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Moradabad News: चार साल में एमआरआई नहीं दे पाई सरकार, मरीज लाचार

Moradabad  Bureau मुरादाबाद ब्यूरो
Updated Fri, 11 Jul 2025 01:32 AM IST
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Government could not provide MRI in four years, patients are helpless
मुरादाबाद। जिला अस्पताल में एमआरआई भवन बने चार साल बीत गए हैं। अब तक यहां एमआरआई मशीन नहीं लग पाई है। जरूरतमंद मरीजों को इस महंगी जांच के लिए निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है। जहां 10 से 20 हजार रुपये खर्च हो जाते हैं। अस्पताल में रेडियोलॉजिस्ट की तैनाती भी नहीं हो सकी है।
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प्रतिदिन होने वाले 150 से ज्यादा एक्स-रे, 50 अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन के लिए सिर्फ एक रेडियोलॉजिस्ट डॉ. निर्मल ओझा तैनात हैं। शेष दो पद रिक्त चल रहे हैं। इसलिए एमआरआई मशीन के साथ रेडियोलॉजिस्ट की नियुक्ति भी जरूरी है। अस्पताल में प्रतिदिन औसतन 1800 से 2000 मरीजों की ओपीडी होती है। 200 मरीज हड्डी वार्ड में और 400 मेडिसिन वार्ड में और 100 से ज्यादा मनोरोग विभाग में आते हैं। अस्पताल के मेडिसिन और ऑर्थोपेडिक विभाग में तैनात डॉक्टरों के मुताबिक रोजाना करीब 12 मरीजों को एमआरआई की जरूरत पड़ती है। इन मरीजों को मेरठ मेडिकल कॉलेज रेफर करना पड़ता है। वहां 15 दिन बाद नंबर आता है। ऐसे में प्राइवेट अस्पताल में जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। लोगों के बीच से सवाल उठ रहे हैं कि चार साल में सरकार एमआरआई मशीन क्यों नहीं खरीद पाई। विभागीय जानकारों का कहना है कि सरकार के लिए रेडियोलॉजिस्ट की तैनाती एक चुनौती है। इसलिए अस्पतालों में एमआरआई मशीनें नहीं आई हैं।
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शहर में नौ निजी एमआरआई सेंटर, हर दिन 200 जांच
स्वास्थ्य विभाग के डाटा के मुताबिक शहर में नौ निजी एमआरआई सेंटर हैं। इनमें हर दिन कुल 200 लोग जांच करा रहे हैं। जिला अस्पताल से डॉक्टर के लिखने पर जरूरतमंद मरीजों को भी यहीं जाना पड़ता है। जिला अस्पताल में सिर्फ सीटी स्कैन की सुविधा है। उस पर भी 500 रुपये सरकारी शुल्क है। सिर के सीटी स्कैन के अलावा अन्य किसी हिस्से की स्कैनिंग नहीं हो पाती है। जबकि रामपुर के जिला अस्पताल में लोगों को सीटी स्कैन सुविधा निशुल्क मिलती है। सरकारी दरों पर या निशुल्क एमआरआई के लिए मरीजों को मेरठ मेडिकल कॉलेज जाना पड़ता है।
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बिना एमआरआई भर्ती नहीं हुआ मरीज, चली गई जान
सीतापुरी निवासी हरिओम सैनी को 28 मई को एक आवारा कुत्ते ने गंभीर रूप से काट लिया। जिला अस्पताल में एआरवी लगाने के बाद उन्हें मेरठ मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया। हरिओम के बेटे प्रेम सैनी के मुताबिक वहां डॉक्टरों ने बिना एमआरआई के भर्ती करने से मना कर दिया। एमआरआई के लिए उन्हें 15 दिन बाद की तारीख मिली। रुपयों के अभाव में वह निजी सेंटर पर जांच नहीं करा सके। 15 दिन बाद हालत और बिगड़ गई। अंतत: 27 दून को हरिओम की मौत हो गई।


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एमआरआई मशीन की खरीद शासन स्तर पर की जानी है। जिला स्तर पर जो जानकारी मांगी जाती है, उसका जवाब भेज दिया जाता है। यहां एमआरआई मशीन न होने की जानकारी स्वास्थ्य निदेशालय को भी है। मशीन कब तक आएगी। इसके बारे में नहीं कहा जा सकता।
- डॉ. संगीता गुप्ता, प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक
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