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अधिक मोबाइल के प्रयोग के चलते अक्षरों पर नहीं केंद्रित हो रही 80 फीसदी बच्चों की नजर
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मुरादाबाद। कोरोना संक्रमण के बढ़ते प्रभाव की वजह से छोटे बच्चों के माता-पिता को चिंता में डाल दिया है। एडमिशन की तैयारी में जुटे अभिभावक अब सिर्फ स्कूलों में पूछताछ कर रहे हैं। स्कूल संचालक और मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले दो सत्रों में पढ़ाई प्रभावित होने की वजह से न सिर्फ बच्चों के व्यवहार में परिवर्तन आया है, बल्कि लगातार मोबाइल देखने के कारण आठ वर्ष तक के करीब 80 फीसदी बच्चों की नजर अब अक्षरों पर नहीं टिकती है। इससे बचने के लिए अब अभिभावकों को घरों में ही क्लासरूम जैसा वातावरण तैयार करने की सलाह दी जा रही हैं।
मुरादाबाद में करीब 50 निजी और प्ले स्कूलों में प्रतिवर्ष लगभग 45 सौ बच्चे एडमिशन लेते हैं। जनवरी माह में शुरू होने वाली प्रवेश प्रक्रिया पर कोरोना संक्रमण ब्रेक लग रहा है। ऐसे में वह स्कूलों में कोरोना संक्रमण से बचाव आदि को लेकर की जा रही व्यवस्थाओं को परख रहे हैं, क्योंकि पिछले दो सत्रों में स्कूलों में कक्षाओं का संचालन न होने के कारण पढ़ाई को नियमित रखने के लिए बच्चों को स्मार्ट फोन, लैपटॉप और टेबलेट देना अभिभावकों की मजबूरी बन गया है। ऑनलाइन शिक्षा को लेकर पिछले वर्ष जुलाई में नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स ने शोध किया है, जिसमें प्रति दस में से नौ बच्चों ने माना है कि वह इंटरनेट की वर्चुअल यानी आभासी दुनिया में जी रहे हैं। बच्चे खुद तो ऑनलाइन समय व्यतीत कर ही रहे हैं, साथ में उन्होंने अपने अभिभावकों के लिए भी माना है कि वह भी स्मार्ट फोन के एडिक्ट हैं।
इस तरह के आए हैं केस
लाजपत नगर निवासी एक सात वर्षीय एक बच्चा ऑनलाइन क्लास में लिखने का पूरा होमवर्क करता था, लेकिन जब वह क्लास में गया तो वहां पर न तो वह कोई अक्षर पहचान पा रहा था और न ही कुछ लिख पा रहा था। काउंसलिंग में पता चला कि वह अपने माता-पिता को इमोशनल ब्लैकमेल करके होमवर्क करवा लेता था और खुद ऑनलाइन गेम खेलता था। मानसरोवर निवासी छह साल का बच्चा कुछ लिख नहीं पा रहा है, जबकि उससे बड़े भाई बहन छह वर्ष की उम्र में लिखने लगे थे। माता पिता को बच्चे की लर्निंग डिसेबल होने की चिंता सता रही थी। काउंसलिंग में बच्चे की सीखने की क्षमता सही मिली। इसके अलावा सोशल मीडिया पर लाइक्स का एडिक्शन होने लगा है। आधी रात को जगकर विश करने का ट्रेंड सबसे ज्यादा है।
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इस तरह की परेशानियां आ रही हैं सामने
स्लीप डिसआर्डर, एंजाइटी, थकावट, उत्तेजना, ऑनलाइन शॉपिंग की लत, व्याकरण भाषा खराब होना, आँखों की समस्या सर्वाइकल, मोटापा
यह करें अभिभावक
फोन के पास बच्चों को अकेले न छोड़े समय-समय पर उनके फोन को चेक करें
सोशल एब्यूज से बचने के लिए जागरूक करें
बच्चे द्वारा देखी गई साइट्स की हिस्ट्री जांचें और फोन में प्राइवेसी सेटिंग लगाएं
ज्यादा से ज्यादा समय बच्चों के साथ व्यतीत करें
लिखने की आदत को छूटने न दें
सुबह स्कूल के समय पर बच्चों को जगाएं, नाश्ता कराएं और खाना खिलाएं
