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मूल स्वरूप खोता जा रहा है उत्तर भारत का द्वार
ब्यूरो, अमर उजाला, मिर्जापुर।
Updated Mon, 18 Apr 2016 01:13 AM IST
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चुनार का ऐतिहासिक किला
- फोटो : mirzapur
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प्राचीन समय में उत्तर भारत का द्वार कहा जाने वाला चुनार दुर्ग देश के अति महत्व की पुरातत्व धरोहरों में से एक है।
उचित देखभाल न होने से यह मूल स्वरूप एवं ऐतिहासिकता खोता जा रहा है। भारतीय पुरात्व एवं सर्वेक्षण विभाग के अधीन इस प्राचीन दुर्ग में मौजूद अनेक ऐतिहासिक इमारतें खंडहर हो चुकी हैं।
उत्तर वाहिनी गंगा से सटी पहाड़ी पर 800 मीटर की लंबाई और करीब 150 से 300 मीटर की चौड़ाई एवं 200 मीटर की ऊंचाई पर बने इस प्राचीन दुर्ग का सामरिक महत्व रहा है।
मान्यता है कि 56 ईसा पूर्व चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने इस दुर्ग के विशाल परकोटे का निर्माण कराया था।
इतिहास बताता है कि किसी भी राजा की हिंदुस्तान पर फतह की चाह तभी पूरी होती थी, जब वह चुनार दुर्ग पर आधिपत्य जमा लेता था। शायद इसीलिए इतिहास में इसे उत्तर भारत का प्रवेश द्वार कहा जाता है।
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उचित देखभाल न होने से यह मूल स्वरूप एवं ऐतिहासिकता खोता जा रहा है। भारतीय पुरात्व एवं सर्वेक्षण विभाग के अधीन इस प्राचीन दुर्ग में मौजूद अनेक ऐतिहासिक इमारतें खंडहर हो चुकी हैं।
उत्तर वाहिनी गंगा से सटी पहाड़ी पर 800 मीटर की लंबाई और करीब 150 से 300 मीटर की चौड़ाई एवं 200 मीटर की ऊंचाई पर बने इस प्राचीन दुर्ग का सामरिक महत्व रहा है।
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मान्यता है कि 56 ईसा पूर्व चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने इस दुर्ग के विशाल परकोटे का निर्माण कराया था।
इतिहास बताता है कि किसी भी राजा की हिंदुस्तान पर फतह की चाह तभी पूरी होती थी, जब वह चुनार दुर्ग पर आधिपत्य जमा लेता था। शायद इसीलिए इतिहास में इसे उत्तर भारत का प्रवेश द्वार कहा जाता है।
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