शहीदों का गांव : इस गांव में हर घर में रहता है शहीद का परिवार
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विधवाओं के आंसुओं से कराहता। शहादत का गवाह। अंगेजी काल से लेकर कारगिल युद्ध तक इस गांव में शहीदों की लंबी फेहरिस्त है। वतन पर जान तक कुर्बान करने का कोई जज्बा किसी गांव में भरा था, तो वह यही गांव है। यहां शहीदों की मजारों पर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक आते रहे हैं। यह शूरमाओं का ऐसा तीर्थ है, कि विधवाओं के आंसुओं से यह गांव दहाड़े मारकर रोता रहा है।
देश की राजधानी दिल्ली से करीब 70 किमी और बुलन्दशहर जिला मुख्यालय से करीब 25 किमी दूर बसे गांव सैदपुर में शौर्य, साहस और मातृभूमि के लिए जान तक न्यौछावर करने की परंपरा पुरानी है। यहां हर परिवार फौजी का परिवार है। एक दूसरे-तीसरे घर में शहीदों के अदम्य साहस की महागाथा मिलेगी। अंग्रेजी हुकूमत काल की बात करे या आजादी के बाद की। इस गांव के जवानों ने शौर्य, वीरता एवं शहादत की ऐसी इबारत लिखी है। कि इस गांव को फौजियों के गांव के नाम से जाना जाता है।
पराक्रम का सिलसिला विश्वयुद्ध वर्ष 1914 से शुरू हुआ
पिछले सौ साल के इतिहास की बात करें तो पराक्रम का सिलसिला विश्वयुद्ध वर्ष 1914 से शुरू होता है। इसमें अकेले इस गांव से 155 सैनिक जर्मनी गए थे, जिनमें से 29 शहीद हो गए और 100 जवान वहीं बस गए। जहां निवास किया उसका नाम जाटलैंड रखा। 1962 के भारत-चीन युद्ध हो या फिर 1965 और 1971 के युद्ध में इस गांव के सैनिकों ने बहुत आहुति दी थी। नोसेना, वायुसेना और मिलेट्री में भर्ती होना यहां के खून में ही बसा है। सैदपुर ने हर लड़ाई में आहुति दी है। यह गांव 171 शहीदों की लम्बी फेहरिस्त का गवाह है। 1971 के युद्ध में विजय सिरोही व मोहन सिरोही एक ही दिन शहीद हुए थे।
1965 की लड़ाई में सैदपुर के सुखबीर सिंह सिरोही को परमवीर चक्र मिला था। इसके अलावा सैदपुर की आंचल में शौर्य एवं साहस के लिए देश-प्रदेश से मिले दर्जनों मेडल है।
केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री रहते इंदिरा गांधी भारत-पाक युद्ध में शहादत देने वाले लेफ्टिनेंट सुखबीर सिंह सिरोही का अस्थि कलश लेकर स्वयं पहुंची थीं। सैदपुर गांव के बीचों बीच शहीद स्तंभ यहां की गौरव गाथा का बखान करता है। तो वहीं मेन रोड पर मिलेट्री हिरोज मेमोरियल इंटर कॉलेज यहां के नवयुवकों को देश के प्रति एक अलग साहस जगाता है।
इस गांव में फौजियों की करीब 250 विधवाएं है
शहीद स्तंभ पर पूर्व प्रधानमंत्री स्व इंदिरा गांधी व चौधरी चरण सिंह आ चुके हैं। इनके अलावा प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए बाबू बनारसी दास, रक्षा मंत्री रहते मुलायम सिंह यादव, राजा बच्चू सिंह और चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत यहां आ चुके हैं। शहीद और सेवानिवृत्त मिलाकर सैदपुर में फौजियों की करीब 250 विधवाएं है। पतियों ने अगर सीमा पर दुश्मनों से लोहा लेते हुए प्राण न्यौछावर किए तो पत्नियां भी उनके बलिदान में सहभागी बनीं।
1999 कारगिल युद्ध में यहां के शहीद सुरेंद्र सिंह दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हुए थे। जब उनका शव तिरंगे में लिपटा हुआ पहुंचा तो शहीद को नम आँखों से विदाई देने एक लाख से ज्यादा का जन सैलाब था।
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