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ट्रांसमिशन लाइनों के लिए अब मोनोपोल का एकाधिकार

Tue, 30 Apr 2019 03:23 AM IST
Gaurav sharma न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: Gaurav sharma Updated Tue, 30 Apr 2019 03:23 AM IST
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Now monopoly monopoly for transmission lines
मोनोपोल
 लोगों के घरों को रोशन करने वाले 33/11 केवी बिजलीघरों को बिजली आपूर्ति करने वाले ट्रांसमिशनों की लाइन बनाने में आने वाली एक बड़ी समस्या का अंत मोनोपोल से हो गया है। अब मोनोपोल की मदद से घनी आबादी के बीच से और उन शहरों में भी लाइन बनाई जाने लगी, जहां महंगी जमीन होने के चलते विभाग के पसीने छूट जाते थे। लेकिन इस नई तकनीक से हर जगह लाइन बनाना आसान होने से अब बिजली आपूर्ति में दिक्कत नहीं होगी।
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पावर प्लांटों द्वारा तैयार की जाने वाली बिजली पावर ग्रिड और ट्रांसमिशनों के माध्यम से छोटे बिजलीघरों (33/11 केवी) तक पहुंचाई जाती है। यहां से बिजली उपभोक्ताओं के घरों तक पहुंचती है। 120 केवीए से लेकर 400 केवीए और इससे अधिक क्षमता वाले ट्रांसमिशनों की लाइनों को टावर पर डाला जाता है। एक टावर 36 वर्ग मीटर से लेकर 144 वर्ग मीटर तक जगह घेरता है। इतनी जगह घेरने के चलते न केवल किसान भी अपने खेतों से लाइन का विरोध करते हैं बल्कि शहरों में भी इतनी जगह नहीं मिल पाती है। सबसे बड़ी समस्या घनी आबादी के बीच और महंगे शहरों में लाइन बनाने में आती है। इन सभी समस्याओं को देखते हुए इंजीनियर टावर का विकल्प तलाशने में लगे थे। इंजीनियरों की मेहनत मोनोपोल ने सफल कर दी है। एक टावर जहां 144 वर्ग मीटर तक जमीन घेरता है वहीं मोनोपोल केवल 4 वर्ग मीटर के अंदर खड़ा हो जाता है।
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टावर से महंगा, जमीन से सस्ता
ट्रांसमिशन विभाग को लाइन के टावर में इस्तेमाल होने वाली जमीन का किसानों को सर्किल रेट की दर का 85 फीसदी मुआवजा देना पड़ता है। शहरों में महंगे सर्किल रेट से विभाग को एक टावर का ही 50 से 75 लाख रुपये तक देना पड़ जाता है। इसके अलावा घनी आबादी के बीच जमीन नहीं मिलने की समस्या के चलते टावर नहीं लग पाता है। लेकिन मोनोपोल ने इस समस्या का अंत कर दिया है। टावर लगाने में जहां 10 से 12 लाख रुपये की लागत आती है वहीं मोनोपोल में (अलग-अलग साइज) 30 से 50 लाख रुपये का खर्च आता है।
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एचटी स्टील से बना होता है मोनोपोल
अधिकारियों ने बताया कि मोनोपोल एचटी स्टील का बना होता है। इसका वजन 15 से 25 टन होता है। इसे लगाने के लिए दो से तीन क्रेनों की जरूरत पड़ती है। इसका निर्माण पूना और कोलकाता में होता है। जरूरत पड़ने पर ही साइज अनुसार इसे ऑर्डर पर मंगाया जाता है। महानगर में इस नई तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ने लगा है। गंगानगर से लोहियानगर तक बनी ट्रांसमिशन लाइन में 17 मोनोपोल और नंगलापातू ट्रांसमिशन से मोहिउद्दीनपुर शुगर मिल तक की लाइन में 4 मोनोपोल लगाए गए हैं। मोनोपोल की मदद से सड़क के डिवाइडर से भी लाइन ले जाई जा सकती है।

मोनोपोल का अहम योगदान
ट्रांसमिशन
क्षेत्र में आई मोनोपोल तकनीक ने अहम योगदान दिया है। अब घनी आबादी के बीच से और टावर के लिए जमीन नहीं मिलने की स्थिति में भी मोनोपोल की मदद से लाइन बनाई जा सकती है। हालांकि मोनोपोल का इस्तेमाल जरूरत विशेष पर ही किया जा रहा है। -आलोक कुमार, मुख्य अभियंता, यूपीपीटीसीएल मेरठ
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