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प्रयोगशाला की तकनीक खेतों तक पहुंचाएं, तभी शोध सार्थक : डॉ. संदीप कुमार
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- जैव प्रौद्योगिकी के विद्यार्थियों को प्रधान वैज्ञानिक ने दिया गुरुमंत्र
संवाद न्यूज एजेंसी
मोदीपुरम। सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में जैव प्रौद्योगिकी के विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। इसमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. संदीप कुमार ने विद्यार्थियों को प्रयोगशाला में किए जा रहे शोध को खेतों तक पहुंचाने का गुरुमंत्र दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ जैव प्रौद्योगिकी के अधिष्ठाता डॉ. आरएस सेंगर ने किया। उन्होंने डॉ. संदीप कुमार का की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बदलती जलवायु, बढ़ती गर्मी और फसलों में फैलने वाली बीमारियां खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती है। डॉ. संदीप कुमार ने बताया कि उनकी टीम ने देश के जीन बैंक में संरक्षित गेहूं की करीब 22 हजार पारंपरिक और विदेशी किस्मों का व्यापक मूल्यांकन किया है। इस शोध में गेहूं की फसल को प्रभावित करने वाले काला, भूरा और पीला गेरूई रोग तथा धब्बा झुलसा जैसे रोगों से मुकाबला करने वाले 137 उपयोगी जर्मप्लाज्म की पहचान की गई।
उन्होंने बताया कि इस उपलब्धि को लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज किया गया है। उन्होंने विद्यार्थियों से जीनोमिक्स, जीन संपादन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी आधुनिक तकनीकों में दक्षता हासिल करने का आह्वान किया। उन्होंने बताया कि शोध में आणविक संकेतकों और केएएसपी तकनीक का इस्तेमाल किया गया। अलग-अलग बीजों में समानता और दोहराव की पहचान के लिए जी-डर्ट नामक डिजिटल वेब सर्वर भी विकसित किया गया है। शोध में गेहूं की ऐसी पारंपरिक किस्मों की पहचान हुई है। यह अधिक गर्मी, सूखे और खारी मिट्टी जैसी परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन की क्षमता रखती हैं। डॉ. निलेश कपूर ने कहा कि शोध में कड़ी मेहनत और धैर्य का कोई विकल्प नहीं है। भविष्य में जीन संपादन, प्रति लेख विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीकों पर शोध की आवश्यकता है। कार्यक्रम में डॉ. बुद्धेश गौतम, बृजेश अविनाश, अंकिता, तन्मय, गरिमा, प्रिंस आदि मौजूद रहे।
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मोदीपुरम। सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में जैव प्रौद्योगिकी के विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। इसमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. संदीप कुमार ने विद्यार्थियों को प्रयोगशाला में किए जा रहे शोध को खेतों तक पहुंचाने का गुरुमंत्र दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ जैव प्रौद्योगिकी के अधिष्ठाता डॉ. आरएस सेंगर ने किया। उन्होंने डॉ. संदीप कुमार का की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बदलती जलवायु, बढ़ती गर्मी और फसलों में फैलने वाली बीमारियां खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती है। डॉ. संदीप कुमार ने बताया कि उनकी टीम ने देश के जीन बैंक में संरक्षित गेहूं की करीब 22 हजार पारंपरिक और विदेशी किस्मों का व्यापक मूल्यांकन किया है। इस शोध में गेहूं की फसल को प्रभावित करने वाले काला, भूरा और पीला गेरूई रोग तथा धब्बा झुलसा जैसे रोगों से मुकाबला करने वाले 137 उपयोगी जर्मप्लाज्म की पहचान की गई।
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उन्होंने बताया कि इस उपलब्धि को लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज किया गया है। उन्होंने विद्यार्थियों से जीनोमिक्स, जीन संपादन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी आधुनिक तकनीकों में दक्षता हासिल करने का आह्वान किया। उन्होंने बताया कि शोध में आणविक संकेतकों और केएएसपी तकनीक का इस्तेमाल किया गया। अलग-अलग बीजों में समानता और दोहराव की पहचान के लिए जी-डर्ट नामक डिजिटल वेब सर्वर भी विकसित किया गया है। शोध में गेहूं की ऐसी पारंपरिक किस्मों की पहचान हुई है। यह अधिक गर्मी, सूखे और खारी मिट्टी जैसी परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन की क्षमता रखती हैं। डॉ. निलेश कपूर ने कहा कि शोध में कड़ी मेहनत और धैर्य का कोई विकल्प नहीं है। भविष्य में जीन संपादन, प्रति लेख विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीकों पर शोध की आवश्यकता है। कार्यक्रम में डॉ. बुद्धेश गौतम, बृजेश अविनाश, अंकिता, तन्मय, गरिमा, प्रिंस आदि मौजूद रहे।
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