घर पर ब्लैक बोर्ड पर लिखकर उसे बच्चों को उसी को लिखने के लिए प्रोत्साहित करें
दादा-दादी और बड़े भाई-बहन क्लास की तरह बैठकर एक दूसरे को समझाकर पढ़ाएं
व्यवहार में बदलाव होने पर समय-समय पर चिकित्सक की सलाह
प्रति माह पांच से दस वर्ष की उम्र के करीब 60 बच्चों की काउंसलिंग की जा रही है। इसमें से 15 फीसदी बच्चों में रोबोटिक लैंग्वेज में लिखने, 40 फीसदी बच्चों में शिक्षकों द्वारा करवाई जा रही पढ़ाई का प्रभाव न होने की समस्या हो रही है। 40 फीसदी छात्रों की भाषा एवं लेखन क्षमता प्रभावित हुई है। ऑनलाइन क्लासेज में दूरस्थ शिक्षा प्रक्रिया होने से बच्चों की मौखिक अभिव्यक्ति, शब्द संयोजन, लेखन शैली, वाक्य विन्यास, गणितीय क्षमता में भी स्पष्ट कमी देखी गई है।
डॉ कुमार मंगलम, मंडलीय मनोवैज्ञानिक अधिकारी
दो साल पहले प्रतिमाह बच्चों से संबंधित समस्याओं के दस केस आते थे, जो अब लगभग सौ तक पहुंच गए हैं। मुरादाबाद के अलावा रुद्रपुर, मेरठ, बरेली आदि जनपदों से भी बच्चे काउंसलिंग के लिए आते हैं। सौ में से करीब 80 बच्चों में नजर न ठहरने की समस्या है। जब वह ब्लैक बोर्ड या किताब में एकाग्रता से पढ़ने की कोशिश करते हैं तो सिर दर्द की समस्या हो जाती है। लगातार मोबाइल देखने से आंखों में नमी की कमी हो रही है और 40 फीसदी बच्चों को चश्मा लगाना पड़ रहा है। 35 फीसदी बच्चे मोटापे के शिकार हैं। कुछ बच्चों को एडल्ट फिल्में देखने की लत होने के केस भी आए हैं
डा नीरज गुप्ता, मनोरोग चिकित्सक
जनवरी माह में एडमिशन प्रक्रिया शुरू होती हैए लेकिन बढ़ते केसों की वजह से अभिभावकों के मन में कोरोना का डर बैठ रहा है। वह भी बच्चों के बदले व्यवहार, मोबाइल की लत, जिद्दी स्वभाव से परेशान हैं। वह पूछताछ कर रहे हैं। हालांकि स्थिति अभी संतोषजनक नहीं है। पिछले दो सत्रों में करीब दस हजार बच्चे प्रभावित होने की आशंका है।
नीरज कुमार गुप्ता, महासचिव
मुरादाबाद स्कूल्स ऑफ प्राइवेट स्कूल्स
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मुरादाबाद में करीब 50 निजी और प्ले स्कूलों में प्रतिवर्ष लगभग 45 सौ बच्चे एडमिशन लेते हैं। जनवरी माह में शुरू होने वाली प्रवेश प्रक्रिया पर कोरोना संक्रमण ब्रेक लग रहा है। ऐसे में वह स्कूलों में कोरोना संक्रमण से बचाव आदि को लेकर की जा रही व्यवस्थाओं को परख रहे हैं, क्योंकि पिछले दो सत्रों में स्कूलों में कक्षाओं का संचालन न होने के कारण पढ़ाई को नियमित रखने के लिए बच्चों को स्मार्ट फोन, लैपटॉप और टेबलेट देना अभिभावकों की मजबूरी बन गया है। ऑनलाइन शिक्षा को लेकर पिछले वर्ष जुलाई में नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स ने शोध किया है, जिसमें प्रति दस में से नौ बच्चों ने माना है कि वह इंटरनेट की वर्चुअल यानी आभासी दुनिया में जी रहे हैं। बच्चे खुद तो ऑनलाइन समय व्यतीत कर ही रहे हैं, साथ में उन्होंने अपने अभिभावकों के लिए भी माना है कि वह भी स्मार्ट फोन के एडिक्ट हैं।
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इस तरह के आए हैं केस
