नहीं थम रहीं सिसिकियां: 12 मौतों के बाद बचा सिर्फ गम, हादसे को याद कर सिहर उठते हैं परिजन, दर्दनाक थे वो पल
Meerut Accident Story: गाजियाबाद हादसे में जान गंवाने वालों के परिजनों ने अपना दर्द बयां किया तो हर किसी की आंखें नम हो गईं। उधर, राली चौहान गांव में भी परिजनों की सिसकियां थम नहीं रहीं हैं।
विस्तार
एक सप्ताह के भीतर मेरठ के दो गांवों के 12 लोग दर्दनाक हादसे के शिकार हो गए। वहीं, हादसे के शिकार हुए लोगों के परिवारों का दर्द अभी हरा है। अपनों को खोने वालों की डबडबाती आंखें, गले की सिसकियां, माताओं के रुदन को नियति ने परिवारों का नसीब सा बना दिया है।
बुधवार को अमर उजाला से वाहिद अली, गौरव त्यागी इंचौली क्षेत्र के धनपुर गांव पहुंचे। यहां 11 जुलाई को गाजियाबाद में हादसे में जान गंवाने वालों के परिजनों ने अपना दर्द बयां किया। इसके अलावा राली चौहान गांव में हादसे के शिकार लोगों के परिजन अमर उजाला के अरीश रिजवी, सचिन त्यागी से अपना दर्द बताते- बताते सिहर उठे।
हादसे को याद कर सिहर उठते हैं परिजन, थम नहीं रहीं सिसकियां
हाईटेंशन लाइन से डाक कांवड़ छूने से राली चौहान गांव में हुए दर्दनाक हादसे के चार दिन बाद भी सिसकियां थमने का नाम नहीं ले रही हैं। हादसे के शिकार पांचों परिवारों में मातम पसरा है। आसपास के घरों की महिलाएं गमगीन महिलाओं को ढाढ़स बंधा रही हैं। दर्द इतना है कि हादसे का नाम लेते ही पीड़ित परिजन सिहर उठते हैं। बुधवार को पीड़ित परिवार के लोगों का दर्द जुबां पर आया तो बस इतना ही बोले कि हमारे तो चले गए, हमें किसी से कोई शिकायत नहीं। प्रशासन बस पीड़ित परिवारों को आर्थिक मदद दिला दे। गांव में दर्द बांटने के लिए आने-जाने का सिलसिला भी जारी है।
दो जवान बेटे खोए, तीसरा अभी भी अस्पताल में
बुधवार को जब अमर उजाला की टीम दो जवान बेटे हिमांशु और प्रशांत को खोने वाले सुरेश सैनी के घर पहुंची तो सुरेश घर के बाहर दिल पर हाथ रखे बैठे थे। घर में महिलाओं की भीड़ हिमांशु और प्रशांत की माता को ढाढ़स बंधा रही थीं। हमें देखते ही सुशील खड़े होकर हाथ जोड़ते हुए बोले कि छह बेटों में से पांच विशाल (17) अजय (16) हिमांशु (14) अभय (09) और कार्तिक (08) दूसरी बार कांवड़ लाने गए थे। कांवड़ का जोड़ा पूरा करने का इतना चाव था कि मजदूरी करके कई दिनों में पैसे जोड़े थे। 30 लोगों का ग्रुप बनाया था। 15 लोगों ने 15-15 हजार और 15 ने पांच-पांच हजार रुपये जोड़े थे। सबकुछ ठीक था लेकिन गांव में आने से पहले ही हादसा हो गया। भर्राए गले से सुरेश सैनी कहते हैं कि मुझ पर बड़ा कहर टूटा है। दो जवान बेटे चले गए, सबसे बड़ा विशाल अभी भी अस्पताल में जिंदगी के लिए जूझ रहा है। बताया कि प्रशांत कांवड़ लेने नहीं गया था, कांवड़ जेल चुंगी पर पहुंचने के बाद वो गया था। क्या करें किसी के हाथ में नहीं है। 56 साल की उम्र में बेटों की मौत से टूट गया हूं। आर्थिक मदद और किसी बच्चे को सरकारी नौकरी मिल जाए, बस इतनी ही इच्छा है।
कैसे होगी बेटे और बेटियों की परवरिश
