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तनाव से बढ़ रहे सुसाइड के केस

Sat, 10 Sep 2016 02:26 AM IST
अमर उजाला ब्यूरों
अमर उजाला ब्यूरों Updated Sat, 10 Sep 2016 02:26 AM IST
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tanav se badhe
फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
 खत्म होती संयुक्त परिवार की प्रथा और भागदौड़ भरी जिंदगी तनाव को जन्म दे रही है। कई मामलों में यह तनाव सुसाइड का कारण बन रहा है। कुछ सालों में ऐसे मामलों में इजाफा हुआ है जिसमें लोगों ने मौत को गले लगा लिया। खासकर युवा अवस्था में सुसाइड के मामले ज्यादा देखे गए हैं।
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  शनिवार को वर्ल्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे है। इसके जरिये दुनिया भर को संदेश दिया जाता है कि किस तरह आत्महत्या से बचा जा सकता है। मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. रवि राणा का कहना है कि सुसाइड के मामलों को कनेक्ट, कम्यूनिकेट और केयर के जरिये रोका जा सकता है। अगर कोई व्यक्ति घरेलू या फिर ऑफिस से जुड़ी परेशानी में है तो थोड़े समय के बाद परेशानी तनाव का कारण बनती है। केस स्टडी बताती है कि जब लोग किसी समस्या में घिर जाते हैं और उससे निकलने का कोई रास्ता नहीं दिखाई देता है तो तनाव बढ़ता जाता है। ऐसे में यदि किसी व्यक्ति की काउंसिलिंग कर दी जाए तो वह सुसाइड से बच सकता है। इसलिए परिवार के सदस्य के पास कनेक्शन रहना चाहिए, उससे संवाद होना चाहिए। यह भी एक तरह की काउंसिलिंग है, जिससे व्यक्ति के ऊपर से मानसिक बोझ कम होता है।
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हर साल 8 लाख करते हैं सुसाइड
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े भी बताते हैं कि करीब आठ लाख लोग दुनिया भर में हर साल जान दे देते हैं। चिकित्सक आत्महत्या करने को भी एक बीमारी के तौर पर देख हैं, जिससे काफी हद तक कम किया जा सकता है। बशर्ते समय पर काउंसिलिंग और व्यक्ति को इलाज मुहैया होना चाहिये।
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यह कहता है विश्व स्वास्थ्य संगठन
 डब्ल्यूएचओ की स्टडी बताती है कि उन देशों में लोग आत्महत्या ज्यादा करते हैं जो प्रति व्यक्ति आय कम हैं, जिससे साफ हो जाता है कि आत्म हत्या के पीछे आर्थिक स्थिति सबसे बड़ा फैक्टर है। इसके साथ ही 15 से 29 वर्ष की आयु वर्ग में मौत के सबसे ज्यादा मामले देखने को मिल हैं। जो यह बताता है कि युवा अवस्था में सहनशक्ति कम होने के कारण आत्महत्या के मामले ज्यादा है।
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