 घंटे बाद
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मुरादाबाद। ठाकुरद्वारा के रतुपुरा निवासी अख्तर हुसैन 65 वर्ष के हैं। उन्हें अजीब ख्याल आते हैं और कभी-कभी दौरे पड़ते हैं। मंगलवार को मानसिक रोग विशेषज्ञ को दिखाने के बाद जब वह जिला अस्पताल की डिस्पेंसरी में पहुंचे तो उन्हें सिर्फ एंटी एसिड कैप्सूल थमा दिए गए। मानसिक रोग की दवा नहीं मिली।
मरीज के मुताबिक स्वास्थ्य कर्मियों ने उनसे कहा कि यह दवा बाहर मिलेगी। इसी तरह हरथला निवासी मो. मंसूर अपने 12 साल के बेटे अहान को लेकर ओपीडी पहुंचे। डॉक्टर ने बच्चे के लिए एंटीबायोटिक और दर्द की दवा लिखी। यह दवाएं उन्हें अस्पताल की डिस्पेंसरी से नहीं मिलीं। मरीज जब शिकायत लेकर डॉक्टर के पास पहुंचे तो उन्होंने कहा कि दवा भरपूर है। अस्पताल प्रबंधन का दावा भी यही है लेकिन इसके विपरीत मरीजों को बिना दवा के लौटाया जा रहा है। वह बाहर के निजी मेडिकल स्टोर से दवा खरीदने को मजबूर हैं। जिला अस्पताल में रोजाना औसतन 1600 मरीज आते हैं। ऐसे में सरकारी दवा न मिलने से निजी विक्रेताओं को भी मुनाफा हो रहा है। कुछ डॉक्टर पर्चे से अलग बाहर की दवा भी लिख रहे हैं।
बुधवार को अपनी 12 साल की बेटी सृष्टि पाल की दवा लेने जिला अस्पताल पहुंचे रघुवीर ने बताया कि बच्ची को भूख कम लगती है। डॉक्टर ने विटामिन, प्रोबायोटिक टैबलेट लिखी हैं, यह तो अस्पताल में मिल गईं लेकिन जो सीरप लिखा है वह बाहर से लेना पड़ेगा। स्टाफ का कहना है कि अस्पताल में बच्चों का यह सीरप नहीं है।
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डिप्टी सीएम का आदेश दरकिनार, निजी एंबुलेंस पर नकेल नहीं (फोटो)
डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक का आदेश है कि सरकारी अस्पतालों में निजी एंबुलेंस नहीं खड़ी होनी चाहिए। जबकि मंगलवार को एक निजी एंबुलेंस चालक डेढ़ घंटे तक वाहन लेकर अस्पताल परिसर में खड़ा रहा। मीडिया द्वारा फोटो खींचे जाने के बाद उसने एंबुलेंस को वहां से हटाया। मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि अस्पताल में यदि मरीज की मौत होती है तो शव को घर तक पहुंचाने के लिए निजी वाहन चालक परिजनों से सौदेबाजी करते हैं।
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डायलिसिस के लिए निजी अस्पताल में लगवाना पड़ता है फिस्टुला
जिला अस्पताल में 10 बेड की डायलिसिस यूनिट चल रही है। इनमें दो बेड हेपेटाइटिस के मरीजों के लिए आरक्षित हैं। वर्क लोड ज्यादा होने के कारण कई मरीजों को बेड नहीं मिल पाता। इसके अलावा डायलिसिस की प्रक्रिया शुरू करने के लिए मरीज को निजी अस्पताल में जाकर फिस्टुला लगवाना पड़ता है। धमनी व शिरा को आपस में जोड़ने के लिए जिला अस्पताल में यह व्यवस्था नहीं है। मरीज गर्दन व हाथ में फिस्टुला लगवाने निजी अस्पताल जाते हैं।
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लिखित रिपोर्ट नहीं, फिल्म के लिए 24 घंटे इंतजार
सीटी स्कैन कराने वाले मरीजों को रेडियोलॉजिस्ट की रिपोर्ट के लिए 24 घंटे इंतजार करना पड़ता है। अस्पताल में एक ही रेडियोलॉजिस्ट डॉ. निर्मल ओझा तैनात हैं। 12 बजे के बाद वह एक्सरे व अल्ट्रासाउंड सेंटर में बैठते हैं। ऐसे में मरीजों की जांच टेक्नीशियन करते हैं। उन्हें रिपोर्ट अगले दिन दिन मिलती है, जब रेडियोलॉजिस्ट के हस्ताक्षर हो जाते हैं। अस्पताल में कंप्यूटर सिस्टम औ स्टाफ की किल्लत के कारण लिखित रिपोर्ट नहीं मिलती। रेडियोलॉजिस्ट एक सामान्य कागज पर कुछ लाइन लिखकर देते हैं, जिसे समझना जिला अस्पताल के डॉक्टरों के लिए ही मुश्किल होता है।
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अस्पताल में पर्याप्त दवाएं हैं। स्टाफ को निर्देशित किया है कि मरीज को दवा का सब्सटीट्यूट दें लेकिन वापस न भेजें। डॉक्टरों को भी कहा गया है कि निजी मेडिकल स्टोर से दवा न लिखें। ऐसी कोई शिकायत आएगी तो संबंधित के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
