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हितेश के फेफड़ों के ट्रांसप्लांट की राह में कई चुनौतियां
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मुरादाबाद। फिल्म अभिनेता सोनू सूद की मदद से नोएडा से हैदराबाद पहुंचे हितेश के फेफड़ों के ट्रांसप्लांट की राह में अभी कई चुनौतियां हैं। इसकी वजह ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया का जटिल होना है। साथ ही फेफड़ों का इंतजाम, साइज, आर्गन मैचिंग समेत अन्य बिंदुओं पर खरा उतराना चुनौती है।
डाक्टरों के मुताबिक फेफड़ों के ट्रांसप्लांट के मामले बहुत कम होते हैं। हालांकि, कोरोना संक्रमण काल में देश में ट्रांसप्लांट केस बढ़े हैं। अभी फेफड़ों का ट्रांसप्लांट दिल्ली, हैदराबाद और चेन्नई में होता है। यह बहुत खर्चीला होता है। ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया भी बहुत जटिल होती है। इसमें कई फैक्टर काम करते हैं। मृत व्यक्ति के फेफड़ों का ट्रांसप्लांट किया जाता है। इसमें आर्गन मैचिंग सबसे बड़ी चुनौती होती है। इसके अलावा फेफड़ों का साइज, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता आदि बिंदु भी महत्वपूर्ण हैं। जिस व्यक्ति का फेफड़ा लिया जाता है, उसकी केस हिस्ट्री भी देखी जाती है। फिलहाल हैदराबाद के डाक्टर हितेश की सेहत पर नजर बनाए हुए हैं।
- फेफड़ों का ट्रांसप्लांट बहुत कम होता है। यह काफी जटिल होता है। यह कैडेवरी ट्रांसप्लांट होता है। मृत व्यक्ति के फेफड़ों का ट्रांसप्लांट किया जाता है। ट्रांसप्लांट में दस से चौदह घंटे का समय लगता है। - डा. प्रवीण शाह, आईसीयू इंचार्ज, एल टू अस्पताल एमसीएच विंग
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- कोरोना संकमण काल में फेफड़ों के ट्रांसप्लांट के मामले बढ़े हैं। ट्रांसप्लांट के हालात तब पैदा होते हैं, जबकि मरीज के दोनों फेफड़े पूरी तरह से काम करना बंद कर दें। ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया बहुत जटिल होती है। - डा. अजीम इकबाल, चेस्ट फिजीशियन
मरीज को ईसीएमओ मशीन पर रखा जाता है
मुरादाबाद। डाक्टरों के मुताबिक जब फेफड़े पूरी तरह काम करना बंद कर देते हैं तो मरीज को ईसीएमओ (एक्स्ट्रा कॉरपोरियल मैम्ब्रेन ऑक्सीजेनेशन) मशीन में रखा जाता है। जो मरीज को ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है।
आठ मौतों से हितेश के दिल में बैठ गया था डर
मुरादाबाद। हैदराबाद में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे शहर के हितेश शर्मा मोहल्ले में संक्रमण से हुई आठ मौतों से दहशत में आ गए थे। संक्रमित होने पर अपने दूसरे घर में शिफ्ट हो गए थे। हालत बिगड़ने पर वह खुद निजी अस्पताल में जाकर भर्ती हो गए थे। उनका अप्रैल से इलाज चल रहा है।
कोरोना की दूसरी लहर से देश में हाहाकार मचा रहा। गांव से लेकर शहर तक संक्रमण फैला रहा। इस संक्रमण से शहर की रामस्वरूप कालोनी भी नहीं बच पाई। मोहल्ले के लोगों का कहना है कि कालोनी में शायद ही कोई ऐसा परिवार बचा हो, जिनके यहां कोई सदस्य संक्रमित न हुआ हो। पूरी कालोनी संक्रमण की जद में थी। इससे हितेश शर्मा का परिवार भी अछूता नहीं रहा। अप्रैल में हितेश की रिपोर्ट पॉजिटिव आई। शुरुआत में हितेश ने खुद को परिवार से अलग कर दूसरे घर में शिफ्ट हो गए। इस बीच परिवार अन्य सदस्य भी संक्रमित हो गए। इस दौरान संक्रमण से कालोनी में एक के बाद एक आठ लोगों की जान चली गई, जिसे लेकर हितेश के दिल में डर बैठ गया। इससे संक्रमण का प्रभाव शरीर पर बढ़ता गया। तबीयत बिगड़ने लगी तो हितेश खुद शहर के एक निजी अस्पताल में जाकर भर्ती हो गए। बाद में उन्हें नोएडा के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। संक्रमण अधिक होने पर उनके दोनों फेफड़े खराब हो गए। 11 जुलाई को बहन की मदद की लगाई गुहार पर फिल्म अभिनेता सोनू सूद ने फेफड़ों के ट्रांसप्लांट के लिए हितेश को एयर एंबुलेंस से यशोदा अस्पताल हैदराबाद में शिफ्ट कराया है।
