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शर्मनाक! तन्हा थी दंपति की जिंदगी, बंद मकान में मिली लाश

Tue, 19 Dec 2017 05:26 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ Updated Tue, 19 Dec 2017 05:26 PM IST
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Shameful! the couple life was tiny, dead zombies in closed houses
पीड़ित महिला - फोटो : अमर उजाला

रिश्तों की दुनिया कितनी संवेदनहीन हो गई है, जिसमें वृद्धावस्था से जूझते माता-पिता की देखभाल की बेटों को फुर्सत नहीं मिली। औलाद के बावजूद दंपति एकाकी जीवन जीते रहे। वजह चाहे जो भी हो, मगर आत्माराम गर्ग और ओमवती की तन्हा जिंदगी द्रवित करती है। बंद मकान में पति की मौत हो गई और दिव्यांग पत्नी कुछ नहीं कर पाई। दो दिन बाद पड़ोसियों को दुर्गंध आने पर घटना का पता चला। 

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पारिवारिक रिश्तों में बढ़ती दूरियों का अंजाम दुखद होता है। बात जब माता-पिता की संतान से जुड़े रिश्तों और दायित्वों की हो, तब ऐसी घटनाएं समाज को उद्वेलित करती हैं। सिंचाई विभाग के सेवानिवृत्त तारबाबू आत्माराम और ओमवती की जीवन दास्तां कुछ ऐसी ही सामने आई है। बुढ़ापे से जूझते दंपति लंबे समय से तन्हा जिंदगी जी रहे थे। नईमंडी कोतवाली की आदर्श कालोनी में दो दिन से बंद पड़े मकान से दुर्गंध उठने के बाद आसपास हलचल हुई। पुलिस को सूचना दी गई, मगर कोई रिश्तेदार सामने नहीं आया। खाकी ने भी कदम पीछे खींचे रखे। पता चला कि आत्माराम के दो बेटे हैं, जो रुड़की और गुरुग्राम में रहते हैं। पुलिस ने आवाजें दी, लेकिन अंदर मकान में कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। मौअज्जिज लोगों के आग्रह पर दोबारा आई पुलिस ने बंद मकान का दरवाजा तोड़ा। कमरे में हृदयविदारक दृश्य देखकर हर कोई हैरत में पड़ गया। बिस्तर से नीचे पड़े आत्माराम गर्ग की मौत हो चुकी थी, जबकि पत्नी ओमवती अचेत थी। ओमवती को तत्काल जिला चिकित्सालय में भर्ती कराया गया। पड़ोस में जितने मुंह, उतनी बातें सुनाई दी। नईमंडी इंस्पेक्टर कुशलपाल सिंह के मुताबिक वृद्धावस्था के कारण आत्माराम और ओमवती कई बीमारियों की चपेट में रहे। अचानक रात में सोते समय बिस्तर से नीचे गिरने की वजह से आत्माराम की मौत हो गई। ओमवती कुर्सी पर बैठी थी, वह कोई मदद नहीं कर पाई। बंद मकान से उसकी आवाज भी गली तक नहीं जा पाई। पति की मृत्यु का अहसास होने के बाद ओमवती ने कुर्सी से खुद को नीचे गिराकर पति के पास पहुंचने की कोशिश की, परंतु वह कोई मदद नहीं ले पाई। आत्माराम की मृत्यु 24 घंटे पहले होने का अंदेशा है। उपचार के बाद ओमवती को होश आ गया और उसे घर भेज दिया गया, तब तक छोटा बेटा संजय भी गुरुग्राम से यहां पहुंच गया था। तीन दशक से मोहल्ले में रह रहे गर्ग दंपति की जिंदगी एकाकी रही। उनके यहां आसपड़ोस की कोई आवाजाही नहीं थी। नाते-रिश्तेदार भी कभी दिखाई नहीं देते थे। वजह चाहे जो हो, मगर रिश्तों में आई संवेदनहीनता बुजुर्ग दंपति की अनदेखी में नजर आती है। आत्माराम की उम्र 85 साल थी और ओमवती की उम्र 82 वर्ष है। फिर भी उनकी देखभाल के लिए कोई जिम्मेदारी नहीं निभाई गई। बड़ा बेटा रविंद्र गर्ग पिता की मृत्यु की सूचना के बाद भी नहीं आया। वह रुड़की में रहता है और उत्तराखंड रोडवेज में कर्मचारी है। कोतवाली निरीक्षक के अनुसार फोन पर रविंद्र से बात की गई मगर उसने पिता के अंतिम संस्कार में आने से इंकार कर दिया। नई मंडी श्मशान घाट पर आत्माराम गर्ग की चिता को मुखाग्नि छोटे बेटे संजय ने दी।
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खरड़ के बाशिंदे थे आत्माराम 

Shameful! the couple life was tiny, dead zombies in closed houses
बंद कमरे में बुजुर्ग की मौत - फोटो : अमर उजाला

फुगाना थाना के गांव खरड़ के मूल बाशिंदे आत्माराम गर्ग पहले रुड़की में ही रहते थे। उन्होंने हंसी-खुशी दोनों पुत्रों का विवाह संस्कार किया। बाद में वह यहां आदर्श कालोनी में आकर रहने लगे। पेंशन पर ही उनका जीवन खर्च चलता था। उनकी पत्नी ओमवती बागपत के गांव सरुरपुर कलां की मूल निवासी है। दिल्ली से आए ओमवती के भाई राधेश्याम गोयल ने बताया कि कई वर्षों से गर्ग दंपति अकेले रहते थे। बहनोई आत्माराम की ऐसे मृत्यु होना दु:खद है। बड़े बेटे का पिता के अंतिम संस्कार में रुड़की से नहीं पहुंचना भी गम को बढ़ाता है। ओमवती का शेष जीवन कैसे कटेगा, अब इस बात की चिंता है।

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