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कहीं आपके लाडले को भी बीमार न कर दे स्मार्ट फोन
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
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स्मार्ट फोन बच्चों को स्मार्ट बनाने के साथ बीमार भी बना रहा है। स्मार्ट फोन बच्चों को उनकी मित्र मंडली ही नहीं बल्कि परिवार से दूर कर रहा है। बच्चों के व्यवहार में बदलाव आ रहा है। चिड़चिड़ापन और डिप्रेशन के शिकार बच्चे मानसिक बीमार हो रहे हैं। जिला अस्पताल के मानसिक रोग विभाग में जनवरी महीने में 101 मरीज पहुंचे हैं। कई लोगों की ‘मोबाइल नशा मुक्ति केंद्र’ में काउंसलिंग हो रही है। इनमें युवाओं के साथ किशोर भी शामिल हैं।
चिकित्सा अधीक्षक डा. राजेंद्र कुमार बताते हैं, अस्पताल में 618 लोगों का नियमित इलाज चल रहा है। जनवरी में ही 101 मरीज पहुंचे हैं। इनमें हर उम्र के लोग शामिल हैं। अस्पताल पहुंचने वाले 224 लोगों के मन में आत्महत्या जैसा कदम उठाने के विचार आते हैं। काउंसलिंग में इसका खुलासा हुआ है। काउंसलिंग के आधार पर मरीजों का इलाज चल रहा है। डा. राजेंद्र बताते हैं मरीजों में किशोर और युवाओं की संख्या बढ़ रही है। स्मैक और इंजेक्शन के अलावा स्मार्ट फोन के नशे की आदत किशोर और युवाओं को अस्पताल पहुंचा रहा है।
मोबाइल नशा मुक्ति केंद्र के डा. एलके गुप्ता बताते हैं, बच्चे स्मार्ट फोन पर गेम खेलने और युवा सोशल मीडिया पर अपना अधिक वक्त दे रहे हैं। अभिभावकों की ओर से डांटने पर किशोर डिप्रेशन में आ रहे हैं। अस्पताल की ओपीडी से ऐसे किशोर और युवाओं को काउंसलिंग के लिए मोबाइल नशा मुक्ति केंद्र भेजा जा रहा है। काउंसलिंग में अभिभावक बताते हैं, बच्चा स्कूल का होम वर्क पूरा नहीं करता है। डांट फटकार का भी असर नहीं होता है। मोबाइल छीनने पर गुमसुम हो जाता है। परिवार ही नहीं किसी दोस्त से भी बात नहीं करता है। डा. गुप्ता बताते हैं, किशोरों और युवाओं में ये सभी लक्षण मोबाइल के नशे के चलते डिप्रेशन के हैं।
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सीएमएस डा. ज्योत्सना पंत बताती हैं, स्मार्ट फोन कई तरह की बीमारियां बांट रहा है। स्मार्ट फोन का नशा मानसिक और शारीरिक विकास में बाधक बन रहा है। अधिकतर समय फोन पर बीतने से नींद पूरी नहीं हो रही है। इससे आंखें कमजोर होने के साथ गर्दन की शिकायत लेकर लोग ओपीडी पहुंच रहे हैं। इनमें कई लोग मानसिक बीमारी की श्रेणी में हैं। उनकी काउंसलिंग और इलाज किया जा रहा है।
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चिकित्सा अधीक्षक डा. राजेंद्र कुमार बताते हैं, अस्पताल में 618 लोगों का नियमित इलाज चल रहा है। जनवरी में ही 101 मरीज पहुंचे हैं। इनमें हर उम्र के लोग शामिल हैं। अस्पताल पहुंचने वाले 224 लोगों के मन में आत्महत्या जैसा कदम उठाने के विचार आते हैं। काउंसलिंग में इसका खुलासा हुआ है। काउंसलिंग के आधार पर मरीजों का इलाज चल रहा है। डा. राजेंद्र बताते हैं मरीजों में किशोर और युवाओं की संख्या बढ़ रही है। स्मैक और इंजेक्शन के अलावा स्मार्ट फोन के नशे की आदत किशोर और युवाओं को अस्पताल पहुंचा रहा है।
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मोबाइल नशा मुक्ति केंद्र के डा. एलके गुप्ता बताते हैं, बच्चे स्मार्ट फोन पर गेम खेलने और युवा सोशल मीडिया पर अपना अधिक वक्त दे रहे हैं। अभिभावकों की ओर से डांटने पर किशोर डिप्रेशन में आ रहे हैं। अस्पताल की ओपीडी से ऐसे किशोर और युवाओं को काउंसलिंग के लिए मोबाइल नशा मुक्ति केंद्र भेजा जा रहा है। काउंसलिंग में अभिभावक बताते हैं, बच्चा स्कूल का होम वर्क पूरा नहीं करता है। डांट फटकार का भी असर नहीं होता है। मोबाइल छीनने पर गुमसुम हो जाता है। परिवार ही नहीं किसी दोस्त से भी बात नहीं करता है। डा. गुप्ता बताते हैं, किशोरों और युवाओं में ये सभी लक्षण मोबाइल के नशे के चलते डिप्रेशन के हैं।
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सीएमएस डा. ज्योत्सना पंत बताती हैं, स्मार्ट फोन कई तरह की बीमारियां बांट रहा है। स्मार्ट फोन का नशा मानसिक और शारीरिक विकास में बाधक बन रहा है। अधिकतर समय फोन पर बीतने से नींद पूरी नहीं हो रही है। इससे आंखें कमजोर होने के साथ गर्दन की शिकायत लेकर लोग ओपीडी पहुंच रहे हैं। इनमें कई लोग मानसिक बीमारी की श्रेणी में हैं। उनकी काउंसलिंग और इलाज किया जा रहा है।