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भवसागर से पार के लिए आत्मतत्व ही सहारा

Wed, 26 Nov 2014 05:30 AM IST
Mirzapur
Mirzapur Updated Wed, 26 Nov 2014 05:30 AM IST
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लालगंज। सत्संग भ्रांतियों को दूर करने का काम करता है। धर्म से एकता, संतोष, आत्म-भाव और शांति मिलती है। राग-द्वेष, काम-क्रोध, लोभ विकाराें के ढांचे हैं। मानव समाज को सद्गुरु के शरण में रहकर धर्म का पालन करना चाहिए। यह बातें मंगलवार को जैकर कला स्थित श्री परमहंस आश्रम में आयोजित दिव्य सत्संग के दौरान स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज ने कही।
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सत्संग के दौरान स्वामी अड़गड़ानंद जी ने कहा कि छुआछूत, भेदभाव धर्म नहीं बल्कि आडंबर है। संसार एक समुद्र है, संसाररूपी समुद्र के भवसागर से पार जाने के लिए आत्म तत्व ही एकमात्र सहारा है। स्वामी जी ने कहा कि कबीर, दयानंद, नानक, तुलसीदास ने आडंबरों से मुक्त कराने का कार्य किया। सभी संताें ने बताया कि भगवान एक है। ईश्वर के नियमाें का पालन करना ही धर्म है। स्वामी जी ने कहा कि धार्मिक कार्य अहंकार का भ्रम दूर करता है। तुलसीदास ने रामचरित मानस लोकभाषा में लिखकर नया मार्ग दिया। काकभुसुंडी का उदाहरण देते हुए स्वामी जी ने कहा कि वह नीच कुल के बताए गए, लेकिन उन्होंने भ्रम का निवारण और अहंकार मिटाने का कार्य किया। बुद्ध, जैन, महावीर तपस्या के बल पर बुद्धिष्ट बने। इस अवसर पर आश्रम परिसर में विशाल भंडारे का भी आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में भक्ताें ने प्रसाद ग्रहण किया। इस दौरान श्री परमहंस आश्रम के स्वामी भावानंद जी सहित एसडीएम जीएस राम सहित बड़ी संख्या में भक्तजन मौजूद रहे।
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