सीसीएसयू में डिग्री-मार्कशीट का दलाल राज

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Updated Tue, 26 Mar 2019 04:21 AM IST
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चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में जिस काम को करने में तमाम सरकारी अड़ंगे लगाए जाते हैं, उसे दलाल तीन घंटे में पूरा करा दे रहे हैं। घूसखोरी का आलम यह है कि फोटो स्टेट की दुकानों से लेकर चाय और पान के खोखे तक वाले युवाओं से पैसे लेकर हाथोंहाथ डिग्री निकलवा रहे हैं। ये कोई किस्सा-कहानी नहीं बल्कि हकीकत है यूनिवर्सिटी के उस दागदार सिस्टम की, जिसका रोजाना कितने ही बेरोजगार युवा शिकार बन रहे हैं। घूसखोरी की गंदी तस्वीर को जानने के लिए सोमवार को अमर उजाला ने स्टिंग ऑपरेशन किया तो महज ढाई घंटे में ही छह सौ रुपये में डिग्री हाथ में आ गई। जो युवा घूस नहीं दे रहा वो या तो सिर पकड़कर रो रहा है। या फिर मजबूर है महीनों कैंपस के चक्कर लगाने को।
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यूनिवर्सिटी में रोजाना करीब 200-300 छात्र-छात्राएं डुप्लीकेट मार्कशीट, डिग्री, ट्रांसक्रिप्ट और अन्य प्रमाणपत्र बनवाने के लिए तमाम राज्यों तक से आते हैं। कई साल पहले यूनिवर्सिटी ने इसके लिए सिंगल विंडो सिस्टम की शुरुआत की थी। अब छात्रों को कैंपस स्थित इलाहाबाद बैंक से फार्म लेना होता है। फार्म भरकर कागजात लगाने के बाद उसको बैंक के बराबर में वहीं बनाए गए छात्र समस्या निवारण केंद्र पर जमा करा दिया जाता है। शुरू में यह व्यवस्था ठीक चली। लेकिन इसके बाद दलालों ने पूरे सिस्टम को भेद डाला। महीनों तक भी छात्रों के प्रमाणपत्र नहीं मिलने की शिकायतें आनी शुरू हो गईं। लेकिन यूनिवर्सिटी प्रशासन ने दावा किया कि गोपनीय विभाग में कोई गड़बड़ी नहीं है। वहां पर सारा काम नियम कायदे से हो रहा है। अमर उजाला ने गोपनीय विभाग में हो रहे काम और यूनिवर्सिटी प्रशासन के दावों की हकीकत जानी तो चौंकाने वाली स्याह तस्वीर सामने आई।
डिग्री 600-1000, मार्कशीट के 1500 तक...
सोमवार को अमर उजाला रिपोर्टर ने इलाहाबाद बैंक से डिग्री का फार्म लिया तो यहीं से दलालों का मिलना शुरू हो गया। दलाल छात्र-छात्राओं से पूछ रहे थे कि साथ के साथ मार्कशीट या डिग्री चाहिए तो कुछ खर्च करना पड़ेगा। दोपहर डेढ़ बजे ऐसे ही एक दलाल से रिपोर्टर की बातचीत शुरू हो गई।
रिपोर्टर: 2009 की एमएससी की डिग्री निकलवानी है। आज ही चाहिए।
दलाल: हां, हां चिंता मत करो। आज ही निकल जाएगी।
रिपोर्टर : कितने पैसे लगेंगे?
दलाल: छह सौ रुपये और फार्म भरकर दे दो।
रिपोर्टर : ज्यादा नहीं हैं, पांच सौ रुपये कर लीजिए?
दलाल: भइया, हमें तो सौ रुपये ही मिल रहे हैं, पांच सौ रुपये भीतर कर्मचारी को देने हैं, ऐसे में मजबूरी है। ऐसा नहीं करोगे तो कर्मचारी तुमको घुमाते रहेंगे।
रिपोर्टर: ठीक है, अच्छा मार्कशीट कितने में बन जाएगी?
दलाल : उसके लिए एक हजार लगेंगे। डिग्री एक दिन में और मार्कशीट दो दिन में मिलेगी। यहां सबसे कम हैं। भीतर जाओगे तो वहां पर मार्कशीट के 15 सौ तक देने पड़ेंगे।
रिपोर्टर: ठीक है भइया।
शाम साढ़े चार बजे बाहर से व्यक्ति कैंपस जाता है और यूनिवर्सिटी के कर्मचारी से तीन डिग्री ले आता है। रिपोर्टर और दो अन्य छात्रों से पैसे लेकर डिग्री दे दी। एक सज्जन पत्नी के साथ दिल्ली से आए थे। उन्होंने बताया कि जिस काम के लिए चक्कर काट चुके थे, वो आज छह सौ रुपये में हो गया।
आखिर क्या कर रहे अफसर
यूनिवर्सिटी प्रशासन का दावा था कि रोजाना 150 से 200 डिग्री-मार्कशीट छात्रों को उनके लिखे लिफाफों पर पोस्ट की जाती हैं। सवाल ये है कि जब छात्रों के एक मार्च तक किए गए आवेदन भी पूरे नहीं हुए तो 25 मार्च को भरे गए फार्म पर डिग्री कैसे जारी हो गई। वो भी हाथोंहाथ। ऐसे में साफ हो गया है कि दलाल पूरे सिस्टम पर कितने हावी हैं। कई छात्रों का तो आरोप है कि इसमें कई अफसर भी लिप्त हैं। यूनिवर्सिटी कैंपस में घूमते इन दलालों पर भी कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही। ऐसे में सवाल ये है कि उच्च शिक्षा की डिग्री बांटने वाले संस्थान में ऐसा होगा तो युवा किस दिशा में जाएगा।
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