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भाव से होती है वास्विक अनुभूति: विमर्श सागर
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शारदा रोड स्थित महावीर जयंती भवन धार्मिक अनुष्ठान के चलते समव शरण रूप ले चुका है। 1 अप्रैल से प्रारंभ हुए 1008 समवशरण महामंडल विधान में शहर सहित आसपास के जनपदों से हजारों श्रद्धालु पहुंचकर धर्मलाभ ले रहे हैं।
मंदिर से सुबह घटयात्रा तीरगरान दिगंबर जैन मंदिर से प्रारंभ होकर महावीर जयंती भवन पहुंची। ध्वजारोहण, मंडप उद्घाटन, समवशरण उद्घाटन, जिन अभिषेक सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान विधि विधान से सम्पन्न हुए। आयोजन के दौरान पूरा परिसर भक्ति और श्रद्धा के वातावरण से गूंज उठा। समवसरण सभा का मुख्य आकर्षण विमर्श सागर मुनि का सानिध्य रहा। वे 35 पीछी के साथ मंच पर विराजमान हुए। उनके दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं में रहा। आचार्य विमर्श सागर ने कहा कि अब यह भवन केवल महावीर जयंती भवन नहीं बल्कि प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का समवसरण बन चुका है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि यदि कोई पूछे कि आप कहां है तो उत्तर दें कि हम महाप्रभु के समव शरण में हैं। उन्होंने कहा कि इस भाव से जुड़ने पर वास्तविक समव शरण जैसी अनुभूति और आध्यात्मिक फल की प्राप्ति संभव है।
उन्होंने भगवान ऋषभदेव के जीवन प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि जब तक वे गृहस्थ जीवन में थे लोग उन्हें रिश्तों के आधार पर देखते थे। केवल ज्ञान प्राप्त होते ही वे वीतराग, सर्वज्ञ और समस्त जीवों के कल्याणकारी बन गए। उसी क्षण देवों द्वारा दिव्य समवसरण की रचना की गई। उन्होंने समस्त जीवों को आत्मकल्याण का मार्ग दिखाया।
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अनुष्ठान के विधानाचार्य विकर्ष शास्त्री के निर्देशन में कार्यक्रम संचालित हुआ। संगीत की प्रस्तुति भी दी गई। इंद्र और इंद्राणी ने भगवान जिनेंद्र की आराधना की।
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मंदिर से सुबह घटयात्रा तीरगरान दिगंबर जैन मंदिर से प्रारंभ होकर महावीर जयंती भवन पहुंची। ध्वजारोहण, मंडप उद्घाटन, समवशरण उद्घाटन, जिन अभिषेक सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान विधि विधान से सम्पन्न हुए। आयोजन के दौरान पूरा परिसर भक्ति और श्रद्धा के वातावरण से गूंज उठा। समवसरण सभा का मुख्य आकर्षण विमर्श सागर मुनि का सानिध्य रहा। वे 35 पीछी के साथ मंच पर विराजमान हुए। उनके दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं में रहा। आचार्य विमर्श सागर ने कहा कि अब यह भवन केवल महावीर जयंती भवन नहीं बल्कि प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का समवसरण बन चुका है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि यदि कोई पूछे कि आप कहां है तो उत्तर दें कि हम महाप्रभु के समव शरण में हैं। उन्होंने कहा कि इस भाव से जुड़ने पर वास्तविक समव शरण जैसी अनुभूति और आध्यात्मिक फल की प्राप्ति संभव है।
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उन्होंने भगवान ऋषभदेव के जीवन प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि जब तक वे गृहस्थ जीवन में थे लोग उन्हें रिश्तों के आधार पर देखते थे। केवल ज्ञान प्राप्त होते ही वे वीतराग, सर्वज्ञ और समस्त जीवों के कल्याणकारी बन गए। उसी क्षण देवों द्वारा दिव्य समवसरण की रचना की गई। उन्होंने समस्त जीवों को आत्मकल्याण का मार्ग दिखाया।
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अनुष्ठान के विधानाचार्य विकर्ष शास्त्री के निर्देशन में कार्यक्रम संचालित हुआ। संगीत की प्रस्तुति भी दी गई। इंद्र और इंद्राणी ने भगवान जिनेंद्र की आराधना की।