- डॉ. संगीता गुप्ता, एसआईसी, जिला अस्पताल
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मरीज के मुताबिक स्वास्थ्य कर्मियों ने उनसे कहा कि यह दवा बाहर मिलेगी। इसी तरह हरथला निवासी मो. मंसूर अपने 12 साल के बेटे अहान को लेकर ओपीडी पहुंचे। डॉक्टर ने बच्चे के लिए एंटीबायोटिक और दर्द की दवा लिखी। यह दवाएं उन्हें अस्पताल की डिस्पेंसरी से नहीं मिलीं। मरीज जब शिकायत लेकर डॉक्टर के पास पहुंचे तो उन्होंने कहा कि दवा भरपूर है। अस्पताल प्रबंधन का दावा भी यही है लेकिन इसके विपरीत मरीजों को बिना दवा के लौटाया जा रहा है। वह बाहर के निजी मेडिकल स्टोर से दवा खरीदने को मजबूर हैं। जिला अस्पताल में रोजाना औसतन 1600 मरीज आते हैं। ऐसे में सरकारी दवा न मिलने से निजी विक्रेताओं को भी मुनाफा हो रहा है। कुछ डॉक्टर पर्चे से अलग बाहर की दवा भी लिख रहे हैं।
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बुधवार को अपनी 12 साल की बेटी सृष्टि पाल की दवा लेने जिला अस्पताल पहुंचे रघुवीर ने बताया कि बच्ची को भूख कम लगती है। डॉक्टर ने विटामिन, प्रोबायोटिक टैबलेट लिखी हैं, यह तो अस्पताल में मिल गईं लेकिन जो सीरप लिखा है वह बाहर से लेना पड़ेगा। स्टाफ का कहना है कि अस्पताल में बच्चों का यह सीरप नहीं है।
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डिप्टी सीएम का आदेश दरकिनार, निजी एंबुलेंस पर नकेल नहीं (फोटो)
डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक का आदेश है कि सरकारी अस्पतालों में निजी एंबुलेंस नहीं खड़ी होनी चाहिए। जबकि मंगलवार को एक निजी एंबुलेंस चालक डेढ़ घंटे तक वाहन लेकर अस्पताल परिसर में खड़ा रहा। मीडिया द्वारा फोटो खींचे जाने के बाद उसने एंबुलेंस को वहां से हटाया। मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि अस्पताल में यदि मरीज की मौत होती है तो शव को घर तक पहुंचाने के लिए निजी वाहन चालक परिजनों से सौदेबाजी करते हैं।
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डायलिसिस के लिए निजी अस्पताल में लगवाना पड़ता है फिस्टुला
जिला अस्पताल में 10 बेड की डायलिसिस यूनिट चल रही है। इनमें दो बेड हेपेटाइटिस के मरीजों के लिए आरक्षित हैं। वर्क लोड ज्यादा होने के कारण कई मरीजों को बेड नहीं मिल पाता। इसके अलावा डायलिसिस की प्रक्रिया शुरू करने के लिए मरीज को निजी अस्पताल में जाकर फिस्टुला लगवाना पड़ता है। धमनी व शिरा को आपस में जोड़ने के लिए जिला अस्पताल में यह व्यवस्था नहीं है। मरीज गर्दन व हाथ में फिस्टुला लगवाने निजी अस्पताल जाते हैं।
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लिखित रिपोर्ट नहीं, फिल्म के लिए 24 घंटे इंतजार
सीटी स्कैन कराने वाले मरीजों को रेडियोलॉजिस्ट की रिपोर्ट के लिए 24 घंटे इंतजार करना पड़ता है। अस्पताल में एक ही रेडियोलॉजिस्ट डॉ. निर्मल ओझा तैनात हैं। 12 बजे के बाद वह एक्सरे व अल्ट्रासाउंड सेंटर में बैठते हैं। ऐसे में मरीजों की जांच टेक्नीशियन करते हैं। उन्हें रिपोर्ट अगले दिन दिन मिलती है, जब रेडियोलॉजिस्ट के हस्ताक्षर हो जाते हैं। अस्पताल में कंप्यूटर सिस्टम औ स्टाफ की किल्लत के कारण लिखित रिपोर्ट नहीं मिलती। रेडियोलॉजिस्ट एक सामान्य कागज पर कुछ लाइन लिखकर देते हैं, जिसे समझना जिला अस्पताल के डॉक्टरों के लिए ही मुश्किल होता है।
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अस्पताल में पर्याप्त दवाएं हैं। स्टाफ को निर्देशित किया है कि मरीज को दवा का सब्सटीट्यूट दें लेकिन वापस न भेजें। डॉक्टरों को भी कहा गया है कि निजी मेडिकल स्टोर से दवा न लिखें। ऐसी कोई शिकायत आएगी तो संबंधित के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
- डॉ. संगीता गुप्ता, एसआईसी, जिला अस्पताल