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सरकारी बसों में आग से बचाव के इंतजाम नहीं
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मिर्जापुर। सरकार की तरफ से यात्रियों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए भले ही योजनाएं बनाई गई हो लेकिन सरकारी बसों में फायर सेफ्टी के इंतजामों को लेकर घोर लापरवाही बरती जा रही है। इन बसों में आगजनी की घटनाएं हुई तो बड़े पैमाने पर जान माल को नुकसान हो सकता है, लेकिन परिवहन निगम की ओर से सुरक्षा पर कोई सावधानी नहीं बरत रहा है। इनकी बसों में अग्निशमन यंत्रों की बात तो दूर स्टेशनों पर भी नहीं लगाए गए हैं। ऐसे में यदि इनमें आग लगने की घटनाएं हुई तो हाहाकार मच जाएगा।
परिवहन विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो यहां तकरीबन 50 से ज्यादा बसों का आवागमन होता है। ऐसे में बस स्टैंड पर हर दिन दो से तीन हजार यात्रियों का आना-जाना रहता है। इससे शहर में भी हर वक्त यात्रियों का तांता लगा रहता है। इनके मद्देनजर स्टैंडों पर तो दो से तीन जगह पर फायर सेफ्टी यानि अग्निशमन यंत्र लगाए गए हैं लेकि न सरकारी बसों में तो वह भी नाकाफी हैं। बसों में आग से बचाव के कोई उपाय नहीं हैं। यह हकीकत केवल लोकल रूट पर चलने वाले बसों में ही नहीं, लंबी दूरी तक चलने वाले बसों की भी है। दर्जनों की संख्या में सवारियों को बैठाकर विभाग की खटारा बसें प्रतिदिन सड़कों पर फर्राटे भरती हैं।
बसों में अग्नि शमन यंत्रों की व्यवस्था नहीं है। बसों में मात्र एक ही प्रवेश और निकास द्वार होने पर यदि अचानक बस में आग लग जाए तो फिर सवार यात्रियों का भगवान ही मालिक। स्थानीय रोडवेज परिसर से प्रयागराज, लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, राबर्ट्सगंज ओबरा, जौनपुर के अलावा मध्य प्रदेश के सीधी, हनुमना तक के लिए प्रतिदिन बसों का संचालन किया जाता है।
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जहां कभी रोडवेज की बसो के अंदर आकस्मिक चिकित्सा व शिकायत पेटिका मौजूद रहती थी। अब नदारद हैं। यदि कोई शिकायत भी तो यात्री करे भी तो किससे। यात्रा के दौरान यदि किसी यात्री को चोट आदि लग जाए तो उपचार की व्यवस्था नहीं। बसों में उच्चाधिकारियों के मोबाइल नंबर लिखे हुए हैं, आवश्यकता पड़ने पर अधिकांश समय वे पहुंच से दूर रहते हैं। यदि किसी तरह से फोन लग भी गया तो जल्द उठता ही नहीं।
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परिवहन विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो यहां तकरीबन 50 से ज्यादा बसों का आवागमन होता है। ऐसे में बस स्टैंड पर हर दिन दो से तीन हजार यात्रियों का आना-जाना रहता है। इससे शहर में भी हर वक्त यात्रियों का तांता लगा रहता है। इनके मद्देनजर स्टैंडों पर तो दो से तीन जगह पर फायर सेफ्टी यानि अग्निशमन यंत्र लगाए गए हैं लेकि न सरकारी बसों में तो वह भी नाकाफी हैं। बसों में आग से बचाव के कोई उपाय नहीं हैं। यह हकीकत केवल लोकल रूट पर चलने वाले बसों में ही नहीं, लंबी दूरी तक चलने वाले बसों की भी है। दर्जनों की संख्या में सवारियों को बैठाकर विभाग की खटारा बसें प्रतिदिन सड़कों पर फर्राटे भरती हैं।
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बसों में अग्नि शमन यंत्रों की व्यवस्था नहीं है। बसों में मात्र एक ही प्रवेश और निकास द्वार होने पर यदि अचानक बस में आग लग जाए तो फिर सवार यात्रियों का भगवान ही मालिक। स्थानीय रोडवेज परिसर से प्रयागराज, लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, राबर्ट्सगंज ओबरा, जौनपुर के अलावा मध्य प्रदेश के सीधी, हनुमना तक के लिए प्रतिदिन बसों का संचालन किया जाता है।
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जहां कभी रोडवेज की बसो के अंदर आकस्मिक चिकित्सा व शिकायत पेटिका मौजूद रहती थी। अब नदारद हैं। यदि कोई शिकायत भी तो यात्री करे भी तो किससे। यात्रा के दौरान यदि किसी यात्री को चोट आदि लग जाए तो उपचार की व्यवस्था नहीं। बसों में उच्चाधिकारियों के मोबाइल नंबर लिखे हुए हैं, आवश्यकता पड़ने पर अधिकांश समय वे पहुंच से दूर रहते हैं। यदि किसी तरह से फोन लग भी गया तो जल्द उठता ही नहीं।