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भगवान के शरणागत रहते हुए मानव
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मुरादाबाद। मानव को भगवान के शरणागत रहते हुए जीवन व्यतीत करना चाहिए। ये प्रवचन रविवार को कथा व्यास धीरशांत दास अर्द्धमौनी ने शिव मंदिर, हरे कृष्ण चौक, नवीन नगर में आयोजित श्रीरामकथा के विश्राम दिवस पर दिए।
कथा व्यास धीरशांत ने कहा कि हम मनुष्य हैं, इसलिए धर्म की साधना के साधनों में शरीर सर्वप्रथम साधन है। शरीर के बिना धर्म की साधना हो ही नहीं सकती। हमारे शास्त्रों ने मनुष्य के लिए चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष बताए गए हैं। इनमें से बीच के दो-अर्थ और काम तो अधिकांश में प्रारब्ध के अधीन हैं, क्योंकि शरीर सुख-दु:ख का भोग भोगने के लिए उत्पन्न होता है। इस कारण वह भोग जन्म के साथ ही निर्मित हुआ होता है। इस बात को समझाते हुए प्रह्लादजी कहते हैं कि तुम को ईश्वर की शरण लेकर सुख-दु:ख में समान रहना सीखना चाहिए। क्योंकि सुख और दु:ख दोनों अपने ही किए हुए कर्मों के फलस्वरूप में जन्म के साथ ही निर्मित हुए होते हैं। जैसे दु:ख अनायास आ जाता है, वैसा ही सुख के लिए भी समझना चाहिए, क्योंकि दोनों का निर्माण दैव के द्वारा ही हुआ होता है। इस दौरान सुमित अग्रवाल, रेखा शर्मा, अजय शर्मा, ममता शर्मा, सुमित अग्रवाल, सोमनाथ पोपली, राजीव शर्मा, संजय स्वामी, सारिका अग्रवाल, अखिल टंडन आदि मौजूद रहे। ब्यूरो
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कथा व्यास धीरशांत ने कहा कि हम मनुष्य हैं, इसलिए धर्म की साधना के साधनों में शरीर सर्वप्रथम साधन है। शरीर के बिना धर्म की साधना हो ही नहीं सकती। हमारे शास्त्रों ने मनुष्य के लिए चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष बताए गए हैं। इनमें से बीच के दो-अर्थ और काम तो अधिकांश में प्रारब्ध के अधीन हैं, क्योंकि शरीर सुख-दु:ख का भोग भोगने के लिए उत्पन्न होता है। इस कारण वह भोग जन्म के साथ ही निर्मित हुआ होता है। इस बात को समझाते हुए प्रह्लादजी कहते हैं कि तुम को ईश्वर की शरण लेकर सुख-दु:ख में समान रहना सीखना चाहिए। क्योंकि सुख और दु:ख दोनों अपने ही किए हुए कर्मों के फलस्वरूप में जन्म के साथ ही निर्मित हुए होते हैं। जैसे दु:ख अनायास आ जाता है, वैसा ही सुख के लिए भी समझना चाहिए, क्योंकि दोनों का निर्माण दैव के द्वारा ही हुआ होता है। इस दौरान सुमित अग्रवाल, रेखा शर्मा, अजय शर्मा, ममता शर्मा, सुमित अग्रवाल, सोमनाथ पोपली, राजीव शर्मा, संजय स्वामी, सारिका अग्रवाल, अखिल टंडन आदि मौजूद रहे। ब्यूरो
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