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सॉफ्टवेयर कमजोर... नौसिखिया पुलिस और कैसे कसेंगे अपराधियों पर शिकंजा
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कमजोर सॉफ्टवेयर... तेज बदमाश... कैसे कसेंगे शिकंजा
मेरठ। पुलिस के कमजोर सॉफ्टवेयर का तेज बदमाश पूरा फायदा उठा रहे हैं। पुलिस मोबाइल कंपनी से डाटा मांगने में रह जाती है और अपराधी कोसों दूर निकल जाते हैं। ऐसे में बदमाशों पर कैसे शिकंजा कसा जा सकेगा।
शातिर अपराधी ज्यादातर इंटरनेट या व्हाट्सएप कॉल का प्रयोग करते हैं, लेकिन किसी बड़ी घटना को करने से पहले या बाद अपराधी मोबाइल का प्रयोग नहीं करता, जिसके चलते आसानी से पकड़ में नहीं आ पाते। पुलिस अपराधी को गिरफ्तार कर मोबाइल बरामद कर भी लेती है, इसके बावजूद भी मोबाइल से पुराना डाटा हासिल नहीं करा पाती। बताया जा रहा कि पुलिस के पास डाटा रिकवर कराने वाला सॉफ्टवेयर बेहद कमजोर है, जिसके चलते मोबाइल या लैपटॉप आदि को फॉरेंसिक लैब भेजा जाता है। हालांकि अधिकांश मामलों में लंबी प्रक्रिया के बावजूद डाटा नहीं मिल पाता है। यही कारण होता है कि पुलिस अपराधी और उसके गैंग की कुंडली नहीं खंगाल पाती।
ट्रेनिंग दी, फिर भी कमतर
900 करोड़ की लागत से लखनऊ में हाइटेक कंट्रोल रूम बनाया गया। पुलिस को हाईटेक बनाने के लिए सर्विलांस और साइबर ट्रेनिंग भी लखनऊ में दी गई। इसके बावजूद पुलिस कमतर साबित हो रही है। बताया गया कि इस ट्रेनिंग को जिला स्तर पर लागू नहीं किया गया।
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15-20 दिन बाद कहां मिलेगा बदमाश
सर्विलांस व साइबर सेल में तैनात पुलिसकर्मी कहते हैं कि अपराधी के मोबाइल नंबर की जानकारी लेने के लिए संबंधित कंपनी से डाटा 15-20 दिन में मिलता है, तब तक अपराधी बहुत दूर निकल जाता है, तब तक बदमाश भी दूसरी लाइन पकड़ लेता है। ज्यादातर केसों में पुलिस अपराधियों पर शिकंजा नहीं कस पाती।
एजेंसियों के पास हाईटेक सॉफ्टवेयर
एनआईए, एटीएस समेत कई बड़ी जांच एजेंसियों के पास हाईटेक सॉफ्टवेयर हैं, जिससे वह अपराधियों के मोबाइलों का डाटा भी रिकवर कर लेते हैं, लेकिन पुलिस विभाग वही पुराने ढर्रे पर अपराधियों को मोबाइल की सीडीआर से ही पकड़ने का प्रयास में लगा रहता है।
बेहतर हुआ सिस्टम
तकनीकी सिस्टम पहले से काफी बेहतर हुआ है। इसे और भी मजबूत करने के लिए प्रयास चल रहे हैं। जिन सॉफ्टवेयर से अपराधियों को पकड़ने में मदद मिलती है, वह भी जल्द ही जिला स्तर पर पुलिस को उपलब्ध होंगे। -प्रवीण कुमार आईजी, मेरठ रेंज
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मेरठ। पुलिस के कमजोर सॉफ्टवेयर का तेज बदमाश पूरा फायदा उठा रहे हैं। पुलिस मोबाइल कंपनी से डाटा मांगने में रह जाती है और अपराधी कोसों दूर निकल जाते हैं। ऐसे में बदमाशों पर कैसे शिकंजा कसा जा सकेगा।
शातिर अपराधी ज्यादातर इंटरनेट या व्हाट्सएप कॉल का प्रयोग करते हैं, लेकिन किसी बड़ी घटना को करने से पहले या बाद अपराधी मोबाइल का प्रयोग नहीं करता, जिसके चलते आसानी से पकड़ में नहीं आ पाते। पुलिस अपराधी को गिरफ्तार कर मोबाइल बरामद कर भी लेती है, इसके बावजूद भी मोबाइल से पुराना डाटा हासिल नहीं करा पाती। बताया जा रहा कि पुलिस के पास डाटा रिकवर कराने वाला सॉफ्टवेयर बेहद कमजोर है, जिसके चलते मोबाइल या लैपटॉप आदि को फॉरेंसिक लैब भेजा जाता है। हालांकि अधिकांश मामलों में लंबी प्रक्रिया के बावजूद डाटा नहीं मिल पाता है। यही कारण होता है कि पुलिस अपराधी और उसके गैंग की कुंडली नहीं खंगाल पाती।
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ट्रेनिंग दी, फिर भी कमतर
900 करोड़ की लागत से लखनऊ में हाइटेक कंट्रोल रूम बनाया गया। पुलिस को हाईटेक बनाने के लिए सर्विलांस और साइबर ट्रेनिंग भी लखनऊ में दी गई। इसके बावजूद पुलिस कमतर साबित हो रही है। बताया गया कि इस ट्रेनिंग को जिला स्तर पर लागू नहीं किया गया।
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15-20 दिन बाद कहां मिलेगा बदमाश
सर्विलांस व साइबर सेल में तैनात पुलिसकर्मी कहते हैं कि अपराधी के मोबाइल नंबर की जानकारी लेने के लिए संबंधित कंपनी से डाटा 15-20 दिन में मिलता है, तब तक अपराधी बहुत दूर निकल जाता है, तब तक बदमाश भी दूसरी लाइन पकड़ लेता है। ज्यादातर केसों में पुलिस अपराधियों पर शिकंजा नहीं कस पाती।
एजेंसियों के पास हाईटेक सॉफ्टवेयर
एनआईए, एटीएस समेत कई बड़ी जांच एजेंसियों के पास हाईटेक सॉफ्टवेयर हैं, जिससे वह अपराधियों के मोबाइलों का डाटा भी रिकवर कर लेते हैं, लेकिन पुलिस विभाग वही पुराने ढर्रे पर अपराधियों को मोबाइल की सीडीआर से ही पकड़ने का प्रयास में लगा रहता है।
बेहतर हुआ सिस्टम
तकनीकी सिस्टम पहले से काफी बेहतर हुआ है। इसे और भी मजबूत करने के लिए प्रयास चल रहे हैं। जिन सॉफ्टवेयर से अपराधियों को पकड़ने में मदद मिलती है, वह भी जल्द ही जिला स्तर पर पुलिस को उपलब्ध होंगे। -प्रवीण कुमार आईजी, मेरठ रेंज