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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Moradabad News ›   Bhaantu community untold story: tag of criminal was removed in 1952, now power of the pen

भांतू समाज की अनसुनी कहानी: 1952 में हटाया ‘अपराधी’ का ठप्पा, सुल्ताना डाकू के वंशजों के हाथ अब कलम की ताकत

Sun, 02 Mar 2025 06:51 PM IST
विमल शर्मा मनोज मिश्र, मुरादाबाद
मनोज मिश्र, मुरादाबाद Published by: विमल शर्मा Updated Sun, 02 Mar 2025 06:51 PM IST
सार

वर्ष 1952 में अपराधशील जातीय अधिनियम समाप्त होने के बाद भांतू जनजाति ने शिक्षा और मेहनत के बल पर खुद को मुख्यधारा में शामिल किया। मुरादाबाद की आदर्श कॉलोनी इसका प्रतीक बनी, जहां आज कई लोग सरकारी नौकरियों, व्यापार और राजनीति में सक्रिय हैं। समाज में अपनी पहचान मजबूत करने के लिए भांतू समुदाय अभी भी संघर्षरत है। आज पढ़ें पहली किस्त....।

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Bhaantu community untold story: tag of criminal was removed in 1952, now power of the pen
मुरादाबाद के भांतू समाज के संघर्ष की कहानी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कुछ जातियों को अपराधशील घोषित करके उन पर प्रतिबंध लगाने का नियम 80 वर्ष पहले कार्यान्वित किया गया था। स्वतंत्रता के इस युग में यह अनुचित है कि किसी व्यक्ति विशेष को जन्म से ही अपराधी घोषित करके उसे नागरिकता के साधारण अधिकारों से वंचित कर दिया जाए। अत: भारत में गणतंत्रीय शासन ने यह निर्णय लिया है कि 31 अगस्त 1952 से अपराधशील जातीय अधिनियम का अंत कर दिया जाए।

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Bhaantu community untold story: tag of criminal was removed in 1952, now power of the pen
मुरादाबाद की इसी आदर्श काॅलोनी में भांतू समुदाय के लोग रहते हैं - फोटो : संवाद

उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री हर गोविंद सिंह ने 1952 में जब यह आदेश जारी किया तो मुख्यतः मुरादाबाद और इसके निकटवर्ती इलाकों में रहने वाली भांतू जनजाति के लिए एक ऐसी सुबह का सूरज उगा जिसमें उम्मीद का उजाला था। अपने काले अतीत से पीछा छुड़ाने और समाज की मुख्य धारा में शामिल होने का संकल्प था। सोनकपुर ओवरब्रिज के पास कई किलोमीटर के दायरे में बसी आदर्श कॉलोनी आज इसी संकल्प का मूर्त रूप नजर आती है।

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Bhaantu community untold story: tag of criminal was removed in 1952, now power of the pen
भांतू समुदाय का सेटेलमेंट प्रमाणपत्र - फोटो : संवाद

आज यह कॉलोनी भी शहर की दूसरी तमाम बस्तियों की तरह एक सामान्य रिहायशी इलाका है, लेकिन भांतुओं का यहां तक पहुंचने का सफर आसान नहीं रहा। उनकी इस यात्रा में विडंबना है। विद्रोह है। आपराधिक इतिहास की काली छाया है। और है, शिक्षा के माध्यम से गढ़ी गई एक नई दुनिया। भांतुओं के शुरुआती अतीत की वैसे तो कोई ठोस दस्तावेजी जानकारी नहीं मिलती, लेकिन 1914 में प्रकाशित यूनाइटेड प्रोविंस के पुलिस अधीक्षक एसटी हॉलिंस की किताब द क्रिमिनल ट्राइब्स यूनाइटेड प्रोविंस में यह संभावना जाहिर की गई है कि संभवत: भांतू शब्द की उत्पत्ति भाट से हुई है।

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मुरादाबाद की इसी आदर्श काॅलोनी में भांतू समुदाय के लोग रहते हैं - फोटो : संवाद

