यूपी चुनाव 2022: मेरठ की इस सीट पर खींचतान जारी, क्या होगा अखिलेश-जयंत का फैसला, लोगों को बेसब्री से इंतजार
मेरठ की सिवालखास सीट पर अभी पेंच फंसा हुआ है। लोगों को बेसब्री से इंतजार है कि आखिर अखिलेश और जयंत का इस सीट पर क्या फैसला होगा।
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मेरठ में सिवालखास विधानसभा सीट पर गठबंधन प्रत्याशी के लिए चल रही खींचतान खत्म नहीं हो रही है। सपा प्रमुख इस सीट पर पूर्व विधायक गुलाम मोहम्मद के लिए अड़े हैं तो रालोद प्रमुख इस सीट को अपने पाले में चाहते हैं।
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार अब इस सीट पर गठबंधन के बीच फ्रैंडली फाइट हो सकती है। सपा द्वारा प्रत्याशी उतारे जाने पर रालोद भी अपने सिंबल पर अपने प्रत्याशी को उतार सकती है। मुस्लिम वोटरों की सर्वाधिक संख्या के बाद यहां जाट मतदाता सबसे ज्यादा है। मेरठ में गठबंधन द्वारा जाट प्रत्याशी नहीं बनाए जाने का खामियाजा भी गठबंधन को भुगतना पड़ सकता है। गठबंधन जहां पहले ही तीन जनपद की सात सीटों में से तीन सीटों पर मुस्लिमों को टिकट दे चुका है। वहीं गुलाम मोहम्मद को टिकट मिला तो ये चौथा मुस्लिम टिकट होगा। रालोद का गढ़ मानी जाने वाली इस सीट पर रालोद के प्रत्याशी ही सबसे ज्यादा बार विजयी रहे हैं। टिकट के लिये पूर्व विधायक गुलाम मोहम्मद कई दिन से लखनऊ में डेरा डाले हुए हैं तो वहीं रालोद नेता भी दिल्ली में उपस्थित है। रालोद से टिकट की दौड़ में डॉक्टर राजकुमार सांगवान, सुनील रोहटा, यशवीर सिंह और रणबीर दहिया शामिल है।
सोशल मीडिया पर चल रहा वार-पलटवार
पिछले कई दिन से गठबंधन के प्रत्याशियों की सूची लगातार जारी हो रही है। सोमवार को भी रालोद ने छपरौली और बड़ौत की घोषणा की है, लेकिन सिवालखास का मामला नहीं सुलझ पा रहा है। वहीं क्षेत्र में सपा और रालोद समर्थक सोशल मीडिया पर जमकर बैटिंग कर रहे हैं। हर कोई अपनी पार्टी और अपने नेता को टिकट मिलने की पोस्ट डालकर चुनाव लड़ाने का दावा कर रहे हैं।
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बागपत लोकसभा की सीट है सिवालखास
सिवालखास सीट बागपत लोकसभा सीट के अंतर्गत आती है। यहां से रालोद प्रमुख चौधरी जयंत सिंह के दादा पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और जयंत के पिता पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी अजित सिंह कई बार सांसद रहे हैं। पिछला लोकसभा चुनाव जयंत ने इसी सीट से लड़ा था, हालांकि वे एक कड़े मुकाबले में भाजपा सांसद डॉक्टर सतपाल सिंह से हार गए थे। जयंत इस सीट को हर हाल में अपनी पार्टी के लिये चाहते हैं। यहीं वो पेंच है जो निकल नहीं पा रहा है।
नहीं सुलझा मामला तो हो सकती है फ्रैंडली फाइट
अगर मंगलवार को ये मामला नहीं निपटा तो पार्टी अपने-अपने सिंबल पर प्रत्याशी घोषित कर सकती है। ऐसे में दोनों दलों के बीच फ्रैंडली फाइट होने की नौबत रहेगी। हालांकि ऐसा होने का फायदा गैर गठबंधन प्रत्याशी उठा सकते हैं।
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जाटों को साधना होगा मुश्किल
रालोद को टिकट नहीं मिलने की स्थिति में जाट मतदाताओं को संभालना रालोद के लिए मुश्किल हो सकता है। जाट नेताओं का कहना है कि जनपद में उन्हें भी कोटे की एक सीट चाहिए। पहले इस सीट से रालोद पांच बार विजयी रहा है। परिसीमन के बाद 2012 में सुरक्षित से सामान्य हुई सीट पर रालोद प्रत्याशी विजयी तो नहीं हुआ लेकिन, 2012 में दूसरे और 2017 में तीसरे नंबर पर रहा था।