{"_id":"57720c054f1c1bc77379bef2","slug":"dead-case-insurance-claim-to-recover","type":"story","status":"publish","title_hn":"मुर्दाें का बीमा कराकर क्लेम वसूलने का मामला: चोरी ऊपर से सीना जोरी ","category":{"title":"Crime","title_hn":"क्राइम ","slug":"crime"}}
मुर्दाें का बीमा कराकर क्लेम वसूलने का मामला: चोरी ऊपर से सीना जोरी
ब्यूरो/अमर उजाला/मुरादाबाद
Updated Tue, 28 Jun 2016 11:03 AM IST
विज्ञापन
बीमा घोटाला
- फोटो : demo
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लाशों का बीमा कराकर क्लेम वसूलने वालों की जड़े गहरी थीं। बीमा कराने के बाद उसे हर हाल में वसूलते थे। सीधे सीधे क्लेम नहीं मिलने पर उपभोक्ता फोरम का सहारा लेते थे। आपत्ति लगाकर क्लेम वापस होने पर आरोपियों ने उपभोक्ता फोरम से 11 क्लेम लिए थे।
मुर्दों का बीमा कराकर बीमा कंपनी से क्लेम लेने वाले किसी भी हद तक जाकर क्लेम लेते थे। कंपनी में काम करने के कारण उन्हें पता था कि क्लेम लेने के लिए उन्हें किन किन प्रमाण पत्रों की जरूरत थी। क्लेम लेने के लि पूरा जाल बिछाया जाता था।
गांवों से मृतकों की जानकारी जुटाकर कागजात तैयार कराए जाते और फिर उनके नाम का बीमा कराने के बाद किस्तें भरी जातीं। कुछ समय के बाद उनका मृत्यु प्रमाण पत्र लगाकर क्लेम किया जाता। किस्तें भरने के बाद वे क्लेम हर हाल में लेने की ठान लेते थे। कई बार ऐसा हुआ कि उनके क्लेम पर रिजेक्शन लगा। तो कमियों को पूरा करने के बाद फिर से क्लेम करते।
विज्ञापन
दोबारा में आपत्ति लगने के बाद वे कंपनी से क्लेम मांगने के बजाय दूसरे हथकंडे अपनाते। उसी क्लेम को लेकर वे फर्जी परिजनों के माध्यम से उपभोक्ता फोरम में वाद दायर करते थे। उपभोक्ता फोरम सभी दस्तावेज प्रस्तुत करने के कारण कंपनी की आपत्तियों को खारिज कर दिया जाता और एक दो तारीखों में ही फैसला वाद दायर करने के वाले के पक्ष में हो जाता। इस प्रकार से उन्होंने करीब दर्जन भर क्लेम वसूले थे।
पुलिस ने रिलायंस ब्रांच से पिछले पांच सालों में इस प्रकार के संदिग्ध भुगतानों का रिकार्ड मांगा है। ब्रांच में पुरानी फाइलें जब तलाशी गईं तो पता चला कि इसमें कई केस ऐसे थे जिनका भुगतान उपभोक्ता फोरम के आदेश पर हुआ। इनसे से 11 क्लेम जिनका भुगतान भी फर्जीवाडे़ के आधार पर हुआ। अभी इस प्रकार के क्लेम की भी लिस्ट तैयार की जा रही है। ब्रांच मैनेजर ने बताया कि रिकार्ड की जांच में कई ऐसी फाइलें भी मिली हैं जिसमें उपभोक्ता फोरम के माध्यम से फर्जीवाड़ा कर क्लेम लिया गया था।
साख के लिए करना पड़ा भुगतान
मुरादाबाद। कंपनी किसी क्लेम पर कोई आपत्ति लगाती है तो दावा करने वाला उपभोक्ता फोरम में वाद दायर कर सकता है। प्राइवेट क्षेत्र में बीमा क्लेम रिजेक्शन से कंपनी की साख खराब होती है। जो कारोबार को प्रभावित कारण बन जाती है। ऐसे में कई बार उपभोक्ता फोरम से बचने के लिए भी भुगतान कर दिया जाता है।
फर्जीवाड़े पर लगा था एक साल का ब्रेक
