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रंगोत्सव में रची-बसी रंग-रंग की संस्कृति
ब्यूरो/अमर उजाला/मुरादाबाद
Updated Mon, 13 Mar 2017 01:49 AM IST
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खेली गई होली
- फोटो : अमर उजाला
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रंगोत्सव न केवल रंगों के मिलन का उत्सव है, बल्कि संस्कृतियों के कई रंगों के मिलन का भी उत्सव है। विभिन्न संस्कृतियों को समेटे भारत में एक लोक संस्कृति दूसरी तक पहुंची है। दूर-दूर होकर भी संस्कृतियां अपनी जड़ों से जुड़ी हुई हैं और इसका नजारा मुरादाबाद में भी दिखाई देता है।
कई दूसरे प्रदेशों के लोग मुरादाबाद में रहते हैं। कोई हाल फिलहाल में आकर बसा है। तो कोई लंबे समय से यहीं रह रहा है। लेकिन अपनी जड़ों से नहीं कटे हैं। घर-परिवार में आज भी अपने प्रदेश की संस्कृतियों की खुशबू बिखरी हुई है।
अमर उजाला ने इस होली पर अलग-अलग प्रदेशों की होली के पारंपरिक रंगों को समझने की कोशिश की। आप भी जानिए कैसे मनाते हैं दूसरे प्रदेशों के लोग मुरादाबाद में होली -
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इस दिन भगवान कृष्ण के रास की तरह बंगाली परिवार होली खेलते हैं। श्री चैतन्यमहाप्रभु की जन्मस्थली बंगाल ही है। उन्होंने बंगाली परिवारों के एक साथ आने के लिए, बदलते मौसम पर एक दूसरे को शुभकामनाएं देने के लिए इस उत्सव को शुरू कराया था।
मित्रा दंपति बताते हैं कि वहां दोल पूर्णिमा भर भव्य जुलूस निकाला जाता है। वहां होली जलाने की परंपरा नहीं है। मुरादाबाद में रहकर क्योंकि वहां जैसा पूरा माहौल तो नहीं है, लेकिन यहां कई बंगाली परिवार हैं जो एक साथ अपने उत्सव मनाते हैं।
रेलवे हरथला कालोनी में बनी कालीबाड़ी में इकट्ठा होते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के साथ होली खेली जाती है। पारंपरिक तरीके से पूजा होती है। गुलाल से रंग खेला जाता है।
अपने-अपने तरीके से होली मनाते हैं। लेकिन मूल संस्कृति को छोड़ा नहीं। गुजराती समाज की सचिव शैली पारिख बताती हैं कि गुजरात में एकादशी से ही रंग खेलना शुरू हो जाता है और इसी दिन पहली गुझिया बनाकर ठाकुरजी श्री कृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल को भोग लगाया जाता है।
गुजराती समाज के अध्यक्ष मनमोहन दास पोरवाल बताते हैं कि गुजरात में लड्डू गोपाल के स्वरूप को एकादशी से रोजाना रंग लगाते हैं। होली के दिन सबसे पहले उन्हें चांदी की पिचकारी से रंग लगाया जाता है।
ये रंग टेसू के फूलों से बनाया जाता है। इसके बाद परिवार वाले आपस में होली खेलते। फिर खुद स्नान कर लड्डू गोपाल को रंग लगाते हैं। होली बंगाली जाती है। गोबर की बरगुलियों से पूजा होती है। अपने पारंपरिक गीत गाते हैं।
पहाड़ों का रंग ही अलग है। ठंडी वादियों में घुुली रंगों की खुशबू होली पर और भी रंगीन हो जाती है। यहां प्रकृति ने जितने रंग बिखेरे हैं, उतने ही रंग यहां की संस्कृति के भी है। होली जलाने की परंपरा यहां भी नहीं है। उत्तरांचल संस्कृति विकास समिति के संयुक्त मंत्री हरीश बोरा बताते हैं कि उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में होली जलाते नहीं।
वहां भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में घर-घर जाकर रंग खेला जाता है और खड़ी होली गाई जाती है। कपड़े का चीर बनाकर उसे जलाया जाता है। गढ़वाल मंडल के भी खड़ी होली चौपाल, परिवार में जाकर गाई जाती है। एक महीने तक होली का उत्सव चलता है। होली से करीब बीस दिन पहले होली का उत्सव शुरू होता है जो होली के कुछ दिन बाद तक चालू रहता है।
पहाड़ पर एक दिन नहीं बल्कि एक महीने की होली होती है। मुरादाबाद में पहाड़ सा माहौल तो नहीं लेकिन बड़ी संख्या में उत्तराखंड के परिवार यहां रहते हैं। अपनी संस्कृति को जिंदा करने के लिए इस परंपरा को निभा भी रहे हैं।
