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‘स्वार्थी व्यक्ति नहीं कर सकता सेवा धर्म’
Updated Fri, 07 Sep 2018 01:26 AM IST
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बिलारी। नगर के रायसत्ती मंदिर के कुमार कार्तिकेय हॉल में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तीसरे दिन कथा व्यास पंडित ब्रजेश पाठक रामायणी ने कहा कि स्वार्थी व्यक्ति की निष्ठा अपने स्वामी में नहीं बल्कि अपने स्वार्थ की पूर्ति में होती है। इसलिए स्वार्थी व्यक्ति किसी की सेवा नहीं कर सकता।
कथा व्यास ने आगे कहा कि स्वार्थी व्यक्ति सेवा के नाम पर व्यापार तो कर सकता है पर सच्चे अर्थों में सेवा धर्म का पालन नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि आज के युग में जब लोग जनसेवा का मुखौटा लगाकर अपने स्वार्थों की पूर्ति में लगे हैं वहीं श्रीराम, लक्ष्मण, हनुमान आदि का चरित्र हमें बताता है कि सेवा का वास्तविक स्वरूप क्या है। वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि लक्ष्मण ने श्रीराम की सच्चे मन से सेवा की। एक बार जब श्रीराम ने उन्हें युवराज पद देने का प्रस्ताव रखा तब लक्ष्मण ने मना कर दिया और कहा कि आपकी सेवा ही मेरा सबसे बड़ा पुरस्कार है, इसके अतिरिक्त मुझे कुछ नहीं चाहिए।
कथा व्यास ने आगे बताया कि जब व्यक्ति सेवा अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए नहीं बल्कि प्रभु की प्रसन्नता के लिए करता है तब वह सेवा पूजा बन जाती है और भगवान की प्राप्ति का साधक बन जाती है। भगवान का भक्त देश, धर्म और समाज की सेवा प्रभु को रिझाने के लिए करता है। यही सेवा का सच्चा स्वरूप है। कथा सुनने बड़ी संख्या में महिला श्रद्धालु भी पहुंचीं। महिलाओं ने विशेष आरती भी की। कथा व्यवस्थाओं में मुकेश गुप्ता, शिवओम गुप्ता, चमन गुप्ता, संजीव गुप्ता, संजय जैन, शरद चंद्र अग्रवाल, रामकुमार सिंह यादव, रमेश गुप्ता, मुकेश गुप्ता, पंकज गुप्ता, नवलकिशोर गुप्ता, सुरेंद्र कुमार चुग, मोहनलाल शर्मा आदि का सहयोग रहा।
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कथा व्यास ने आगे कहा कि स्वार्थी व्यक्ति सेवा के नाम पर व्यापार तो कर सकता है पर सच्चे अर्थों में सेवा धर्म का पालन नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि आज के युग में जब लोग जनसेवा का मुखौटा लगाकर अपने स्वार्थों की पूर्ति में लगे हैं वहीं श्रीराम, लक्ष्मण, हनुमान आदि का चरित्र हमें बताता है कि सेवा का वास्तविक स्वरूप क्या है। वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि लक्ष्मण ने श्रीराम की सच्चे मन से सेवा की। एक बार जब श्रीराम ने उन्हें युवराज पद देने का प्रस्ताव रखा तब लक्ष्मण ने मना कर दिया और कहा कि आपकी सेवा ही मेरा सबसे बड़ा पुरस्कार है, इसके अतिरिक्त मुझे कुछ नहीं चाहिए।
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कथा व्यास ने आगे बताया कि जब व्यक्ति सेवा अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए नहीं बल्कि प्रभु की प्रसन्नता के लिए करता है तब वह सेवा पूजा बन जाती है और भगवान की प्राप्ति का साधक बन जाती है। भगवान का भक्त देश, धर्म और समाज की सेवा प्रभु को रिझाने के लिए करता है। यही सेवा का सच्चा स्वरूप है। कथा सुनने बड़ी संख्या में महिला श्रद्धालु भी पहुंचीं। महिलाओं ने विशेष आरती भी की। कथा व्यवस्थाओं में मुकेश गुप्ता, शिवओम गुप्ता, चमन गुप्ता, संजीव गुप्ता, संजय जैन, शरद चंद्र अग्रवाल, रामकुमार सिंह यादव, रमेश गुप्ता, मुकेश गुप्ता, पंकज गुप्ता, नवलकिशोर गुप्ता, सुरेंद्र कुमार चुग, मोहनलाल शर्मा आदि का सहयोग रहा।
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