फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Moradabad News ›   आठ साल बाद री इंवेस्टीगेट होगा सरदार मर्डर केस

आठ साल बाद री इंवेस्टीगेट होगा सरदार मर्डर केस

Tue, 13 Nov 2012 12:00 PM IST
Moradabad
Moradabad Updated Tue, 13 Nov 2012 12:00 PM IST
विज्ञापन

विज्ञापन


मुरादाबाद। ऐसा सामान्यत: नहीं होता, जब किसी केस का ट्रायल पूरा होने के बाद जजमेंट देते वक्त कोर्ट ये महसूस करे कि केस की दोबारा विवेचना होनी चाहिए। लेकिन एक मर्डर केस पर आए कोर्ट के फैसले से साबित होता है यूपी पुलिस मर्डर जैसे गंभीर अपराधों की विवेचना में भी बस लीपापोती ही कर रही है। असल अपराधी को पकड़ने के बजाए पुलिस का जोर विवेचना निपटाने पर होता है। कत्ल के आठ साल पुराने एक मामले में अभियुक्तों को दोषमुक्त करते हुए अदालत ने केस को री इंवेस्टीगेट कर असल अपराधी को कोर्ट के समक्ष लाने का आदेश दिया है।
कत्ल की यह घटना 9/10 सितंबर 2004 को हजरत नगर गढ़ी थाना क्षेत्र के गांव मऊ में हुई थी। घर के बाहर सो रहे सरदार सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जिसमें सरदार सिंह के भतीजे नीरज कुमार पुत्र चंद्रपाल ने अज्ञात के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी। पुलिस ने इस मामले को दो साल तक दबाए रखा और दो साल बाद गांव के ही राजेंद्र सिंह और कमलेश पत्नी चंद्रपाल के खिलाफ धारा 302 और 120 बी के तहत चार्जशीट दाखिल कर दावा किया कि हत्या इन दोनों ने की है। केस की सुनवाई अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश - 4 बृज भूषण यादव की अदालत में हुई। अदालत ने अभियोजन और बचाव पक्ष के तर्कों को सुनने और साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद अभियुक्त कमलेश और राजेंद्र सिंह को हत्या व साजिश के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। अपने आदेश में न्यायालय ने पुलिस पर जो टिप्पणियां की हैं वह पूरे पुलिस महकमे के लिए शर्मनाक हैं और इंवेस्टीगेशन के नाम पर हो रही खानापूरी की कलई भी खोलती हैं।
विज्ञापन



पुलिस पर अदालत की कड़ी टिप्पणी
- अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि पुलिस द्वारा अपनी चार्जशीट में पेश किए गए अभियुक्तों को हत्या और हत्या की साजिश के आरोपों से दोषमुक्त किया जाता है। इस केस की विवेचना अलग - अलग व्यक्तियों द्वारा की गई है। विवेचना को लंबे वक्त तक दबाया एवं रोका गया और बाद में केवल शपथ पत्रों के आधार पर चार्जशीट लगा दी गई। पुलिस ने जिन्हें अभियुक्त बनाया उनके पास से न तो आला कत्ल बरामद हुआ न ही पुलिस चार्जशीट वह माटिव बता सकी जिसके लिए हत्या की गई होती। पुलिस के पास कोई तात्विक साक्ष्य, प्रत्यक्षदर्शी अथवा परिस्थिति जन्य साक्ष्य भी नहीं है। लिहाजा अभियोजन (पुलिस) की कहानी संदेह से परे नहीं है।
विज्ञापन
विज्ञापन



मौका ए वारदात से मिले सुबूत भी रख दिए ताक पर
अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि पुलिस ने मौका ए वारदात से खून आलूदा विछोना सील बंद किया लेकिन उसकी विधि विज्ञान प्रयोगशाला में जांच नहीं कराई। इसी तरह मृतक के दिमाग से मिली मैटेलिक बुलेट को भी सील तो किया गया लेकिन उसे बेस्टिक एक्सपर्ट और विधि विज्ञान प्रयोगशाला में जांच के लिए नहीं भेजा गया।



डीएम - एसएसपी को आदेश
न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा है कि, ‘मेरा मत है कि यह मामला री ओपन करके पुनर्विवेचित किए जाने योग्य प्रकरण है,... आरोप पत्र लगाने वाला विवेचनाधिकारी इस मामले में परीक्षित नहीं हुआ है, जो यह दर्शा सकता था कि वास्तविक अपराधी कौन है,...अत: यह आदेश करना अनुचित नहीं होगा कि आपराधिक न्याय प्रशासन के प्रभारी/ जिला मजिस्ट्रेट मुरादाबाद और विवेचना के प्रभारी / एसएसपी मुरादाबाद संपूर्ण प्रकरण को निर्णय में किए गए प्रेक्षण के अनुरूप पुनर्विवेचित कर सही निष्कर्ष पर पहुंचने का प्रयास करें। यदि कोई पुलिस अधिकारी दोषी पाया जाता है तो उसे भी दंडित करें और वास्तविक अपराधी को परीक्षण हेतू नियमानुसार न्यायिक प्रक्रिया के हवाले करें।’
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed