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मुजफ्फरनगर दंगा: छलका पीड़ितों का दर्द, बेघर हुए थे 949 परिवार, अब सोना पड़ता है भूखा
प्रदीप वर्मा, विनय बालियान, अमर उजाला, शामली
Published by: कपिल kapil
Updated Sat, 09 Feb 2019 02:43 AM IST
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पीड़ित परिवार
- फोटो : अमर उजाला
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मुजफ्फरनगर में सात सितंबर 2013 को जिले में सुलगी हिंसा की आग के बाद जनपद के 949 परिवार अपने गांव और घर छोड़ने को मजबूर हुए थे। मासूम बच्चों के साथ पूरी रात जंगलों में काटी। ठंड और बरसात में खुली छत के नीचे राहत शिविरों में रहे। आज कांधला और कैराना क्षेत्रों में एनजीओ की मदद से बसी विस्थापित कालोनियों में रहकर ये परिवार खुद को संभालने की कोशिश कर रहे हैं। अपने गांव में खेतों में मजदूरी तो मिल जाती थी, लेकिन इनमें से कुछ परिवार तो दो वक्त की रोटी को मोहताज हैं। अमर उजाला ने इन परिवारों का हाल जाना...
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कांधला की जन्नत कालोनी में बसे गांव लिसाढ़ निवासी सलीम के परिवार ने हिंसा के बाद अपना गांव छोड़ा था। परिजनों ने बताया कि उनका गांव का घर खंडहर पड़ा है। उसे कोई लेने को भी तैयार नहीं है। पहले गांव वालों के खेतों में मजदूरी करके पेट पालते थे, लेकिन अब रोजगार को भटक रहे हैं। काम मिल गया तो रोटी मिल जाती है वरना भूखे सोना पड़ता है। बेटियां बड़ी हो रही हैं लेकिन उनकी शादी नहीं हो पा रही हैं।
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मुजफ्फरनगर के गांव कुटबा निवासी महबूब का परिवार हिंसा के बाद अपना घर छोड़कर शरणार्थी शिविर में आ गया था। सरकार ने पांच लाख की मदद दी थी, लेकिन वो किसी ने धोखे से हड़प ली। अब कांधला की जन्नत कॉलोनी में रह रहा है, लेकिन यहां न पानी है ना बच्चों की पढ़ाई का इंतजाम। कभी काम मिल जाता है कभी भूखे रहना पड़ता है। गांव में सभी एक दूसरे के सुख दुख में शामिल होते थे, लेकिन यहां कोई पूछने वाला नहीं है।
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गांव लांक निवासी लियाकत का कहना है कि सांप्रदायिक दंगे के बाद लोगों ने अपनी जान बचाने के लिए कांधला में शरण ली थी, तब से लेकर आज तक परिवार मूलभूत सुविधाओं के लिए भटक रहा है। परिवार में काम धंधा नहीं है। पांच बेटी ओर दो बेटे हैं, जो शादी के लिए तैयार है लेकिन कोई शादी के लिए तैयार नहीं है। अपना गांव छोड़ने के बाद दर दर की ठोकरें ही मिली हैं।
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कैराना में भूरा बाईपास के पास बनी शफा कालोनी में रहने वाला दंगा पीड़ित मेहरबान के परिवार की वसीला ने बताया कि गांव में हुई हिंसा के बाद वे पूरी रात जंगलों में छिपते हुए कैराना आए। कोई सामान तक नहीं था। कई महीने सरकारी राहत शिविर में रहने के बाद एनजीओ द्वारा बसाई गई कालोनी में मिले मकान में रहने लगे। ससुर हाजी जमील को सरकार ने पांच लाख का मुआवजा दिया, लेकिन उनके परिवार को कुछ नहीं मिला। यहां उसके बच्चे स्कूल व मदरसे में पढ़ रहे हैं। उनका मकान गांव में ही पड़ा है। पति मजदूरी करके परिवार को पेट पालता है।
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