सोशल नेटवर्किंग साइट्स युवाओं के लिए तनाव, अशांति और क्रोध का कारण, जानिए ऐसा क्यों ?
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दूर बैठे रिश्तेदारों, दोस्तों से जोड़े रखने वाली सोशल नेटवर्किंग साइट्स युवाओं के लिए तनाव, अशांति और क्रोध का भी कारण बन रही हैं। एकसाथ कई सोशल साइट्स पर एक्टिव रहने के कारण युवाओं में मानसिक विकार उत्पन्न हो रहे हैं। उनकी पढ़ाई पर असर पड़ रहा है। उनमें तनाव और चिड़चिड़ापन पनप रहा है। शहर के मनोचिकित्सकों के पास ऐसे मामले बढ़ते जा रहे हैं। जब स्कूलों में बोर्ड परीक्षाओं का दौर शुरू होने वाला है, ऐसे में सोशल नेटवर्किंग साइट की लत फ्यूचर को अंधेरे की ओर ले जा रही है। अभिभावक इस परेशानी को मनोचिकित्सकों से शेयर कर रहे हैं।
केस वन
पांडव नगर निवासी दीपजा 12वीं क्लास में पढ़ती है। 15 दिन से उसके व्यवहार में परिवर्तन आ गया है। वह मम्मी से झल्लाकर बात करने लगी है। हर बात पर चिढ़ती है। फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम हैंडल करती है। मम्मी ने दीपजा से गुस्से का कारण पूछा, तो पता चला कि फेसबुक पर फोटो पर लाइक्स कम मिलने पर वह तनाव में आ जाती है। मम्मी ने इंटरनेट कनेक्शन हटवा दिया, तो दीपजा ने पूरे दिन खाना नहीं खाया। आखिर में मम्मी को बेटी के लिए डॉक्टर से सलाह लेने पड़ी।
केस टू
शास्त्रीनगर की रहने वाली शिवांगनी मेडिकल एंट्रेस एग्जाम की तैयारी कर रही है। दिन में पांच घंटे सोशल साइट को देती है। बार-बार तस्वीर पोस्ट करना, व्हाट्सएप की डिस्प्ले फोटो और स्टेटस बदलना उसका रोजाना का काम है। स्टेटस बदलने के लिए शायरी भी ढूंढनी पड़ती है। पढ़ाई से ज्यादा वक्त सोशल साइट में खप जाता है। मम्मी ने शिवांगनी को ऐसा करने से मना किया, तो उसने गुस्से में मोबाइल पटक दिया। मम्मी उसे डॉक्टर के पास ले गईं, तो डॉक्टर ने शिवांगनी को डिप्रेशन का मरीज बताया।
बढ़ती सोशल साइट्स बनी परेशानी
ऑरकुट से शुरू हुआ दौर अब लाइव वीडियो व्हाट्सएप चैट तक जा पहुंचा है। इसमें व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर, गूगल चैट, गूगल प्लस, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, रेडिट, वीचैट, टंबलर, पिनट्रेस्ट, लिंक्डइन आदि शामिल हैं। इन साइट्स की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। हर साइट एक नई खूबी के साथ आ रही है, जिससे जुड़ने से युवा खुद को रोक नहीं पाते हैं।
परिवार से कट रहे बच्चे
जिस उम्र में बच्चों को माता-पिता या घर के बुजुर्गों के साथ बैठकर आचार-व्यवहार सीखना चाहिए, उस उम्र में बच्चे व युवा सोशल साइट्स को ज्यादा समय दे रहे हैं। इस कारण वे मिलनसार नहीं बन पाते। वह समाज और परिवार से भी कट रहे हैं।
- साइकोलॉजिस्ट डॉॅ. पूनम देवदत्त
मोबाइल स्क्रीन आंखों के लिए खतरनाक
सोशल साइट्स के ज्यादा इस्तेमाल से बच्चों का व्यवहार खराब हो रहा है। मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाले रेडिएशन का आंखों पर असर पड़ता है। थकान और नर्वस सिस्टम को नुकसान होता है। - डॉ. रवि राणा, मनोचिकित्सक मेडिकल कॉलेज
अभिभावक पूछते हैं, कैसे मैनेज करें
सीबीएसई बोर्ड परीक्षाओं की डेटशीट आने वाली है। ऐसे में स्टूडेंट्स को पढ़ाई में पूरी मेहनत झोंकनी है। स्कूलों की बैठकों में ज्यादातर मामले बच्चों में तनाव, याद्दाश्त में कमी, फेसबुक कैसे मैनेज करें, आदि की आ रही है। - डॉ. पूनम देवदत्त, सीबीएसई काउंसलर
सामाजिक मूल्यों में गिरावट
परिवार को छोड़कर बच्चे बाहरी लोगों के साथ चैटिंग में ज्यादा व्यस्त हो रहे हैं। इस कारण उनमें मानसिक तनाव बढ़ा है। सामाजिक मूल्यों में गिरावट आई है। - डॉ. अंजुला राजवंशी, प्रवक्ता समाजशास्त्र, आरजी पीजी कॉलेज
ये उपाय अपनाएं...
कम उम्र के बच्चों को मोबाइल न दें
बच्चों का इंटरनेट इस्तेमाल का वक्त तय करें
उनकी सोशल साइट पर गतिविधियों पर नजर रखें कि वह कुछ गलत तो नहीं कर रहा
बच्चे के दिमाग में लगातार यह बात डालें कि पढ़ाई से ज्यादा इंपॉटेंट कुछ भी नहीं
बच्चों की पढ़ाई के समय अभिभावक खुद भी सोशल साइट का इस्तेमाल न करें