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कई दूसरे प्रदेशों के लोग मुरादाबाद में रहते हैं। कोई हाल फिलहाल में आकर बसा है। तो कोई लंबे समय से यहीं रह रहा है। लेकिन अपनी जड़ों से नहीं कटे हैं। घर-परिवार में आज भी अपने प्रदेश की संस्कृतियों की खुशबू बिखरी हुई है।
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अमर उजाला ने इस होली पर अलग-अलग प्रदेशों की होली के पारंपरिक रंगों को समझने की कोशिश की। आप भी जानिए कैसे मनाते हैं दूसरे प्रदेशों के लोग मुरादाबाद में होली -
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बंगाली समाज का होली उत्सव : दोल उत्सव में बिखरा है कृष्ण रास का रंग
बंगाल में होली को दोल उत्सव के नाम से जाना जाता है। वहां उत्तर भारत की तरह हिरण्यकश्यप और होलिका की कथा को होली से जोड़कर नहीं देखा जाता। बंगाली समाज के असीम कुमार मित्रा और उनकी पत्नी प्रिया मित्रा बताते हैं कि बंगाल में होली के दिन को दोल पूर्णिमा बोला जाता है।इस दिन भगवान कृष्ण के रास की तरह बंगाली परिवार होली खेलते हैं। श्री चैतन्यमहाप्रभु की जन्मस्थली बंगाल ही है। उन्होंने बंगाली परिवारों के एक साथ आने के लिए, बदलते मौसम पर एक दूसरे को शुभकामनाएं देने के लिए इस उत्सव को शुरू कराया था।
मित्रा दंपति बताते हैं कि वहां दोल पूर्णिमा भर भव्य जुलूस निकाला जाता है। वहां होली जलाने की परंपरा नहीं है। मुरादाबाद में रहकर क्योंकि वहां जैसा पूरा माहौल तो नहीं है, लेकिन यहां कई बंगाली परिवार हैं जो एक साथ अपने उत्सव मनाते हैं।
रेलवे हरथला कालोनी में बनी कालीबाड़ी में इकट्ठा होते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के साथ होली खेली जाती है। पारंपरिक तरीके से पूजा होती है। गुलाल से रंग खेला जाता है।
गुजराती समाज का होली उत्सव : यहां होली जलाते नहीं ‘बंगालते’ हैं
देश में अपने व्यापार के लिए प्रसिद्ध गुजरात से मुरादाबाद का पुराना नाता है। करीब सौ साल पहले यहां आकर बसे गुजराती साहूकारों ने मुरादाबाद में गोकुलदास कॉलेज स्थापित किया और उसके पास ही एक पूरा गुजराती मोहल्ला बसाया गया। अब वहां से दूर रिहायशी इलाकों में गुजराती परिवार बस गए हैं।अपने-अपने तरीके से होली मनाते हैं। लेकिन मूल संस्कृति को छोड़ा नहीं। गुजराती समाज की सचिव शैली पारिख बताती हैं कि गुजरात में एकादशी से ही रंग खेलना शुरू हो जाता है और इसी दिन पहली गुझिया बनाकर ठाकुरजी श्री कृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल को भोग लगाया जाता है।
गुजराती समाज के अध्यक्ष मनमोहन दास पोरवाल बताते हैं कि गुजरात में लड्डू गोपाल के स्वरूप को एकादशी से रोजाना रंग लगाते हैं। होली के दिन सबसे पहले उन्हें चांदी की पिचकारी से रंग लगाया जाता है।
ये रंग टेसू के फूलों से बनाया जाता है। इसके बाद परिवार वाले आपस में होली खेलते। फिर खुद स्नान कर लड्डू गोपाल को रंग लगाते हैं। होली बंगाली जाती है। गोबर की बरगुलियों से पूजा होती है। अपने पारंपरिक गीत गाते हैं।
उत्तराखंडी समाज का होली उत्सव : रंग खेलते हैं और होली गाते हैं
पहाड़ों का रंग ही अलग है। ठंडी वादियों में घुुली रंगों की खुशबू होली पर और भी रंगीन हो जाती है। यहां प्रकृति ने जितने रंग बिखेरे हैं, उतने ही रंग यहां की संस्कृति के भी है। होली जलाने की परंपरा यहां भी नहीं है। उत्तरांचल संस्कृति विकास समिति के संयुक्त मंत्री हरीश बोरा बताते हैं कि उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में होली जलाते नहीं।
वहां भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में घर-घर जाकर रंग खेला जाता है और खड़ी होली गाई जाती है। कपड़े का चीर बनाकर उसे जलाया जाता है। गढ़वाल मंडल के भी खड़ी होली चौपाल, परिवार में जाकर गाई जाती है। एक महीने तक होली का उत्सव चलता है। होली से करीब बीस दिन पहले होली का उत्सव शुरू होता है जो होली के कुछ दिन बाद तक चालू रहता है।
पहाड़ पर एक दिन नहीं बल्कि एक महीने की होली होती है। मुरादाबाद में पहाड़ सा माहौल तो नहीं लेकिन बड़ी संख्या में उत्तराखंड के परिवार यहां रहते हैं। अपनी संस्कृति को जिंदा करने के लिए इस परंपरा को निभा भी रहे हैं।