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माता पिता का अंतिम दर्शन भी न कर पाए शिव और प्रभात
Moradabad
Updated Wed, 07 Aug 2013 05:35 AM IST
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मुरादाबाद। दोनों बेटों का कलेजा फटा जा रहा था। माता-पिता के अंतिम दर्शन तक नहीं हो सके। डेढ़ माह से लगातार खोज के बावजूद माता-पिता का पता न लगने के गम से वह पहले ही जूझ रहे थे। नाते-रिश्तेदार और ब्राह्मणों की सलाह पर माता पिता के पुतले की जैसे ही राजकीय होम्योपैथी कालेज से मंगलवार की सुबह अर्थी उठी तो दोनों बेटों की आंखों से आंसू बह निकले। परिवार की महिलाएं फफक पड़ी। विलाप सुनकर अपनों की आंखें भी नम हो गईं। सभी के मुंह से यही निकल रहा था- ऐसा दर्द भगवान किसी को न दे।
यह अंतिम यात्रा थी केजीके होम्योपैथी कालेज के डा. योगेंद्र उपाध्याय पत्नी श्यामलता उर्फ कमलेश के साथ केदारनाथ दर्शन को गए थे और उत्तराखंड आपदा में फंसने के बाद नहीं लौटे। सोमवार की सुबह डा. दंपति की अंतिम यात्रा निकली। परिवार के अलावा शहर के चिर परिचित इसमें शामिल थे। हर कोई गमगीन था। डा. योगेंद्र उपाध्याय के बड़े भाई आगे मटकी लेकर चल रहे थे तो दोनों बेटे शिव हरिओम और प्रभात कुमार अर्थी को कांधा दिए हुए थे।
पुतलों का अंतिम संस्कार देख रोया मोक्षधाम
मुरादाबाद। शहर ने पहली बार इस तरह की शव यात्रा देखी। अर्थी में शव की जगह आटा और घास के पुतले तथा मृतकों के चित्र थे। प्रतिदिन अपनी छाती पर शवों को जलाने वाला मोक्षधाम भी इस अंतिम संस्कार को देखकर रो पड़ा।
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मोक्षधाम के कर्ताधर्ताओं में शामिल केसी शर्मा के अनुसार 1981 में लोकोशेड मोक्षधाम बना था। तब से आज तक श्मशान घाट और शहर ने ऐसी शव शवयात्रा और चिता नहीं देखी जिसमें कोई शरीर नहीं था। मृतकों की जगह पुतले और चित्र रखे थे। अंतिम संस्कार के लिए मृतकों के शरीर भी न होने की जिस बेबसी से डा. परिवार गुजर रहा था उससे शहरियों का कलेजा छलनी था।
मोक्षधाम में स्थापित होगी शिवमूर्ति
लोकोशेड मोक्षधाम के मुख्यद्वार पर शिव की मूर्ति स्थापित होगी। उधर सड़क की ओर परिसर के अंदर श्मशान भैरव का मंदिर बनेगा। यह मंदिर दसवां के लिए बनवाए गए हाल के ठीक पीछे होगा।
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यह अंतिम यात्रा थी केजीके होम्योपैथी कालेज के डा. योगेंद्र उपाध्याय पत्नी श्यामलता उर्फ कमलेश के साथ केदारनाथ दर्शन को गए थे और उत्तराखंड आपदा में फंसने के बाद नहीं लौटे। सोमवार की सुबह डा. दंपति की अंतिम यात्रा निकली। परिवार के अलावा शहर के चिर परिचित इसमें शामिल थे। हर कोई गमगीन था। डा. योगेंद्र उपाध्याय के बड़े भाई आगे मटकी लेकर चल रहे थे तो दोनों बेटे शिव हरिओम और प्रभात कुमार अर्थी को कांधा दिए हुए थे।
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पुतलों का अंतिम संस्कार देख रोया मोक्षधाम
मुरादाबाद। शहर ने पहली बार इस तरह की शव यात्रा देखी। अर्थी में शव की जगह आटा और घास के पुतले तथा मृतकों के चित्र थे। प्रतिदिन अपनी छाती पर शवों को जलाने वाला मोक्षधाम भी इस अंतिम संस्कार को देखकर रो पड़ा।
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मोक्षधाम के कर्ताधर्ताओं में शामिल केसी शर्मा के अनुसार 1981 में लोकोशेड मोक्षधाम बना था। तब से आज तक श्मशान घाट और शहर ने ऐसी शव शवयात्रा और चिता नहीं देखी जिसमें कोई शरीर नहीं था। मृतकों की जगह पुतले और चित्र रखे थे। अंतिम संस्कार के लिए मृतकों के शरीर भी न होने की जिस बेबसी से डा. परिवार गुजर रहा था उससे शहरियों का कलेजा छलनी था।
मोक्षधाम में स्थापित होगी शिवमूर्ति
लोकोशेड मोक्षधाम के मुख्यद्वार पर शिव की मूर्ति स्थापित होगी। उधर सड़क की ओर परिसर के अंदर श्मशान भैरव का मंदिर बनेगा। यह मंदिर दसवां के लिए बनवाए गए हाल के ठीक पीछे होगा।