हॉलिंस ने कई और जातियों को भी चिह्नित किया और इन्हें आपराधिक प्रवृत्ति का बताते हुए इन पर नियंत्रण के लिए एक रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार को सौंपी। नतीजा यह हुआ कि अंग्रेज सरकार ने भांतू और ऐसी तमाम जातियों पर नियंत्रण के लिए तत्कालीन यूनाइटेड प्रोविंस के कानपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, गोरखपुर और मुरादाबाद इत्यादि कई जिलों में शहर के बाहर अलग बाड़े बना दिए। इन्हें सेटेलमेंट कहा जाने लगा। यहां रहने वालों पर सख्त निगरानी रखी जाती थी और जब वह बस्ती से बाहर जाते तो उन्हें इसकी सूचना निकटवर्ती थाने में देनी पड़ती।

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मुरादाबाद की इसी आदर्श काॅलोनी में भांतू समुदाय के लोग रहते हैं - फोटो : संवाद

सेटेलमेंट में रहने वालों को बाकायदा पास जारी किए गए थे। ऐसा नहीं है कि इन उपायों से सब कुछ अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया। अपने दुस्साहसिक कारनामों के लिए देशभर में कुख्यात सुल्ताना डाकू का उदय इसी दौर में बिजनौर के नजीबाबाद किले में बनाए गए सेटेलमेंट के बीच ही हुआ। सेटेलमेंट में अंग्रेज सरकार ने इस कदर सख्ती बरती कि उसकी स्मृतियां भांतू समाज के लोगों के जेहन में अब भी ताजा हैं।

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मुरादाबाद की इसी आदर्श काॅलोनी में भांतू समुदाय के लोग रहते हैं - फोटो : संवाद

यह स्मृतियां आदर्श काॅलोनी के घरों में किस्से कहानियों की तरह सुनी-कही जाती हैं। इसी कॉलोनी के निवासी और रेलवे में टीटी के पद पर तैनात संजीव कुमार कहते हैं, आप आज जो खुशहाली देख रहे हैं वह रातोंरात नहीं आ गई है। इसके पीछे हमारे पुरखों की तमाम कुर्बानियां हैं। 1952 में सरकार ने तो हम पर से अपराधी होने का ठप्पा हटा लिया, लेकिन पुनर्वास के लिए कोई गंभीर पहल नहीं की।

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मुरादाबाद की इसी आदर्श काॅलोनी में भांतू समुदाय के लोग रहते हैं - फोटो : संवाद

हमारे बड़े-बुजुर्गों को समझ में आ गया था कि शिक्षा ही वह रास्ता है, जिसके जरिये हम आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। संजीव कुमार की बात सही लगती है। आज इस कॉलोनी में 1000 से ज्यादातर घर ऐसे हैं जहां लोग सरकारी नौकरियां कर रहे हैं। इनमें से कुछ मामूली पदों पर हैं तो कुछ बड़े अधिकारी भी हैं। मंजीत सिंह रेलवे में इंजीनियर के पद पर हैं तो जितेंद्र पाल सिंह अध्यापक।

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नगर निगम मुरादाबाद - फोटो : संवाद
रवींद्र सिंह रेलवे पुलिस में काम करते हैं। ममता सिंह एक स्कूल में पढ़ाती हैं। आज समाज के कुछ युवा व्यापार में तो कुछ सियासत में भी हाथ आजमा रहे हैं। धीरे-धीरे ही सही यह जनजाति समाज में मुख्यधारा का हिस्सा बन रही है। भांतू समाज के उत्थान के लिए सक्रिय आदर्श कॉलोनी के जसराज सिंह कहते हैं, कभी हमारे पुरखे तीर-कमान से सुअर का शिकार करते थे। अब हम दफ्तर जाते हैं। दुकान करते हैं। बहुत कुछ बदला है। मगर यह सिर्फ शुरुआत है। अभी हमें लंबा सफर तय करना है।
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