कांवड़ हादसे में जान गंवाने वाले महेंद्र (45) के 25 गज के छोटे से मकान के बाहरी कमरे में महिलाओं की भीड़ लगी थी। महेंद्र की पत्नी अंजू बिलखकर बस यही बोल रही थी कि वे तो चले गए, अब बेटी-बेटों की परवरिश कैसे होगी। महेंद्र की चार बेटियों में से सबसे बड़ी अंजलि की शादी हो चुकी है। दूसरे नंबर की तनीशा ने इस साल 12वीं की है। गुंजन 11वीं और राधिका पांचवीं कक्षा में है। बेटा गौरव चौथी कक्षा में है। बिजेंद्र भी दूसरी बार कांवड़ का जोड़ा पूरा करने के लिए गए थे। बिजेंद्र के भाई महेंद्र कहते हैं कि 25 गज के मकान में तीन भाइयों का परिवार रहता है। बच्चियां सभी पढ़ रही हैं, ऐसे में अब आगे की चिंता है। अधिकारी छह लाख रुपये आर्थिक मदद के लिए कह रहे हैं।
कुछ नहीं कहना चाहते, परिवार को मिल जाए आर्थिक मदद
हादसे में जान गंवाने वाले मनीष के पिता सुशील कुमार घर के बाहर कई लोगों के बीच गुमसुम बैठे थे। घर पर महिलाओं का आना-जाना लगा हुआ था। बेटे मनीष के साथ हुए हादसे के बारे में पूछे जाने पर वे नीचे देखते हुए आंखों से निकले आंसुओं को पोंछने लगते हैं। इतना ही बोल पाते हैं कि आईटीआई करना चाहता था, चला गया। रुंधे गले से सुशील कहते हैं मैं तो मजदूरी करता हूं। चार बच्चों में से मनीष पढ़-लिखकर नौकरी करना चाहता था। अब कुछ नहीं बचा। हम किसी के खिलाफ कुछ नहीं करना चाहते हैं, आर्थिक मदद मिल जाए ताकि बच्चों की परवरिश हो सके।
लख्मी के परिवार के पास रहने को घर भी नहीं
कांवड़ देखने गए 10 साल के लक्ष्य और 45 वर्षीय लख्मी के घर पर भी मातम पसरा था। लक्ष्य के पिता सुनील निढ़ाल थे। भर्राये गले से कहते हैं कि उनके बड़े भाई लख्मी का बेटा प्रवीण और दूसरे भाई के तीन बेटे कांवड़ लेने गए थे। उनके आने की सूचना पर लक्ष्य ताऊ लख्मी के साथ गांव के बाहर कांवड़ देखने चला गया था। अचानक रोते हुए इतना ही कह पाते हैं कि मेरा बेटा खाना भी नहीं खा सका। ट्रॉली में उतरे करंट की चपेट में आकर वो और बड़े भाई लख्मी दोनों की मौत हो गई। सुनील कहते हैं कि भाई लख्मी मजदूरी करते थे। उनके पत्नी रेखा और तीन बेटे हैं। परिवार की हालत इतनी खराब है कि घर तक नहीं है। आर्थिक मदद के साथ उनके परिवार को घर भी मिल जाए।
एमएलसी धर्मेंद्र भारद्वाज ने ही की आर्थिक मदद
पीड़ित परिवार के लोगों ने बताया कि प्रशासन की तरफ से अभी तक आर्थिक मदद का सिर्फ आश्वासन दिया गया है। एमएलसी धर्मेंद्र भारद्वाज ही मृतकों के परिजनों को 31-31 हजार का चेक देकर गए हैं। जनसंख्या समाधान फाउंडेशन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रविंद्र गुर्जर ने 21 हजार रुपये की आर्थिक मदद की है और अपने अस्पताल में निशुल्क इलाज का वादा किया है।
हादसे से मिला जिंदगी भर का रंजोगम, अधिकारियों से कोरा आश्वासन
11 जुलाई की सुबह इंचौली क्षेत्र धनपुर गांव के जयपाल यादव के परिवार को जिंदगी भर का रंजोगम दे गई। खाटू श्याम के दर्शन को जा रहे उनके मंझले बेटे नरेंद्र यादव, उनकी पत्नी अनीता, सबसे छोटे बेटे धर्मेंद्र की पत्नी, बबीता, दो पोते दीपांशु व हिमांशु और एक पोती वंशिका की दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे पर सड़क हादसे में मृत्यु हो गई जबकि बेटे धर्मेंद्र और पोते कार्तिक को गंभीर घायल हो गए। अब पीड़ित परिवार भविष्य को लेकर चिंतित है और अधिकारियों के रवैये से बेहद हताश है।
