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गणतंत्र दिवस विशेष: यूपी के इस गांव में तिरंगा फहराने के बाद ही घरों में जलते हैं चूल्हे  

Sun, 26 Jan 2020 12:06 PM IST
Dimple Sirohi मुकेश पंवार, अमर उजाला, बड़ौत /बागपत
मुकेश पंवार, अमर उजाला, बड़ौत /बागपत Published by: Dimple Sirohi Updated Sun, 26 Jan 2020 12:06 PM IST
सार

  • बावली गांव में गणतंत्र दिवस मनाने की अनूठी परंपरा
  • राष्ट्रध्वज की पूजा कर घी के दीपक से उतारी जाती है आरती
  • अशोक चक्र विजेता गांव की शान तो घर-घर में फौजी बढ़ा रहे मान

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Republic Day 2020: Stoves burn in houses only after hoisting the tricolor in a village of Baghpat UP
गणतंत्र दिवस 2020 - फोटो : PTI

विस्तार

वतन की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति तक देने वाले अमर शहीदों के गांव के रूप में बागपत के बावली गांव की पहचान है। अशोक चक्र विजेता से लेकर कई स्वतंत्रता सेनानी इस गांव की शान है। एक खासियत और है, जो इस गांव को प्रसिद्धि दिलाती है, वह है गणतंत्र दिवस मनाने की अनूठी परंपरा। यहां तिरंगा फहराने के बाद ही चूल्हे जलते है और ग्रामीण किसी अन्य काम की शुरूआत करते हैं।

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ध्वजारोहण के बाद गांव में बने शहीद स्मारक स्थल पर सामूहिक रूप से राष्ट्रगान होता है। राष्ट्रध्वज की पूजा कर घी के दीपक से आरती उतारी जाती है और घर-घर घी के दीपक जलाए जाते हैं। भोग लगाकर ग्रामीणों के बीच महाप्रसाद का वितरण किया जाता है। खास बात यह है कि ध्वजारोहण के बाद ही बच्चे स्कूल जाते हैं। समय ऐसा रखा जाता है कि किसी का स्कूल, खेती या मजदूरी न छूटे।

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पूर्वजों ने शुरू की थी परंपरा
भूतपूर्व सैनिक सेवा समिति के जिलाध्यक्ष शीशपाल सिंह और ग्राम प्रधान पति ओमवीर का कहना है कि 26 जनवरी को ध्वजारोहण की यह परंपरा उनके पूर्वजों ने शुरू की थी। समय के अनुसार इसमें थोड़ा बहुत बदलाव होता रहा है। नहीं बदली है तो ध्वजारोहण से पहले गांव में चूल्हा न जलाने और घरों मेें घी के दीपक जलाने की परंपरा।

25 दिन भूखे-प्यासे रहकर लड़ी थी लड़ाई
बावली गांव के स्वतंत्रता सेनानी इलम सिंह 106 वर्ष के हो चुके है। वर्ष 1941-1942 में 25 दिनों तक सिंगापुर मेें भूखे-प्यासे रहकर उन्होंने अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए थे। दूसरे स्वतंत्रता सेनानी हरिपाल थे, जिनका हाल ही में निधन हुआ है। हरिपाल ने आजाद हिंद फौज में शामिल होकर नेताजी सुभाष चंद बोस के नेतृत्व में 1944-1945 में अंग्रेजों से लोहा लिया था।

अशोक चक्र विजेता भी है इस गांव में
बावली गांव पश्चिमी उप्र का अकेला ऐसा गांव है, जहां अशोक चक्र विजेता भी है। गांव के बिजेंद्र पाल सिंह तोमर ने 18 दिसंबर 1961 के गोवा आपरेशन में देश को पुर्तगालियों से आजाद कराने में अहम योगदान दिया था। इसी बहादुरी के लिए उन्हें अशोक चक्र से सम्मानित किया गया था।

अंग्रेजों के खिलाफ होती थी मीटिंग
भूतपूर्व सैनिक सेवा समिति के जिलाध्यक्ष शीशपाल सिंह बताते है कि अंग्रेजों से निपटने के लिए बावली गांव के बाहर गोपी वाली बनी (जंगल) है, यह करीबन 200 बीघे में फैला हुआ था। इसमें गांव के लोग रात एकत्रित होते थे और अंग्रेजों से निपटने के लिए योजनाएं बनाते थे। इसमें बिजरौल गांव के बाबा शाहमल का भी अहम योगदान रहा।

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घर-घर मेें फौजी
बावली गांव के हर घर में कम से कम एक व्यक्ति सेना मेें है। इनमें प्रमुख रूप से कैप्टन महेंद्र सिंह, सूबेदार धर्मवीर सिंह, सूबेदार महक सिंह, हवलदार सत्यवीर सिंह, सुनील व अशोक चक्र विजेता बिजेंद्रपाल तोमर के भतीजे प्रवीण तोमर शामिल है। गांव की आबादी करीबन 25 हजार है।

इतिहास के पन्नों में बावली गांव
1857 का गदर में यहां से भी उठी थी चिंगारी, अंग्रेजों को मुंह तोड़ जवाब दिया था । 1939-1945 तक आजाद हिंद फौज मेें शामिल होकर स्वतंत्रता सेनानी इलम सिंह व हरिपाल ने द्वितीय विश्व युद्ध मेें अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए थे । इसके अलावा 1962 में भारत व चीन, 1965 व 1971 में भारत-पाकिस्तान में यहां के लोगों ने अहम योगदान दिया। 1999 में कारगिल की लड़ाई में गांव के अनिल कुमार शहीद हुए थे।

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