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जीत के बाद की भूल का दर्द झेलते हैं वीर सैनिक

Moradabad  Bureau मुरादाबाद ब्यूरो
Updated Thu, 16 Dec 2021 12:39 AM IST
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Heroic soldiers bear the pain of mistake after victory
मुरादाबाद। भारत और पाकिस्तान के बीच 1971 का युद्ध मात्र 13 दिन चला था। तीन दिसंबर से शुरू हुआ युद्ध 16 दिसंबर को समाप्त हो गया। महज 13 दिन चले इस युद्ध के दौरान भारतीय जांबाज पूरी बहादुरी के साथ लड़े थे। युद्ध के दौरान लगने वाले भारत माता के जयकारे उनके उत्साह को और बढ़ा देते थे। उनके साहस का ही परिणाम है कि 91 हजार पाकिस्तानी सैनिक बंदी बना लिए गए थे। वीरयोद्धा जीएमडी रोड निवासी सूबेदार नारायण कृष्ण ने बताया कि यदि तभी सैनिकों को रिहा करने के बदले पीओके मांग लेते तो आतंकवादी घटनाओं के रूप में सैनिकों को बार-बार मिलने वाला दर्द नहीं झेलना पड़ता।
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देश की तरफ से चार युद्ध लड़ने वाले सूबेदार नारायण कृष्ण का कहना है कि बांग्लादेश राष्ट्र गठन के समय भारत सरकार को 90 हजार सैनिक रिहा करने से पहले पीओके वापस लेने की शर्त रखनी चाहिए थी। उन्होंने बताया कि परिवार से किसी एक सदस्य को सेना में भेजना आवश्यक था। ऐसे में उनके परिजनों ने देश सेवा के लिए 14 आयु वर्ष में 1956 में सेना में भर्ती होने के लिए भेज दिया था। उन्होंने सेना सेवा के दौरान सैनिक के रूप में 1961 में गोवा को पुर्तगाल से आजाद कराने की लड़ाई में सहयोग दिया। वर्ष 1962 में उनकी तैनाती कश्मीर में दुर्गमूला में थी। चीन के साथ हुए युद्ध में वह मोर्टार रेजीमेंट में थे।
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कराची पहुंचकर तेल डिपो में लगाई थी आग :
नारायण कृष्ण के अनुसार 12 अगस्त वर्ष 1965 में वह कुपवाड़ा में तैनात थे। उस युद्ध में उन्होंने पाकिस्तान का बहुत ज्यादा हिस्सा कब्जा लिया था, लेकिन ताशकंद समझौते के बाद भारत ने जमीन पाकिस्तान को वापस कर दी। वर्ष 1971 में वह जम्मू में तैनात थे। तीन दिसंबर को पाकिस्तान ने हमला किया और छह दिसंबर को पाकिस्तानी एयरफोर्स आगरा तक आ गई थी, लेकिन सेना ने रणनीति बनाते हुए भारतीय नौसेना के साथ मिलकर करारा जवाब दिया और कराची पहुंचकर तेल डिपो में आग लगा दी। थल सेना बॉर्डर पर पाकिस्तानी सैनिकों से लोहा ले रही थी। रात में मोर्चों में रहते थे। लगातार फायरिंग होती थी। साथ में करीब 25 साथी थे।
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बकौल नारायण कृष्ण, वह सेना के तकनीकी विभाग में थे। युद्ध के दौरान सैनिकों के हथियारों में आई कमी को तुरंत दूर कर रहे थे। उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी सेना का निशाना तकनीकी विभाग था, ताकि उनके हमले में भारतीय सेना असहाय हो जाए, लेकिन भारतीय सेना ने जोश और जुनून का परिचय देते हुए 90 हजार सैनिकों का आत्मसमर्पण कराया। उन्होंने कहा कि भारत सरकार के पास यह एक स्वर्णिम मौका था, जब पाकिस्तान को ताशकंद समझौते में वापस की गई पीओके की जमीन पर कब्जा किया जा सकता था और वर्तमान समस्या हमेशा के लिए खत्म हो जाती। अब पीओके भारत का अभिन्न अंग होता।
बहादुरी के मिले हैं सात पदक
नारायण कृष्ण ने चार युद्धों में भाग लिया है। सेना में दिए जाने वाले योगदानों को देखकर राष्ट्रपति द्वारा दो सेना सेवा पदक सहित सात पदकों से सम्मानित किया जा चुका है।

घर फ्रीहोल्ड करवाने को लगा रहे चक्कर
भले ही चार युद्धों में नारायण कृष्ण ने वीरता का परिचय दिया हो, लेकिन अब नारायण कृष्ण अपने मकान को नगर निगम से फ्रीहोल्ड करवाने के लिए विभागों के चक्कर लगा रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनके पिता ने मकान को लीज पर लिया था। सेना में दिए गए योगदान को देखते हुए जिला प्रशासन को यह मकान फ्री होल्ड कर देना चाहिए। इसके लिए वह नगर निगम, जिला अधिकारी और लखनऊ तक प्रार्थना पत्र दे चुके हैं। लखनऊ से भी उनकी समस्या के समाधान के निर्देश दिए गए हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर अभी तक इसको हल नहीं किया गया है।
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