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मौसम के आगे बेबस हुए अन्नदाता
ब्यूरो, अमर उजाला, मिर्जापुर
Updated Mon, 13 Apr 2015 12:27 AM IST
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किसानों ने अब अपने भाग्य को इंद्रदेव पर छोड़ दिया है। किसान ने यह मान लिया है कि इस वर्ष इंद्रदेव चाहेंगे तभी अन्न मिलेगा।
किसानाें का कहना है कि जिस तरह के मौसम का कालचक्र चल रहा है, उसने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ रखा है।
मौसम का मिजाज देख कर किसानों का हाल बेहाल है।
उन्हें कोई उपाय नहीं सूझ पा रहा है कि वह करें तो क्या करें। किसानाें का सभी कार्य रुका पड़ा हुआ है। उनका कहना है कि इस समय जहां कड़क धूप और पछुआ हवा बहनी चाहिए, वहीं पुरवा हवा एवं आसमान में बादल छाया हुआ है। इससे वह चिंतित नजर आ रहे हैं, जिसके कारण खेती-किसानी का कार्य अवरुद्ध पड़ा हुआ है।
बुजुर्गों की माने तो उनका कहना है कि पर्यावरण के साथ हो रहे खिलवाड़ से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है, जिसका खामियाजा इंसानाें को भुगतना पड़ रहा है।
कुछ किसान इन दिनों गेहूं की कटाई कर चुके हैं, वह अब उसे सुरक्षित करने में जुटे हैं।
वहीं कुछ किसान अपनी बची हुई फसल को बचाकर घर में पहुंचाने के लिए पूरे दिन दिखाई दे रहे हैं। किसानाें का मानना है कि जो बच जाए वही बहुत है।
बेमौसम की हुई बारिश और ओलावृष्टि के बाद किसानाें का मानना है कि अब प्रकृति की नीयति ही बदल गई है।
प्रकृति की नाराजगी से बेहाल किसानाें को यह नहीं सूझ रहा है कि वह करें भी तो क्या करें। इंद्रदेव से मन्नतें मांग रहे हैं कि उनकी बची फसल घराें तक सही सलामत पहुंच जाए।
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किसानाें का कहना है कि जिस तरह के मौसम का कालचक्र चल रहा है, उसने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ रखा है।
मौसम का मिजाज देख कर किसानों का हाल बेहाल है।
उन्हें कोई उपाय नहीं सूझ पा रहा है कि वह करें तो क्या करें। किसानाें का सभी कार्य रुका पड़ा हुआ है। उनका कहना है कि इस समय जहां कड़क धूप और पछुआ हवा बहनी चाहिए, वहीं पुरवा हवा एवं आसमान में बादल छाया हुआ है। इससे वह चिंतित नजर आ रहे हैं, जिसके कारण खेती-किसानी का कार्य अवरुद्ध पड़ा हुआ है।
बुजुर्गों की माने तो उनका कहना है कि पर्यावरण के साथ हो रहे खिलवाड़ से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है, जिसका खामियाजा इंसानाें को भुगतना पड़ रहा है।
कुछ किसान इन दिनों गेहूं की कटाई कर चुके हैं, वह अब उसे सुरक्षित करने में जुटे हैं।
वहीं कुछ किसान अपनी बची हुई फसल को बचाकर घर में पहुंचाने के लिए पूरे दिन दिखाई दे रहे हैं। किसानाें का मानना है कि जो बच जाए वही बहुत है।
बेमौसम की हुई बारिश और ओलावृष्टि के बाद किसानाें का मानना है कि अब प्रकृति की नीयति ही बदल गई है।
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प्रकृति की नाराजगी से बेहाल किसानाें को यह नहीं सूझ रहा है कि वह करें भी तो क्या करें। इंद्रदेव से मन्नतें मांग रहे हैं कि उनकी बची फसल घराें तक सही सलामत पहुंच जाए।
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