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विद्यालयों और पंचायत भवनों में चल रहे आंगनबाड़ी केंद्र
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जिले के 80 प्रतिशत से अधिक आंगनबाड़ी केंद्रों को अपना खुद का भवन नसीब नहीं हो सका है। यही नहीं, 2239 आंगनबाड़ी केंद्र दूसरे विभागों के भवनों में संचालित हो रहे हैं। स्कूल, पंचायत भवन एवं किराये के मकानों में केंद्रों का संचालन कर बच्चों को शिक्षा देने के साथ ही पोषाहार दिया जा रहा है।
सरकार की ओर से शिशु एवं मातृ मृत्यु दर रोकने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। अति कुपोषित व कुपोषित बच्चों और धात्रियों को पोषणयुक्त सामग्री देने के लिए बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग की ओर से हर गांव में आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं। केंद्रों पर पोषाहार, दवाएं देने के साथ ही खेल-खेल में बच्चों को पढ़ाया भी जाता है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार जिले में 2668 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं। कई साल बीत जाने के बाद भी इन केंद्रों को अपना भवन नसीब नहीं हो सका है। जिले में 1685 आंगनबाड़ी केंद्र प्राथमिक विद्यालयों के भवनों और 548 पंचायत भवनों में चल रहे हैं। इनके अलावा 429 आंगनबाड़ी केंद्र खुद के भवन और छह किराए के कमरे में संचालित हो रहे हैं। समुचित देखरेख नहीं होने से एक से डेढ़ दशक पूर्व बने आंगनबाड़ी केंद्रों के भवन जर्जर हो चुके हैं। कई भवन तो बैठने लायक तक नहीं हैं। जिले में आंगनबाड़ी केंद्रों की बदहाली का आलम यह है कि शून्य से पांच वर्ष तक के बच्चों को हवा पानी तक के लिए तरसना पड़ता है। कई आंगनबाड़ी केंद्रों में पेयजल की व्यवस्था नहीं है और कई में शौचालय की सुविधा तक नहीं है। इसी तरह से कई आंगनबाड़ी केंद्रों में बिजली का कनेक्शन तक नहीं है। इससे इस प्रचंड गर्मी में बच्चों को परेशान होना पड़ता है। जिला कार्यक्रम अधिकारी वाणी वर्मा का कहना है कि सभी सीडीपीओ से बिजली, पानी और शौचालय विहीन केंद्रों की सूची मांगी गई है। जल्द ही समस्याएं दूर कर ली जाएंगी। उधर, जिले में 25 आंगनबाड़ी केंद्रों का निर्माण अधर में लटका हुआ है। जिले के अति पिछड़े इलाके के अनुसूचित जातियों की विशेष घटक योजना के तहत 25 आंगनबाड़ी केंद्रों के भवनों का निर्माण होना था, लेकिन यह अधर में लटका हुआ है। इस योजना के तहत हलिया में तीन, मझवां में दो, नरायनपुर में तीन, सीखड़ में एक, राजगढ़ में तीन, जमालपुर व छानबे में दो- दो तथा लालगंज के एक गांव में आंगनबाड़ी केंद्र भवन का निर्माण होना है, लेकिन निर्माण कार्य प्रारंभ नहीं हो सका है।
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सरकार की ओर से शिशु एवं मातृ मृत्यु दर रोकने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। अति कुपोषित व कुपोषित बच्चों और धात्रियों को पोषणयुक्त सामग्री देने के लिए बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग की ओर से हर गांव में आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं। केंद्रों पर पोषाहार, दवाएं देने के साथ ही खेल-खेल में बच्चों को पढ़ाया भी जाता है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार जिले में 2668 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं। कई साल बीत जाने के बाद भी इन केंद्रों को अपना भवन नसीब नहीं हो सका है। जिले में 1685 आंगनबाड़ी केंद्र प्राथमिक विद्यालयों के भवनों और 548 पंचायत भवनों में चल रहे हैं। इनके अलावा 429 आंगनबाड़ी केंद्र खुद के भवन और छह किराए के कमरे में संचालित हो रहे हैं। समुचित देखरेख नहीं होने से एक से डेढ़ दशक पूर्व बने आंगनबाड़ी केंद्रों के भवन जर्जर हो चुके हैं। कई भवन तो बैठने लायक तक नहीं हैं। जिले में आंगनबाड़ी केंद्रों की बदहाली का आलम यह है कि शून्य से पांच वर्ष तक के बच्चों को हवा पानी तक के लिए तरसना पड़ता है। कई आंगनबाड़ी केंद्रों में पेयजल की व्यवस्था नहीं है और कई में शौचालय की सुविधा तक नहीं है। इसी तरह से कई आंगनबाड़ी केंद्रों में बिजली का कनेक्शन तक नहीं है। इससे इस प्रचंड गर्मी में बच्चों को परेशान होना पड़ता है। जिला कार्यक्रम अधिकारी वाणी वर्मा का कहना है कि सभी सीडीपीओ से बिजली, पानी और शौचालय विहीन केंद्रों की सूची मांगी गई है। जल्द ही समस्याएं दूर कर ली जाएंगी। उधर, जिले में 25 आंगनबाड़ी केंद्रों का निर्माण अधर में लटका हुआ है। जिले के अति पिछड़े इलाके के अनुसूचित जातियों की विशेष घटक योजना के तहत 25 आंगनबाड़ी केंद्रों के भवनों का निर्माण होना था, लेकिन यह अधर में लटका हुआ है। इस योजना के तहत हलिया में तीन, मझवां में दो, नरायनपुर में तीन, सीखड़ में एक, राजगढ़ में तीन, जमालपुर व छानबे में दो- दो तथा लालगंज के एक गांव में आंगनबाड़ी केंद्र भवन का निर्माण होना है, लेकिन निर्माण कार्य प्रारंभ नहीं हो सका है।
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