यूपी: अति प्राचीन लखनिया दरी का मनमोहक दृश्य आपको भी बना देगा दीवाना
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रानी को जब लगा कि वह भी नहीं बचेंगी तो उन्होंने अपने खून से पहाड़ के चट्टान पर राजा, सैनिक, हाथी, घोड़ा की तस्वीरें उकेर दीं, जिससे पता चल सके कि बाढ़ में फंसने की वजह से कोई जीवित बच नहीं सका है। भित्ति चित्र को देखकर पुरातत्व विभाग के अधिकारी भी इसे मानव के खून से बना हुआ बताते हैं। अति प्राचीन लखनिया दरी न सिर्फ पर्यटन स्थल बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी समृद्ध है।
बरसात के मौसम में बड़ी संख्या में सैलानी यहां जलप्रपात और प्रकृति के मनोहारी दृश्य का आनंद उठाने आते हैं। अगर यहां सैलानियों को सुविधाएं मुहैया कराई जाए तो यहां सैलानियों की संख्या बढ़ेगी। यह स्थल उपेक्षा का शिकार है।
यहां न तो सैलानियों के बैठने के लिए चबूतरे बने हैं और न ही बारिश से बचाव के लिए शेड लगे हैं। झरने में स्नान करने के बाद महिलाओं के कपड़े बदलने के लिए चेंजिंग रूम नहीं है।
बरसात में काफी मनोरम हो जाता है दृश्य
अहरौरा नगर से आठ किलोमीटर दक्षिण स्थित लखनिया दरी जलप्रपात स्थल के विकास की असीम संभावनाएं हैं लेकिन इस दिशा में कुछ खास नहीं किया गया। 2012 में सपा के शासन में पर्यटन मंत्री रहे ओमप्रकाश सिंह लखनिया दरी आए थे। उन्होंने लखनिया दरी से चूनादरी जल-प्रपात तक रोप-वे बनवाने की घोषणा की थी लेकिन विकास के नाम पर कुछ नहीं किया गया। यहां दूर दराज से लोग पिकनिक मनाने आते हैं।
सरकार की उदासीनता के कारण उनके बैठने के लिए चबूतरे, बारिश से बचाव के लिए शेड, कपड़े बदलने के लिए चेंजिंग रूम नहीं होने से सैलानी खुद को असहज महसूस करते हैं।
ब्रिटिश हुकूमत के समय अहरौरा जलाशय में बना था तीन तखवा पुल
लोग जंगल एवं पहाड़ों से होकर होकर जाते थे। प्रथम पंचवर्षीय योजना में 1951 से 56 के मध्य वाराणसी से सोनभद्र जाने के लिए सड़क का निर्माण कराया गया था। इसके बाद जल-प्रपात पर आने जाने का रास्ता सुगम हुआ। इस बारे में डीएफओ राजेश चौधरी बताते हैं कि लखनिया दरी के विकास की योजना पर काम हो रहा है। इसको लेकर शासन गंभीर है। जल्द ही कुछ नए कार्य किए जाएंगे।