लाजपत नगर निवासी एक सात वर्षीय एक बच्चा ऑनलाइन क्लास में लिखने का पूरा होमवर्क करता था, लेकिन जब वह क्लास में गया तो वहां पर न तो वह कोई अक्षर पहचान पा रहा था और न ही कुछ लिख पा रहा था। काउंसलिंग में पता चला कि वह अपने माता-पिता को इमोशनल ब्लैकमेल करके होमवर्क करवा लेता था और खुद ऑनलाइन गेम खेलता था। मानसरोवर निवासी छह साल का बच्चा कुछ लिख नहीं पा रहा है, जबकि उससे बड़े भाई बहन छह वर्ष की उम्र में लिखने लगे थे। माता पिता को बच्चे की लर्निंग डिसेबल होने की चिंता सता रही थी। काउंसलिंग में बच्चे की सीखने की क्षमता सही मिली। इसके अलावा सोशल मीडिया पर लाइक्स का एडिक्शन होने लगा है। आधी रात को जगकर विश करने का ट्रेंड सबसे ज्यादा है।
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इस तरह की परेशानियां आ रही हैं सामने
स्लीप डिसआर्डर, एंजाइटी, थकावट, उत्तेजना, ऑनलाइन शॉपिंग की लत, व्याकरण भाषा खराब होना, आँखों की समस्या सर्वाइकल, मोटापा
यह करें अभिभावक
फोन के पास बच्चों को अकेले न छोड़े समय-समय पर उनके फोन को चेक करें
सोशल एब्यूज से बचने के लिए जागरूक करें
बच्चे द्वारा देखी गई साइट्स की हिस्ट्री जांचें और फोन में प्राइवेसी सेटिंग लगाएं
ज्यादा से ज्यादा समय बच्चों के साथ व्यतीत करें
लिखने की आदत को छूटने न दें
सुबह स्कूल के समय पर बच्चों को जगाएं, नाश्ता कराएं और खाना खिलाएं
घर पर ब्लैक बोर्ड पर लिखकर उसे बच्चों को उसी को लिखने के लिए प्रोत्साहित करें
दादा-दादी और बड़े भाई-बहन क्लास की तरह बैठकर एक दूसरे को समझाकर पढ़ाएं
व्यवहार में बदलाव होने पर समय-समय पर चिकित्सक की सलाह
प्रति माह पांच से दस वर्ष की उम्र के करीब 60 बच्चों की काउंसलिंग की जा रही है। इसमें से 15 फीसदी बच्चों में रोबोटिक लैंग्वेज में लिखने, 40 फीसदी बच्चों में शिक्षकों द्वारा करवाई जा रही पढ़ाई का प्रभाव न होने की समस्या हो रही है। 40 फीसदी छात्रों की भाषा एवं लेखन क्षमता प्रभावित हुई है। ऑनलाइन क्लासेज में दूरस्थ शिक्षा प्रक्रिया होने से बच्चों की मौखिक अभिव्यक्ति, शब्द संयोजन, लेखन शैली, वाक्य विन्यास, गणितीय क्षमता में भी स्पष्ट कमी देखी गई है।
डॉ कुमार मंगलम, मंडलीय मनोवैज्ञानिक अधिकारी
दो साल पहले प्रतिमाह बच्चों से संबंधित समस्याओं के दस केस आते थे, जो अब लगभग सौ तक पहुंच गए हैं। मुरादाबाद के अलावा रुद्रपुर, मेरठ, बरेली आदि जनपदों से भी बच्चे काउंसलिंग के लिए आते हैं। सौ में से करीब 80 बच्चों में नजर न ठहरने की समस्या है। जब वह ब्लैक बोर्ड या किताब में एकाग्रता से पढ़ने की कोशिश करते हैं तो सिर दर्द की समस्या हो जाती है। लगातार मोबाइल देखने से आंखों में नमी की कमी हो रही है और 40 फीसदी बच्चों को चश्मा लगाना पड़ रहा है। 35 फीसदी बच्चे मोटापे के शिकार हैं। कुछ बच्चों को एडल्ट फिल्में देखने की लत होने के केस भी आए हैं
डा नीरज गुप्ता, मनोरोग चिकित्सक
जनवरी माह में एडमिशन प्रक्रिया शुरू होती हैए लेकिन बढ़ते केसों की वजह से अभिभावकों के मन में कोरोना का डर बैठ रहा है। वह भी बच्चों के बदले व्यवहार, मोबाइल की लत, जिद्दी स्वभाव से परेशान हैं। वह पूछताछ कर रहे हैं। हालांकि स्थिति अभी संतोषजनक नहीं है। पिछले दो सत्रों में करीब दस हजार बच्चे प्रभावित होने की आशंका है।
नीरज कुमार गुप्ता, महासचिव
मुरादाबाद स्कूल्स ऑफ प्राइवेट स्कूल्स