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संघर्ष पथ के महायोद्धा तुम्हें प्रणाम!
Moradabad
Updated Thu, 15 Nov 2012 12:00 PM IST
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मुरादाबाद। ख्यालीराम शास्त्री अब नहीं रहे...यह शब्द शहर को अथाह खालीपन दे गया। उनकी पहचान सिर्फ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की नहीं थी, अपने शहर के लिए वह एक प्रेरणा की तरह थे...कभी न थकने वाले, कभी न झुकने वाले। उनके सम्मान के बिना मंच का कार्यक्रम पूरा नहीं होता था...उनके दो बोल सुने बिना सभा विसर्जित नहीं होती थी। पर अब शहर को आशीर्वाद देने के लिए उनके हाथ कभी नहीं उठेंगे। हमें संघर्ष पर चलना सिखाकर शास्त्री जी ने अंतिम सांस ले ली।
अंग्रेजों से जंग लड़ना उन्होंने बचपन में ही शुरू किया था। किशोर दल बनाकर आजादी में आहुति के लिए चंदा जुटाया तो बड़े होने के साथ ही जेल को अपना घर बना लिया। पांच बार से भी अधिक बार वह देश की आजादी के लिए जेल गए। वर्ष 1936 में उन्होंने छह माह की जेल काटी थी। आजादी की लड़ाई में वह पंडित जवाहर लाल नेहरू, गोविंद बल्लभ पंत, डा. संपूर्णानंद, चौधरी चरण सिंह, पंडित कमलापति त्रिपाठी और हेमवती नंदन बहुगुणा के साथ रहे। जब देश आजाद हो गया तो कुशल सियासत दां के रूप में अपनी भूमिका निभाई। शहर और जिले की समस्याओं के लिए लड़ते रहे। एक बार एक कलेक्टर ने उन्हें बीस मिनट इंतजार करा दिया तो उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह से बात करके जिलाधिकारी का ट्रांसफर करा दिया था। उनके आवास पर अगर कोई व्यक्ति अपनी समस्या लेकर पहुंच जाता था तो वह उसके साथ चल देते थे। चाहें पंद्रह अगस्त पर होने वाले आयोजन हो या छब्बीस जनवरी पर। हर जगह वह मौजूद रहते थे। मौजूदा सियासत पर बेबाक टिप्पणी करने वाले शास्त्री जी कहते थे कि आज की राजनीति तो कारोबार बन गई है। पहले लोग पैसा लगाते हैं और फिर वसूलते हैं।
स्वतंत्रता की लड़ाई
1941 में गांव मानकजूड़ी से सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में गिरफ्तार किए गए
1952 में कांठ निर्वाचन क्षेत्र से विधायक चुने गए
1972 में मुरादाबाद पश्चिम विधानसभा से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े और जीते
1977 में भारतीय क्रांति दल से विधायक चुने गए
1977 से 1978 तक प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे
कांग्रेस में एआईसीसी और पीसीसी के सदस्य भी रहे
वर्तमान में अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी संगठन के जिलाध्यक्ष थे
अंग्रेजों से जंग लड़ना उन्होंने बचपन में ही शुरू किया था। किशोर दल बनाकर आजादी में आहुति के लिए चंदा जुटाया तो बड़े होने के साथ ही जेल को अपना घर बना लिया। पांच बार से भी अधिक बार वह देश की आजादी के लिए जेल गए। वर्ष 1936 में उन्होंने छह माह की जेल काटी थी। आजादी की लड़ाई में वह पंडित जवाहर लाल नेहरू, गोविंद बल्लभ पंत, डा. संपूर्णानंद, चौधरी चरण सिंह, पंडित कमलापति त्रिपाठी और हेमवती नंदन बहुगुणा के साथ रहे। जब देश आजाद हो गया तो कुशल सियासत दां के रूप में अपनी भूमिका निभाई। शहर और जिले की समस्याओं के लिए लड़ते रहे। एक बार एक कलेक्टर ने उन्हें बीस मिनट इंतजार करा दिया तो उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह से बात करके जिलाधिकारी का ट्रांसफर करा दिया था। उनके आवास पर अगर कोई व्यक्ति अपनी समस्या लेकर पहुंच जाता था तो वह उसके साथ चल देते थे। चाहें पंद्रह अगस्त पर होने वाले आयोजन हो या छब्बीस जनवरी पर। हर जगह वह मौजूद रहते थे। मौजूदा सियासत पर बेबाक टिप्पणी करने वाले शास्त्री जी कहते थे कि आज की राजनीति तो कारोबार बन गई है। पहले लोग पैसा लगाते हैं और फिर वसूलते हैं।
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स्वतंत्रता की लड़ाई
1941 में गांव मानकजूड़ी से सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में गिरफ्तार किए गए
1952 में कांठ निर्वाचन क्षेत्र से विधायक चुने गए
1972 में मुरादाबाद पश्चिम विधानसभा से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े और जीते
1977 में भारतीय क्रांति दल से विधायक चुने गए
1977 से 1978 तक प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे
कांग्रेस में एआईसीसी और पीसीसी के सदस्य भी रहे
वर्तमान में अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी संगठन के जिलाध्यक्ष थे