नवरात्र: विंध्यवासिनी धाम में उमड़ा भक्तों का रेला, कात्यायनी स्वरूप का दर्शन कर हुए निहाल; सुरक्षा दुरुस्त
Navratri 2025: दर्शन-पूजन के बाद अधिकांश देवी भक्तों ने त्रिकोण मार्ग की परिक्रमा करते हुए मां काली और अष्टभुजा देवी का दर्शन कर सुख समृद्धि की कामना की।
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Mirzapur News: जगत जननी मां विंध्यवासिनी की चौखट पर शीश झुकाने के लिए रविवार को भी श्रद्धालुओं की भोर में मंगला आरती के बाद शुरू हुआ दर्शन-पूजन का सिलसिला दिन भर चलता रहा। इस दौरान स्नान के लिए गंगा घाटों पर भी श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रही।
शारदीय नवरात्र के सातवें दिन देवी भक्तों ने मां विंध्यवासिनी का कात्यायनी स्वरूप में दर्शन किया। पर रविवार को देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालु रेलवे स्टेशन व विभिन्न वाहन स्टैंडों पर उतरने के बाद सीधे गंगा में स्नान के लिए घाटों की ओर प्रस्थान कर रहे थे।
दीवान घाट, पक्का घाट समेत निर्धारित अन्य घाटों पर स्नान के बाद हाथों में प्रसाद, नारियल, चुनरी लिए माता के जयकारे लगाते हुए श्रद्धालु मंदिर की ओर जाने वाले मार्गों पर कतारबद्ध हो जा रहे थे। मंगला आरती से पहले ही भोर में ही सभी प्रमुख मार्गों पर श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग गईं।
मंगला आरती के बाद मंदिर का कपाट खुलते ही श्रद्धालु जयकारे लगाते हुए मां विंध्यवासिनी की एक झलक पाने के लिए बेताब हो गए। किसी ने गर्भगृह तो किसी न झांकी से ही मां विंध्यवासिनी के भव्य स्वरूप के दर्शन किए। मां के दर्शन कर श्रद्धालु भाव विभोर रहे।
कात्यायनी स्वरूप की होगी पूजा
रविवार को मां भगवती के छठे स्वरूप कात्यायनी की पूजा-अर्चना होगी। ज्योतिषाचार्य डॉ. रामलाल त्रिपाठी ने बताया माता ने अपने इस पुत्री स्वरूप से पिता के कुल की रक्षा का संदेश दिया है। कहा कि कात्यायन ऋषि ने तपकर देवी से वरदान मांगा कि आप पुत्री रूप में मेरे कुल में जन्म लें।
देवी ने कात्यायन ऋषि की प्रसन्नता के लिए अपना अजन्मा स्वरूप त्यागकर पुत्री रूप में जन्म लिया। सामान्यतः पुत्री का गोत्र पति के गोत्र से चलता है। लेकिन यहां देवी सदा-सर्वदा के लिए पिता के गोत्र से जुड़ गईं। इसी कारण देवी का नाम कात्यायनी पड़ा। इस रात्रि जागरण और जप करने से साधक को सहज ही माता कात्यायनी की कृपा का लाभ मिलता है। नवरात्र की षष्ठी माता सरस्वती को समर्पित है।