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मिशन 2019: दलितों को साधने में लगी भाजपा, कहीं छिटक न जाएं सवर्ण, ये रही खास वजह

Tue, 14 Aug 2018 05:13 PM IST
अनुज मित्तल, अमर उजाला, मेरठ
अनुज मित्तल, अमर उजाला, मेरठ Updated Tue, 14 Aug 2018 05:13 PM IST
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Mission 2019: BJP is trying to adopt Dalits, and upper caste society is upset
फाइल फोटो

भाजपा ने मिशन 2019 के तहत दलित और पिछड़ों को साधने की कवायद शुरू की है। दो दिवसीय प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में भी तमाम दिग्गज नेताओं का इसी पर जोर रहा। लेकिन भाजपा की इस कवायद से उसे झटका भी लग सकता है। क्योंकि जिस तरह अगड़ों की नाराजगी नजर आ रही है, उससे पिछड़ों को साधने में यदि अगड़े खिसक गए तो भाजपा की स्थिति और ज्यादा खराब हो सकती है।

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक और जातीय संघर्ष होते रहे हैं। यह खाई वर्षों से चली आ रही है। जिसे पाटने में अभी तक कोई कामयाब नहीं हुआ है। भाजपा की प्रदेश में सरकार बनने के बाद सांप्रदायिक दंगों पर तो रोक लगी है। लेकिन जिस तरह पिछले लगभग छह माह से जातीय विद्वेष बढ़ रहा है, वह चिंता का विषय है। लगातार जातीय संघर्ष हो रहे हैं। भाजपा के लिए भीम आर्मी बड़ी चुनौती बनी है। मेरठ के भी दो गांवों में एक सप्ताह पूर्व ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं। वहीं, दो अप्रैल की घटना के बाद दलित वर्ग भाजपा से कटा हुआ नजर आ रहा है।
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ऐसे में भाजपा ने इस वोट बैंक को साधने के लिए जहां पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया और दलित उत्पीड़न को लेकर अलग से विधेयक पारित कराया। उसे लेकर सवर्ण जाति के लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। सोशल मीडिया पर यह नाराजगी खुलकर सामने आ रही है। जो कल तक भाजपा का गुणगान करते नजर आते थे, वहीं अब जमकर आग उगल रहे हैं। ऐसे में भाजपा को दलित और पिछड़ों को साधने का यह कार्ड कहीं भारी न पड़ जाए।

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सहारनपुर से लेकर गौतमबुद्ध नगर तक जातीय खाई गहरी है। अति पिछड़ा वोट बैंक भाजपा के पक्ष में हमेशा सवर्णों के साथ खड़ा नजर आया है। लेकिन पिछड़ों की बात करें तो जाट और गुर्जर बिरादरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुख्य है। ये दोनों बिरादरी अपनी जाति के प्रत्याशी के साथ ही खड़ी नजर आयी हैं। लोकसभा चुनाव 2014 को यदि छोड़ दें तो जाट वोट बहुतायत में रालोद के पक्ष में ही रहा है जो उपचुनाव के बाद से रालोद की तरफ ही लौटता नजर आ रहा है। जबकि गुर्जर बिरादरी अपनी जाति के प्रत्याशी को ही चाहे वह किसी भी पार्टी से हो, उसके पक्ष में खड़ी नजर आयी है। यह बात अलग है कि लोकसभा 2014 का चुनाव जरूर इसका अपवाद रहा है। लेकिन वर्तमान में हालात फिर से 2014 के पहले वाली स्थिति की तरफ लौट रहे हैं। ऐसे में साफ है कि भाजपा को दलित और पिछड़ों को साधने के लिए उठाए गए कदम को बहुत ही सोच समझ कर उठाना होगा। क्योंकि सरधना विधानसभा में इसी मुद्दे पर ठाकुर बिरादरी पंचायत कर अपनी नाराजगी जता चुकी है। यदि यही स्थिति रही तो यह नाराजगी और ज्यादा बढ़ सकती है जो भाजपा के लिए खतरे की घंटी बन सकती है।

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