83 वर्ष की उम्र में जयपाल यादव के परिवार को जिंदगी ने वो गम दे दिया कि वो भुला नहीं सकते। वो इस हादसे से बाहर निकलने की कोशिश भी कर रहे हैं, लेकिन बेटे नरेंद्र यादव, दोनों बहू, दोनों पोते और एक पोती को याद कर आंखों से आंसू थम नहीं रहे हैं। वो बस एक ही बात कहते हैं कि सबकुछ खत्म हो गया है।
जयपाल के तीन बेटों में सबसे बड़े जितेंद्र यादव, मंझले नरेंद्र यादव थे और छोटे बेटे धर्मेंद्र यादव हैं। 11 जुलाई सुबह खाटू श्याम के दर्शन के लिए निकलने के बाद नरेंद्र यादव अपनी पत्नी अनीता, बेटे दीपांशु, हिमांशु के अलावा छोटे भाई धर्मेंद्र, उनकी पत्नी बबीता, बेटे कार्तिक और बेटी वंशिका के साथ गाड़ी से मेरठ से रवाना हुए थे। गुरुग्राम से उन्हें बहन माया देवी और उनके बच्चों को साथ लेना था। लेकिन इससे पहले ही मेरठ-दिल्ली एक्सप्रेस पर गाजियाबाद में गलत साइड से आ रही स्कूल बस से गाड़ी की टक्कर में परिवार के छह सदस्यों की मृत्यु हो गई।
मृतक नरेंद्र यादव की भांजी अर्चना यादव जो कि गूगल कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर हैं। अर्चना ने बताया कि वह गुरुग्राम सरहोल स्थित अपने आवास पर मामा और सभी सदस्यों का इंतजार कर रही थी। मम्मी ने खाना भी तैयार कर रखा था, लेकिन तभी नाना जयपाल यादव का फोन आया तो हादसे की खबर मिली। हादसे के बाद से अर्चना धनपुर गांव में ही मामा के यहां रुकी हुई हैं। उन्होंने कहा कि राजनीतिक लोग सांत्वना देने आ रहे हैं। किसान दुर्घटना बीमा के तहत पांच लाख रुपये और मंत्री दिनेश खटीक ने भी आर्थिक मदद की है। लेकिन हमें मृतकों के परिवार के सभी सदस्यों को 25-25 लाख रूपये, एक सदस्य को सरकारी नौकरी और मृतकों के परिवार पर बकाया कृषि ऋण की माफी चाहिए। पांच दिन पहले परिवार के सदस्य डीएम दीपक मीणा से भी मिले थे। उन्होंने हर संभव मदद का आश्वासन दिया था।
तीन परिवारों की देखरेख करते थेे नरेंद्र यादव
भांजी अर्चना यादव ने बताया कि उनके पिता का नाम भी नरेंद्र यादव था और नौ साल पहले बीमारी के कारण उनकी मृत्यु हो गई थी। तबसे उनके मामा नरेंद्र यादव ने परिवार को आर्थिक तौर पर पूरा सहयोग दिया। बड़े भाई जितेंद्र यादव और छोटे भाई धर्मेंद्र यादव के परिवार की जिम्मेदारी भी नरेंद्र यादव के ही कंधों पर थी। तीनों परिवार ही एक घर में रहते थे। हादसे में धर्मेंद्र यादव के पैर में रॉड है, जबकि उनके बेटे के सिर में 22 टांके आए हैं। गनीमत रही वो मौत को मात दे गए। अर्चना ने बताया मामा नरेंद्र यादव ने मकान बनाने को लेकर करीब 15 लाख रुपये का ऋण ले रखा था। ऐसे में ऋण कैसे चुकाया जाएगा, परिवार में कमाने वाला ही दुनिया से चला गया। सरकार को पीड़ित परिवार की मदद के लिए आगे आना चाहिए।
एक अफसर ने बोला- ऐसे हादसे तो होते रहते हैं
परिवार के लोग एक प्रशासनिक अधिकारी के शब्दों से नाराज हैं, जिसमें उन्होंने कहा कि ऐसे सड़क हादसे तो होते रहते हैं। हालांकि परिवार के लोगों ने उस अधिकारी का नाम बताने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा परिवार पर टूटे गम के पहाड़ से किसी अधिकारी का दिल पसीजा हो ना हो, लेकिन उन्हें इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। परिवार किस दौर से गुजर रहा है, ये शब्दों में बयान नहीं कर सकते।