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डाक्टरों के मुताबिक फेफड़ों के ट्रांसप्लांट के मामले बहुत कम होते हैं। हालांकि, कोरोना संक्रमण काल में देश में ट्रांसप्लांट केस बढ़े हैं। अभी फेफड़ों का ट्रांसप्लांट दिल्ली, हैदराबाद और चेन्नई में होता है। यह बहुत खर्चीला होता है। ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया भी बहुत जटिल होती है। इसमें कई फैक्टर काम करते हैं। मृत व्यक्ति के फेफड़ों का ट्रांसप्लांट किया जाता है। इसमें आर्गन मैचिंग सबसे बड़ी चुनौती होती है। इसके अलावा फेफड़ों का साइज, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता आदि बिंदु भी महत्वपूर्ण हैं। जिस व्यक्ति का फेफड़ा लिया जाता है, उसकी केस हिस्ट्री भी देखी जाती है। फिलहाल हैदराबाद के डाक्टर हितेश की सेहत पर नजर बनाए हुए हैं।
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- फेफड़ों का ट्रांसप्लांट बहुत कम होता है। यह काफी जटिल होता है। यह कैडेवरी ट्रांसप्लांट होता है। मृत व्यक्ति के फेफड़ों का ट्रांसप्लांट किया जाता है। ट्रांसप्लांट में दस से चौदह घंटे का समय लगता है। - डा. प्रवीण शाह, आईसीयू इंचार्ज, एल टू अस्पताल एमसीएच विंग
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- कोरोना संकमण काल में फेफड़ों के ट्रांसप्लांट के मामले बढ़े हैं। ट्रांसप्लांट के हालात तब पैदा होते हैं, जबकि मरीज के दोनों फेफड़े पूरी तरह से काम करना बंद कर दें। ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया बहुत जटिल होती है। - डा. अजीम इकबाल, चेस्ट फिजीशियन
मरीज को ईसीएमओ मशीन पर रखा जाता है
मुरादाबाद। डाक्टरों के मुताबिक जब फेफड़े पूरी तरह काम करना बंद कर देते हैं तो मरीज को ईसीएमओ (एक्स्ट्रा कॉरपोरियल मैम्ब्रेन ऑक्सीजेनेशन) मशीन में रखा जाता है। जो मरीज को ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है।
आठ मौतों से हितेश के दिल में बैठ गया था डर
मुरादाबाद। हैदराबाद में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे शहर के हितेश शर्मा मोहल्ले में संक्रमण से हुई आठ मौतों से दहशत में आ गए थे। संक्रमित होने पर अपने दूसरे घर में शिफ्ट हो गए थे। हालत बिगड़ने पर वह खुद निजी अस्पताल में जाकर भर्ती हो गए थे। उनका अप्रैल से इलाज चल रहा है।
कोरोना की दूसरी लहर से देश में हाहाकार मचा रहा। गांव से लेकर शहर तक संक्रमण फैला रहा। इस संक्रमण से शहर की रामस्वरूप कालोनी भी नहीं बच पाई। मोहल्ले के लोगों का कहना है कि कालोनी में शायद ही कोई ऐसा परिवार बचा हो, जिनके यहां कोई सदस्य संक्रमित न हुआ हो। पूरी कालोनी संक्रमण की जद में थी। इससे हितेश शर्मा का परिवार भी अछूता नहीं रहा। अप्रैल में हितेश की रिपोर्ट पॉजिटिव आई। शुरुआत में हितेश ने खुद को परिवार से अलग कर दूसरे घर में शिफ्ट हो गए। इस बीच परिवार अन्य सदस्य भी संक्रमित हो गए। इस दौरान संक्रमण से कालोनी में एक के बाद एक आठ लोगों की जान चली गई, जिसे लेकर हितेश के दिल में डर बैठ गया। इससे संक्रमण का प्रभाव शरीर पर बढ़ता गया। तबीयत बिगड़ने लगी तो हितेश खुद शहर के एक निजी अस्पताल में जाकर भर्ती हो गए। बाद में उन्हें नोएडा के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। संक्रमण अधिक होने पर उनके दोनों फेफड़े खराब हो गए। 11 जुलाई को बहन की मदद की लगाई गुहार पर फिल्म अभिनेता सोनू सूद ने फेफड़ों के ट्रांसप्लांट के लिए हितेश को एयर एंबुलेंस से यशोदा अस्पताल हैदराबाद में शिफ्ट कराया है।