देश के लिए दांव पर लगा दिया घर-परिवार, भारत छोड़ो आंदोलन में निभाई थी अहम भूमिका
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भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत 8 अगस्त 1942 को हुई थी। मेरठ के रणबाकुंरों ने भी भारत छोड़ो आंदोलन में अहम भूमिका निभाई थी। सेना में उच्च पदों पर तैनात अधिकारियों ने 1857 की तरह बगावत कर दी थी। जिसके बाद उन्हें कोर्ट मार्शल का सामना करना पड़ा। वहीं, कुछ स्वतंत्रता सेनानियों को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया था। इन स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों ने बताया कि उन्होंने देशभक्ति के बदले न कोई पेंशन और न ही कोई सरकारी सुविधा ली।
घरों में लगा दी थी आग
स्वतंत्रता सेनानियों में पंडित श्रीराम शर्मा भी थे। महेश चंद्र शर्मा ने बताया कि उनके नाना पंडित श्रीराम शर्मा को बम बनाते हुए अंग्रेजों ने पकड़ा था। अंग्रेजों ने उनके घर में आग लगा दी गई और बम से मकान को उड़ा दिया। उस दौरान उनकी नानी गर्भावस्था में थी। नाना लगभग दो साल जेल में रहे, लेकिन उन्होंने आजादी के बाद न कोई सरकारी सुविधा ली और न ही पेंशन ली। वह 1990 तक जीवित रहीं। घर में अगर भट्टी जलती हुई देख लेती थीं तो वह दहशत में आ जाती थीं। उनके मामा गया प्रसाद शर्मा एडीएम थे।
एक ही लक्ष्य था पूर्ण स्वराज
हाइड्रिल से रिटायर्ड महेश चंद्र शर्मा ने बताया कि उनके पिता पंडित बसंत लाल शर्मा सूबेदार के पद पर तैनात थे। परिवार मेरठ के गांव जटपुरा में रहता था। उन्होंने बताया कि पिता ने सैनिक विद्रोह कर दिया था। उन्होंने सैनिकों को भारत छोड़ो आंदोलन को लेकर पर्चे भी बांटे थे। फलस्वरूप उनका कोर्ट मार्शल कर दिया गया था। पिता ने गांधी जी के आंदोलन में भागीदारी की। साथ ही पूर्ण स्वराज का लक्ष्य बनाया।
जीवनभर नहीं ली पेंशन
महेश चंद्र शर्मा ने बताया कि उनके परिवार ने देश के लिए अपना फर्ज निभाया, जिसके बदले उन्होंने सरकार से कोई पेंशन नहीं ली। लंबे समय तक परिवार ने बड़ी मुश्किलों का सामना किया। आजादी के बाद पंडित बसंत लाल शर्मा की सरकारी नौकरी लग गई थी।
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