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Mirzapur News: गुरु तेग बहादुर ने दी है देश की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति

Wed, 08 Apr 2026 01:20 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 08 Apr 2026 01:20 AM IST
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Guru Tegh Bahadur sacrificed his life for the protection of the country.
गुरु तेग बहादुर जी की शोभा यात्रा में पंच प्यारे।-संवाद।
- श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया गया गुरुतेग बहादुर का 405 वां प्रकाश उत्सव
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अहरौरा। सिख धर्म के नौवें गुरु गुरूतेग बहादुर साहेब का तीन दिवसीय प्रकाश उत्सव मंगलवार को नगर के सुप्रसिद्ध गुरुद्वारे में श्रद्धा के साथ मनाया गया। गुरुद्वारे में गुरुवाणी का आयोजन किया गया। देर शाम फूलों से सुशोभित रथ पर गुरूग्रंथ साहिब तथा गुरुतेग बहादुर की नगर में भव्य शोभा यात्रा निकाली गई।
पंचप्यारे प्रकाश उत्सव की शोभा बढ़ाते रहे। शोभा यात्रा में कई जनपदों से आए पुरुषों के साथ महिलाओं ने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। छोटी पट्टी में स्थित गुरुद्वारे में श्रद्धालुओं ने सबद कीर्तन कर लंगर छका। औरंगजेब के जुल्म को मिटा कर भारतवर्ष की रक्षा के लिए अपने शरीर की आहुति देने वाले गुरु तेग बहादुर साहेब का समागम प्रकाश पर्व गुरुद्वारा में आयोजित किया गया। उनके बलिदानों के चलते उन्हें धर्म रक्षक व हिंद की चादर कहा जाता है। पंजाब के आनंदपुर साहिब से चलकर इलाहाबाद मिर्जापुर होते हुए अहरौरा पहुंचने वाले गुरु तेग बहादुर ने यहीं पर 11 दिन प्रवास किया। भाई साधु सिंह द्वारा लगवाया गया बाग आज गुरु तेग बहादुर बाग के नाम से भी प्रसिद्ध है। उनका प्रकाश पर्व उत्सव के रूप में प्रतिवर्ष हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। तीन दिवसीय प्रकाश पर्व कार्यक्रम पट्टी खुर्द स्थित गुरुद्वारे में तीन दिनों तक लगातार मनाया गया। इस दौरान लाइट के झालरों और फूलो से आकर्षक सजावट की गई। श्रद्धालुओं ने संगत कतार में गुरु ग्रंथ साहिब को मत्था टेका। सजे दीवान में हजूरी रागी जत्था ज्ञान सिंह, हरिमंदर सिंह, नरिंदर सिंह, रनवीर सिंह ने सबद कीर्तन कर उपस्थित लोगों को निहाल किया। वाराणसी से आए हुजुरी रागी जत्था नरेंद्र सिंह ने गुरुवाणी की तथा ज्ञानी जीत सिंह ने गुरुनानक जी की जीवनी पर विस्तार से प्रकाश डाला। प्रकाश पर्व के अवसर पर दिल्ली, सूरत, सिंगरौली, बैढ़न, गोरखी, बिना, शक्ति नगर, जयंत, ओबरा, चोपन, रेणुकूट, रेनू सागर, राजगढ़, भूइली, मिर्जापुर, चकिया, सोनभद्र, वाराणसी, चंदौली, सहित अन्य जनपदों से भी भारी संख्या में सिख समुदाय के लोग उपस्थित हुए। शोभा यात्रा मंगलवार की शाम निकाली गई जो सत्यानगंज से होते हुए चौक बाजार पहुंची और तकिया, खडंजा, सम्मेतर से होकर वापस गुरुद्वारा परिसर मे जाकर समाप्त हो गई। शोभा यात्रा में पंच प्यारे आकर्षक का केंद्र बने रहे। महिलाएं भी रागी जत्था के साथ मिलकर सबद कीर्तन करती रही । पूर्व पालिकाध्यक्ष गुलाब मौर्य द्वारा नगर में जगह जगह जलपान की व्यवस्था की गई। पंच प्यारे हाथो में झंडा लिए आगे बढ़ते रहे। इस दौरान महिलाएं सड़कों पर पानी छिड़कते हुए आस्था के साथ झाड़ू से रास्ता साफ करती रही। प्रबंध कमेटी द्वारा विशिष्ट सेवा करने वाले सेवादारों को सम्मानित किया गया। धार्मिक जत्थेदार ईश्वर सिंह ने कहा, गुरु का नाम जपो, बांट के खाओ, प्रभु की आराधना करो। ईश्वर को पत्थरों में तलाशने की जरूरत नहीं है। प्रभु सबके हृदय में विराज करते हैं बस सच्ची श्रद्धा की आवश्यकता होती है। इस दौरान सरदार कमल सिंह मोट, उपाध्यक्ष सरदार जसवन्त सिंह, उपाध्यक्ष सरदार अमोलक सिंह (प्रिंस), सरदार संतोष सिंह, कोषाध्यक्ष सरदार इंद्रजीत सिंह (सन्नी), गुरु संगत के दास सरदार सुखदेव सिंह, मैनेजर सरदार जसबीर सिंह, ऑडिटर सरदार ईश्वर सिंह (सोनू) के साथ सरदार जगजीत सिंह, सरदार करनैल सिंह, सरदार हरभजन सिंह, सरदार जसप्रीत सिंह, सरदार बीर सिंह, गुरमीत सिंह, गुलाब सिंह सहित सैकड़ों सिख समुदाय के लोग मौजूद रहे।
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इनसेट-

हिंद का चादर नाम से मिली गुरु तेग बहादुर को ख्याति

सिखों के छठे पातशाह हरि गोविंद साहब तथा माता नानकी की कोंख से वैशाख बदी पंचमी संवत 1678 को अमृतसर की पावन धरती पर अवतरित गुरु तेग बहादुर सिंह सिखों के नौवें गुरु पातशाह बने। मुगलिया शासन के कालखंड में औरंगजेब के आतंक को अपने शरीर की आहुति देकर मिटाया तथा हिंदू धर्म की रक्षा की इसके चलते उन्हें धर्म रक्षक हिंद का चादर नाम से सुशोभित किया गया। संवत 1722 को अमृतसर के आनंदपुर से भ्रमण तीर्थ यात्रा के दौरान साधु-संतों और परिजनों के साथ चलकर मालवा होते हुए पंजाब, मथुरा, आगरा, त्रिवेणी पहुंचे जहां यमुना के किनारे ब्राह्मणों को दान दक्षिणा दी। कुछ समय व्यतीत किया गुरुजी का प्रताप देखकर एक माई बहुत प्रसन्न हुई वह उनको अपने घर ले गई जो आज अहियापुर के नाम से प्रसिद्ध है। यहां उन्होंने छह माह का समय व्यतीत किया। तदुपरांत विंध्याचल, मिर्जापुर, चुनार, पटिहटा (प्रतिष्ठता), होते हुए धर्म प्रचार तथा उपदेश के बाबत अहरौरा पहुंचे तथा अनवरत 11 दिन तक प्रवास किया।
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