लोकसभा चुनाव 2019: गठबंधन के बाद भी मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट की डगर मुश्किल, रालोद को झटका
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सपा बसपा के बीच गठबंधन हो गया है, लेकिन रालोद की स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। दंगों के बाद हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सपा, बसपा और कांग्रेस प्रत्याशियों से करीब दो लाख अधिक वोट हासिल किए थे। तब कांग्रेस और रालोद का गठबंधन था। ऐसे में गठबंधन के बाद भी 2019 में यहां की राह आसान नहीं है। रालोद का साथ मिलने पर जरूर भाजपा की चुनौती बढ़ सकती है।
सपा और बसपा ने मिलकर चुनाव लडऩे का एलान कर दिया है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव पर नजर डाले तो बसपा के कादिर राना दूसरे स्थान पर रहे थे। उन्हें दो लाख 52 हजार 241 मत मिले थे। सपा के वीरेंद्र सिंह तीसरे नंबर पर रहे और उन्हें एक लाख 60 हजार 810 मत मिले।
कांग्रेस के पंकज अग्रवाल चौथे स्थान पर रहे और उन्हें मात्र 12 हजार 937 वोट मिले। तीनों प्रत्याशियों को मिलाकर कुल चार लाख 25 हजार 988 मत मिले। भाजपा को यहां कुल पड़े 11 लाख सात हजार 765 मतों में से छह लाख 53 हजार 391 मत मिले।
भाजपा तीनों प्रत्याशियों के वोट मिलाकर भी दो लाख 27 हजार 403 मतों से आगे रही। इन आंकड़ों को देखे तो सपा-बसपा के लिए मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट की डगर आसान नहीं है। दोनो दलों को भाजपा से पार पाने के लिए कड़ा संघर्ष करना होगा।
मुजफ्फरनगर पर फंसा पेच, रालोद को झटका
सपा-बसपा ने सिर्फ दो सीट अन्य दल के लिए छोड़ी है। ऐसे में चौधरी अजित सिंह के बागपत छोड़ कर मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने की तैयारियों पर पानी फिरता नजर आ रहा है। हालांकि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से अभी भी वार्ता जारी है।
एक संभावना बची है कि वह अपने खाते से मुजफ्फरनगर सीट रालोद के लिए छोड़ दे। एक साल से रालोद ने खोई ताकत पाने में जुटा है। कैराना उपचुनाव में जीत से पार्टी का हौसला बढ़ा था। पार्टी ने संगठन को ही मजबूत नहीं किया, बल्कि जनता से सीधा संवाद किया।
रालोद अध्यक्ष ने बुढ़ाना, खतौली, लालूखेड़ी और मीरापुर में जन संवाद कार्यक्रम किए। पार्टी के जाट-मुस्लिम समीकरण को फिर से साधने की नीति पर फोकस किया। सपा के पूर्व सांसद अमीर आलम और उनके बेटे पूर्व विधायक नवाजिश की रालोद में एंट्री हुई। कैराना सीट से तबस्सुम बेगम को प्रत्याशी बनाना भी छोटे चौधरी की उसी सोच का नतीजा था। जयंत चौधरी ने भी गांव में दौरे कर दंगा पीड़ितों के दर्द को सुना।
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