जन औषधि केंद्रों की सच्चाई, नहीं हैं पूरी दवाई
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यह हालात तब हैं, जब जिला अस्पताल में प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र खुले हुए करीब आठ माह हो गए हैं। मेडिकल में तीन माह का समय हो गया है। दवाओं की किल्लत की वजह से ही जिला अस्पताल में जन औषधि केंद्र शुरू होने के एक माह बाद ही कुछ दिन के लिए बंद करना पड़ा था। इस संबंध में जन औषधि केंद्र संचालक शासन को पत्र लिख चुके हैं, लेकिन हल नहीं निकल सका है। जिला अस्पताल में लिखी गईं दवाइयां जन औषधि केंद्र पर नहीं मिल रही हैं। इस कारण लोगों को सस्ती दवाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। वहीं मेडिकल कॉलेज में जन औषधि केंद्र से जुड़े स्टाफ का कहना है कि चिकित्सक मरीजों को बाहर की दवाएं लिखते हैं, जबकि जन औषधि केंद्र की दवाइयां उनके मुकाबले सस्ती हैं।
जेनेरिक दवाइयां
एक ही सॉल्ट की दवाइयों के दाम कंपनी या ब्रांड के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं। जिस सॉल्ट की दवा 100 रुपये की मिलती है, किसी दूसरी कंपनी में वही दवा 20 रुपये की भी मिल सकती है। किसी भी दवा का जेनेरिक नाम पूरे विश्व में एक ही होता है। बीमारी के लिए डॉक्टर जो दवा लिखते हैं, उसी दवा के सॉल्ट वाली जेनेरिक दवाएं जन औषधि केंद्र पर मिल सकती हैं, बशर्ते वे उपलब्ध हों। ये जेनेरिक दवाएं उत्पादक से सीधे रिटेलर तक पहुंचती हैं। कीमत का यह अंतर पांच से दस गुना तक हो सकता है।
दवाइयां बढ़ाने की कोशिश
अभी जन औषधि केंद्रों पर 250-300 तरह की दवाइयां हैं। सर्जिकल आइटम कम हैं। कोशिश की जा रही है कि ज्यादा से ज्यादा दवाइयां केंद्रों को मिल सकें।
- गौतम कपूर, नोडल अधिकारी, जन औषधि केंद्र