फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Mirzapur News ›   दो हजार साल पुराना चुनार किला नष्ट होने के कगार पर

दो हजार साल पुराना चुनार किला नष्ट होने के कगार पर

Sun, 17 Jun 2018 12:12 AM IST
Updated Sun, 17 Jun 2018 12:12 AM IST
विज्ञापन
दो हजार साल पुराना चुनार किला नष्ट होने के कगार पर
चुनार। देखरेख और मरम्मत के अभाव में ऐतिहासिक दुर्ग का स्वरूप बिगड़ता जा रहा है। पर्यटन के रूप से महत्वपूर्ण इस किले की दीवारें जर्जर हो गई हैैं। पांच दशक से ज्यादा समय तक दुर्ग परिसर में पुलिस का कब्जा रहा। आरटीसी चुनार का नया भवन बनने के बाद दुर्ग के एक एक हिस्से से पुलिस कब्जा नहीं हटा रही है।
विज्ञापन

ऐतिहासिक चुनार दुर्ग का पुनर्निर्माण शेरशाह सूरी ने कराया था। किले के चारों तरफ ऊंची दीवारें हैं। यहां से सूर्य का नजारा देखना काफी मनोहारी होता है। दुर्ग के गेट पर लकड़ी के मोटा मजबूत दरवाजा लगाया गया है। किवाड़ के एक हिस्से में एक छोटा द्वार बना हुआ था जिसका प्रयोग बहुत आवश्यक होने पर आने जाने के लिए होता था। कई सौ वर्ष पुराना यह किवाड़ जीर्ण शीर्ण हो गया है और बंद होने की स्थिति में भी नहीं रह गया है। इस दुर्ग पर जब औरंगजेब का आधिपत्य हुआ तो उसने एक और द्वार का निर्माण कराया जिसे पश्चिमी द्वार के नाम से जाना जाता है। उस दौरान सुरक्षा की दृष्टि से इस द्वार पर भी सैनिकों का पहरा होता था। सुबह होने पर दोनों द्वार खुलते और शाम ढलने के बाद बंद होते थे। अब दुर्ग के पूर्वी द्वार से लोगों के आने जाने पर पाबंदी लगा दी गई है। पश्चिमी द्वार पर सरिया बना गेट क्षतिग्रस्त हो गया है। ऐसे में किले का पश्चिमी द्वार सुरक्षा की दृष्टि से कितना उपयोगी शेष है। यह एक अहम विषय है। यदि पुरातत्व विभाग ने पूर्वी व पश्चिमी द्वार की मरम्मत पर ध्यान नहीं दिया तो दुर्ग का वास्तविक स्वरूप समाप्त हो जाएगा। गंगा के किनारे स्थित यह दुर्ग एक समय में हिंदू शक्ति का केंद्र था। हिंदू काल के भवनों के अवशेष अब भी इस किले में हैं, जिनमें महत्वपूर्ण चित्र अंकित हैं। किले में विक्रमादित्य का बनवाया हुआ भतृहरि मंदिर है जिसमें उनकी समाधि है। किले में मुगलों के मकबरे भी हैं। किले में सोनवा मण्डप, सूर्य धूपघड़ी और विशाल कुंआ मौजूद है।
विज्ञापन

मुगल बादशाह हुमायू और शेरशाह के बीच हुए युद्धों में इस किले का विशेष महत्व रहा है। 1539 ई. में शेरशाह ने दुर्ग पर अधिकार कर लिया। अकबर के शासनकाल में 1575 में इस पर पुन: मुगलों का अधिकार हो गया। 18वीं शताब्दी में यह किला अवध के नवाब के अधिकार में रहा। 1763-64 में दुर्ग को अंग्रेजों ने जनरल कार्नाक के सेनापतित्व में छीन लिया। इसके बाद सितंबर 1781 में इसके संबंध में एक संधिपत्र पर अवध के नवाब तथा हेंस्टिंग्ज ने हस्ताक्षर किए।
विज्ञापन
विज्ञापन

साहित्यकार कमलेश्वर कमल ने कहा कि पहले बड़ी संख्या में छात्र छात्राएं समेत अन्य पर्यटक दुर्ग में घूमने आते थे लेकिन दुर्ग में स्थित अधिकांश क्षेत्रों में घूमने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसके चलते कम लोग आते हैं। चिकित्सक डा. भागवत सिंह ने कहा कि दुर्ग में पेयजल एवं उठने बैठने की समुचित व्यवस्था नहीं है। इसके चलते दुर्ग में घूमने आने वाले लोगों की संख्या में कमी आई है। अधिवक्ता दिनेश अवस्थी ने कहा कि रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड से दुर्ग तक पहुंचने के लिए साधन का भी अभाव है। इसके कारण दुर्ग पर घूमने आने वाले लोगों की संख्या में दिन प्रतिदिन कमी आ रही है। समाजसेवी रफीक आलम ने कहा कि जब तक दुर्ग में रिक्रूट प्रशिक्षण केंद्र था दुर्ग पर घूमने आए लोग अपनी सुरक्षा को लेकर निश्चिंत रहते थे लेकिन अब केंद्र स्थानांतरित हो जाने से दुर्ग में सुरक्षा व्यवस्था का अभाव बना हुआ है। इसके चलते लोग खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं।

क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी वाराणसी सुभाष यादव ने बताया कि दुर्ग का ज्यादातर हिस्से में पुलिस का कब्जा है। पुलिस परिसर खाली करेगी तो मरम्मत के कार्य होंगे। परिसर का जो हिस्सा रिक्त है उसमें काम कराया गया है। तीन साल में पांच करोड़ की लागत से मरम्मत कार्य हुए हैं जो कम है। किले की बेहतरी के लिए काम किया जा रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed