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अब खुलेगा 'लाक्षागृह' का राज, खुदाई के लिए बरनावा पहुंची टीम

Thu, 04 Jan 2018 11:34 AM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, बागपत
यूपी डेस्क, अमर उजाला, बागपत Updated Thu, 04 Jan 2018 11:34 AM IST
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Now the secret of Lakshagraha will open, team reached Buranawa for excavation
बरनावा लाक्षागृह

सदियों से राज बने बरनावा के लाक्षागृह से अब पर्दा उठाने की तैयारी शुरू हो गई है। पुरातत्व संस्थान की टीम ने बरनावा में डेरा डाल लिया है। उत्खनन के लिए साइट मैप तैयार किया जा रहा है। टेंट लगा दिए गए हैं। खुदाई के लिए अब जगह चिन्हित करने की कवायद शुरू हो गई है। हिंडन नदी के किनारे क्षेत्र चिन्हित कर शीघ्र ही खुदाई का कार्य शुरू किया जाएगा।

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केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने बरनावा में उत्खनन की मंजूरी दी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग उत्खनन शाखा द्वितीय और भारतीय पुरातत्व संस्थान लाल किला की संयुक्त टीम उत्खनन करेगी। पुरातत्व संस्थान के निदेशक डॉ. एसके मंजुल को यहां उत्खनन के लिए लाइसेंस दिया। उनके नेतृत्व में छह सदस्यीय टीम ने बरनावा टीले का 20 दिसंबर को सर्वे किया। मंगलवार को विभाग की सर्वेयर टीम पहुंच गई। बरनावा में उत्खनन स्थल के पास टेंट लगा दिए गए हैं। टीम के साथ पहुंचे सहायक पुरातत्वविद बीएस फोनिया, वीके राय, मोहन सिंह, आरके नौटियाल और सुनील कुमार ने बताया कि खुदाई के शुरू में 15 मजदूर लगाए गए हैं। सर्वे के बाद यहां उत्खनन का कार्य शुरू कर दिया जाएगा। टीम के पहुंचते ही ग्रामीणों के बीच भी उत्सुकता फैल गई। काफी संख्या में ग्रामीण मौके पर जमा रहे।
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पढ़ें : लाक्षागृह की खोज के लिए जल्द शुरू होगी खुदाई, केंद्र सरकार ने दी मंजूरी

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लाक्षागृह की क्या है हकीकत और क्या है फसाना

Now the secret of Lakshagraha will open, team reached Buranawa for excavation
टीम ने डाला डेरा - फोटो : अमर उजाला

सदियों बाद भी महाभारत और उससे जुड़ी किस्से कहानी लोगों के लिए जिज्ञासा का केंद्र बने हैं। लाक्षागृह बागपत के बरनावा में था या फिर देहरादून के लाखा मंडल में इस पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। बरनावा में हिंडन किनारे उत्खनन में नतीजों से इस सवाल का जवाब भी मिल सकता है। बरनावा में किस काल की सभ्यता मिलती है, अब इतिहासकारों की नजर इस पर टिकी हुई है।

बागपत के बरनावा का पूरा क्षेत्र ही नहीं बल्कि मुजफ्फरनगर, शामली और मेरठ में भी महाभारत काल के अवशेष हैं। इस बात की पुष्टि इस वजह से भी होती है, क्योंकि यह पूरा क्षेत्र कुुरुक्षेत्र और हस्तिनापुर के बीच में पड़ता है। उत्खनन का कार्य शुरू हो जाने से यहां लाक्षागृह की हकीकत भी सामने आएगी। बरनावा का यह पर्यटक स्थल हिंडन और कृष्णा नदी से घिरा हुआ है। इसके पास ही शेखपुरा में दोनों नदियां एक हो जाती हैं। टीले पर गुंबद हैं और यहीं से एक गुफा निकलती है। सालों से यही मान्यता है कि पांडव यहां के लाक्षागृह में रुके थे और महात्मा विदुर ने उन्हें सुरंग के रास्ते बचाया था। बरनावा गांव की जमीन में दफन गुत्थियों को भी अब बाहर निकाला जाएगा। बरनावा टीला पहले ही संरक्षित गुफाओं की लिस्ट में शामिल हैं। बरनावा टीले पर करीब 22 बार शोध संस्थान के विद्यार्थियों और इतिहासकारों की टीम सर्वेक्षण पूर्व में कर चुकी है। यहां से चित्रित धूसर मृद भांड संस्कृति, कुषाण, गुप्त और राजपूत सभ्यताओं के प्रमाण पहले से प्राप्त होते रहे हैं। उधर, देहरादून की विकासनगर तहसील के लाखा मंडल क्षेत्र के लोग वहां भी लाक्षागृह का दावा करते हैं। देहरादून में ग्रामीण कई प्रमाण देते हैं। इतिहासकारों को उम्मीद है कि उत्खनन से इतिहास की परतें जरूर हटेंगी।

सिनौली, चंदायन और अब बरनावा
वर्ष 2005 के सितंबर माह में सिनौली में खुदाई का कार्य कराया गया था। यहां हड़प्पा कालीन शवदान गृह मिला। इससे इस क्षेत्र में हड़प्पा कालीन सभ्यता की पुष्टि हो गई थी। इसके बाद वर्ष 2015 में चंदायन गांव में उत्खनन का कार्य केंद्र सरकार करा चुकी है। चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति, कुषाण काल, गुप्त और राजपूत सभ्यता के प्रमाण भी मिल चुके हैं। निदेशक पुरावशेष डॉ. डीएन डिमरी ने बताया कि उत्खनन का उद्देश्य यह जानना है कि इस क्षेत्र में किन-किन सभ्यताओं के अवशेष हो सकते हैं। यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि बरनावा का महाभारत काल से कितना और कैसा संबंध रहा है। पुरातत्व संस्थान के निदेशक डॉ. एसके मंजुल के निर्देशन में क्षेत्र में खुदाई का कार्य किया जाएगा।

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