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अफसरों की कार्य प्रणाली की भेंट चढ़ी बेसिक शिक्षा
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मेरठ।
प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों में पढ़ाई हो रही है या नहीं। इसकी जानकारी शायद ही बेसिक शिक्षा के अधिकारियों को हो। वजह खंड शिक्षा अधिकारियों ने लेकर बीएसए तक ने स्कूलों से दूरी बना रखी है। अगर शिक्षा विभाग के अधिकारी नियमित निरीक्षण करते तो करोड़ों की लागत से स्कूलों में लगाए गए प्रोजेक्टर धूल नहीं फांक रहे होते। बच्चों को उनका लाभ मिल रहा होता। अमर उजाला ने मंगलवार के अंक में परिषदीय स्कूलों में व्यवस्था की पोल खोली तो अधिकारियों ने फोन उठाने बंद कर दिए।
प्रधानमंत्री जन कल्याण योजना के तहत जिले में नगर व देहात के 221 प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्कूलों में प्रोजेक्टर लगवाए गए थे। इन पर 5.61 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। स्कूलों में प्रोजेक्टर लगे या नहीं। इसका सत्यापन न तो अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने कराया और न ही बेसिक शिक्षा विभाग ने। हालात यह हैं कि कई स्कूलों में प्रोजेक्टर दीवारों पर लटके हैं तो कहीं डिब्बों में बंद पड़े हैं। वहीं शिक्षक प्रशिक्षण नहीं दिए जाने का बहाना बना रहे हैं।
अमर उजाला ने मंगलवार के अंक में स्कूलों में लगाए गए प्रोजेक्टर व्यवस्था की पोल खोली। इसको लेकर बेसिक शिक्षा विभाग में दिनभर चर्चाएं होती रही। जिम्मेदार अधिकारी इस मुद्दे पर बात करने से कतराते रहे। बीएसए सतेन्द्र ढाका ने तो फोन तक नहीं उठाया। विभाग के एक खंड शिक्षा अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि स्कूलों में बंद पड़े प्रोजेक्टर की रिपोर्ट कई बार बीएसए को सौंपी गई, लेकिन उस पर कार्रवाई नहीं की गई। खंड शिक्षा अधिकारी शिक्षकों को शिक्षा का स्तर सुधारने के निर्देश देते हैं तो बीएसए खंड शिक्षा अधिकारियों का ट्रांसफर कर देते हैं।
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शिक्षकों से मांगेंगे जवाब
महानगर में 42 स्कूलों में प्रोजेक्टर लगाए गए थे। पूरा रिकार्ड निकाल लिया है। एक कंपनी ने शिक्षकों को प्रशिक्षण नहीं दिया। कंपनी को पत्र लिखा जाएगा। शिक्षकों से भी स्पष्टीकरण मांगा जाएगा। सभी प्रोजेक्टर एक सप्ताह के भीतर चालू कराए जाएंगे। -एसके गिरी, नगर शिक्षा अधिकारी।
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प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों में पढ़ाई हो रही है या नहीं। इसकी जानकारी शायद ही बेसिक शिक्षा के अधिकारियों को हो। वजह खंड शिक्षा अधिकारियों ने लेकर बीएसए तक ने स्कूलों से दूरी बना रखी है। अगर शिक्षा विभाग के अधिकारी नियमित निरीक्षण करते तो करोड़ों की लागत से स्कूलों में लगाए गए प्रोजेक्टर धूल नहीं फांक रहे होते। बच्चों को उनका लाभ मिल रहा होता। अमर उजाला ने मंगलवार के अंक में परिषदीय स्कूलों में व्यवस्था की पोल खोली तो अधिकारियों ने फोन उठाने बंद कर दिए।
प्रधानमंत्री जन कल्याण योजना के तहत जिले में नगर व देहात के 221 प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्कूलों में प्रोजेक्टर लगवाए गए थे। इन पर 5.61 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। स्कूलों में प्रोजेक्टर लगे या नहीं। इसका सत्यापन न तो अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने कराया और न ही बेसिक शिक्षा विभाग ने। हालात यह हैं कि कई स्कूलों में प्रोजेक्टर दीवारों पर लटके हैं तो कहीं डिब्बों में बंद पड़े हैं। वहीं शिक्षक प्रशिक्षण नहीं दिए जाने का बहाना बना रहे हैं।
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अमर उजाला ने मंगलवार के अंक में स्कूलों में लगाए गए प्रोजेक्टर व्यवस्था की पोल खोली। इसको लेकर बेसिक शिक्षा विभाग में दिनभर चर्चाएं होती रही। जिम्मेदार अधिकारी इस मुद्दे पर बात करने से कतराते रहे। बीएसए सतेन्द्र ढाका ने तो फोन तक नहीं उठाया। विभाग के एक खंड शिक्षा अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि स्कूलों में बंद पड़े प्रोजेक्टर की रिपोर्ट कई बार बीएसए को सौंपी गई, लेकिन उस पर कार्रवाई नहीं की गई। खंड शिक्षा अधिकारी शिक्षकों को शिक्षा का स्तर सुधारने के निर्देश देते हैं तो बीएसए खंड शिक्षा अधिकारियों का ट्रांसफर कर देते हैं।
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शिक्षकों से मांगेंगे जवाब
महानगर में 42 स्कूलों में प्रोजेक्टर लगाए गए थे। पूरा रिकार्ड निकाल लिया है। एक कंपनी ने शिक्षकों को प्रशिक्षण नहीं दिया। कंपनी को पत्र लिखा जाएगा। शिक्षकों से भी स्पष्टीकरण मांगा जाएगा। सभी प्रोजेक्टर एक सप्ताह के भीतर चालू कराए जाएंगे। -एसके गिरी, नगर शिक्षा अधिकारी।