मुरादाबाद। रिलायंस कंपनी ने बीमा कराने के एक साल के अंदर ही क्लेम आने को लेकर संदेह हुआ था। एक साल में ही मौत होने के क्लेम आने से कंपनी का लाभ घट रहा था। उसे देखते हुए सख्ती बढ़ाई गई और नियम में बदलाव कर एक साल में भुगतान पर ब्रेक लगा दिया। मृत्यु पर मिलने वाली बीमा राशि के लिए कम से कम दो साल का प्रावधान किया गया। एक साल के अंदर मृत्यु होने पर भी क्लेम की राशि में कटौती कर दी गई। इस प्रकार के नियम बनाए जाने पर हरिओम सैनी और राजवीर ने दो साल वाले बीमा कराने शुरू कर दिए। कुल मिलाकर उन्होंने कंपनी के हर नियम का तोड़ निकाल रखा था।
विज्ञापन
मुर्दों का बीमा कराकर बीमा कंपनी से क्लेम लेने वाले किसी भी हद तक जाकर क्लेम लेते थे। कंपनी में काम करने के कारण उन्हें पता था कि क्लेम लेने के लिए उन्हें किन किन प्रमाण पत्रों की जरूरत थी। क्लेम लेने के लि पूरा जाल बिछाया जाता था।
विज्ञापन
गांवों से मृतकों की जानकारी जुटाकर कागजात तैयार कराए जाते और फिर उनके नाम का बीमा कराने के बाद किस्तें भरी जातीं। कुछ समय के बाद उनका मृत्यु प्रमाण पत्र लगाकर क्लेम किया जाता। किस्तें भरने के बाद वे क्लेम हर हाल में लेने की ठान लेते थे। कई बार ऐसा हुआ कि उनके क्लेम पर रिजेक्शन लगा। तो कमियों को पूरा करने के बाद फिर से क्लेम करते।
विज्ञापन
दोबारा में आपत्ति लगने के बाद वे कंपनी से क्लेम मांगने के बजाय दूसरे हथकंडे अपनाते। उसी क्लेम को लेकर वे फर्जी परिजनों के माध्यम से उपभोक्ता फोरम में वाद दायर करते थे। उपभोक्ता फोरम सभी दस्तावेज प्रस्तुत करने के कारण कंपनी की आपत्तियों को खारिज कर दिया जाता और एक दो तारीखों में ही फैसला वाद दायर करने के वाले के पक्ष में हो जाता। इस प्रकार से उन्होंने करीब दर्जन भर क्लेम वसूले थे।
पुलिस ने रिलायंस ब्रांच से पिछले पांच सालों में इस प्रकार के संदिग्ध भुगतानों का रिकार्ड मांगा है। ब्रांच में पुरानी फाइलें जब तलाशी गईं तो पता चला कि इसमें कई केस ऐसे थे जिनका भुगतान उपभोक्ता फोरम के आदेश पर हुआ। इनसे से 11 क्लेम जिनका भुगतान भी फर्जीवाडे़ के आधार पर हुआ। अभी इस प्रकार के क्लेम की भी लिस्ट तैयार की जा रही है। ब्रांच मैनेजर ने बताया कि रिकार्ड की जांच में कई ऐसी फाइलें भी मिली हैं जिसमें उपभोक्ता फोरम के माध्यम से फर्जीवाड़ा कर क्लेम लिया गया था।
साख के लिए करना पड़ा भुगतान
मुरादाबाद। कंपनी किसी क्लेम पर कोई आपत्ति लगाती है तो दावा करने वाला उपभोक्ता फोरम में वाद दायर कर सकता है। प्राइवेट क्षेत्र में बीमा क्लेम रिजेक्शन से कंपनी की साख खराब होती है। जो कारोबार को प्रभावित कारण बन जाती है। ऐसे में कई बार उपभोक्ता फोरम से बचने के लिए भी भुगतान कर दिया जाता है।
फर्जीवाड़े पर लगा था एक साल का ब्रेक
मुरादाबाद। रिलायंस कंपनी ने बीमा कराने के एक साल के अंदर ही क्लेम आने को लेकर संदेह हुआ था। एक साल में ही मौत होने के क्लेम आने से कंपनी का लाभ घट रहा था। उसे देखते हुए सख्ती बढ़ाई गई और नियम में बदलाव कर एक साल में भुगतान पर ब्रेक लगा दिया। मृत्यु पर मिलने वाली बीमा राशि के लिए कम से कम दो साल का प्रावधान किया गया। एक साल के अंदर मृत्यु होने पर भी क्लेम की राशि में कटौती कर दी गई। इस प्रकार के नियम बनाए जाने पर हरिओम सैनी और राजवीर ने दो साल वाले बीमा कराने शुरू कर दिए। कुल मिलाकर उन्होंने कंपनी के हर नियम का तोड़ निकाल रखा था।