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Meerut: सरधना का ऐतिहासिक चर्च... बनवाया था एक मुस्लिम महिला बेगम समरू ने, मगर क्यों... कौन थे वाल्टर रेनार्ड?
Sun, 10 Nov 2024 11:10 PM IST
मोहम्मद मुस्तकीम
शाह आलम त्यागी, मेरठ
शाह आलम त्यागी, मेरठ
Published by: मोहम्मद मुस्तकीम
Updated Sun, 10 Nov 2024 11:10 PM IST
सार
सरधना के ऐतिहासिक चर्च को बने हुए दो सौ साल से ज्यादा हाे गए हैं। बताया जाता है कि इस चर्च को बनने में करीब 11 साल का समय लगा था।
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सरधना का ऐतिहासिक चर्च।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
ऐतिहासिक रोमन कैथोलिक चर्च को 202 साल पूरे हो गए हैं। बेगम समरू ने इस चर्च को बनावाया था। ये चर्च श्रद्धालुओं की आस्था, भव्यता और कला के बेजोड़ नमूने को संजोए हुए है। इस चर्च को ईसाई धर्म के लोग कृपाओं की माता मरियम का तीर्थस्थान मानते हैं। इस चर्च के कारण ही सरधना का नाम अंतरराष्ट्रीय फलक पर चमकता है।
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रोशनी से जगमगाया चर्च।
- फोटो : अमर उजाला
मेरठ मुख्यालय से करीब 20 किमी दूर सरधना में चर्च सौहार्द, आस्था और कलात्मक इतिहास का भव्य नमूना है। यहां पर हर साल दुनिया भर से विभिन्न जाति-धर्मों के लोगों को माता मरियम और प्रभु यीशु की आस्था खींच लाती है। इस चर्च का निर्माण एक ताकतवर मुस्लिम महिला महारानी बेगम समरू ने कराया था। इस चर्च को पोप जॉन 23वें ने 1961 में माइनर बसिलिका का दर्जा दिया था। ऐतिहासिक और भव्य गिरिजाघरों को ही यह दर्जा प्राप्त होता है। इस चर्च में कृपाओं की माता की वह तस्वीर मौजूद है, जिसे चर्च की सबसे बड़ी शान कहकर पुकारते हैं। इस चर्च का निर्माण 1809 में शुरू हुआ था। बनने में करीब 11 वर्ष का समय और सैकड़ों कारीगर लगे थे।
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चर्च में उमड़े श्रद्धालु।
- फोटो : अमर उजाला
बताया जाता है कि माता मरियम की तस्वीर के सामने सच्चे दिल से प्रार्थना करने पर हर मुराद पूरी होती है। इस तस्वीर को इंग्लैंड से लाया गया था। तस्वीर को जिस दिन चर्च में स्थापित किया गया, उसी एक महिला ने अपने बीमार बच्चे के साथ प्रार्थना की। इसके बाद बच्चा पूरी तरह स्वस्थ हो गया। तभी से यह चमत्कारिक तस्वीर श्रद्धालुओं पर कृपा बरसा रही है।
इस तीर्थस्थान की खूबसूरती देखने के लिए नवंबर से जनवरी माह के बीच का समय सबसे बेहतर है। नवंबर के दूसरे शनिवार व रविवार को होने वाले कृपाओं की माता महोत्सव में देश, विदेश से आए लाखों श्रद्धालु आकर मन्नत मांगते हैं। इसमें प्रभु यीशु को क्रूस पर लटकाए जाने की घटना को प्रतिमाओं के माध्यम से दर्शाया गया है।
इस तीर्थस्थान की खूबसूरती देखने के लिए नवंबर से जनवरी माह के बीच का समय सबसे बेहतर है। नवंबर के दूसरे शनिवार व रविवार को होने वाले कृपाओं की माता महोत्सव में देश, विदेश से आए लाखों श्रद्धालु आकर मन्नत मांगते हैं। इसमें प्रभु यीशु को क्रूस पर लटकाए जाने की घटना को प्रतिमाओं के माध्यम से दर्शाया गया है।
सरधना चर्च।
- फोटो : अमर उजाला
फरजाना से ऐसे बनीं बेगम समरू
इस चर्च का निर्माण करीब चार लाख रुपये में हुआ था। बागपत के कोताना गांव में लतीफ खां के परिवार में जन्मी फरजाना बेगम अपने सौतेले भाइयों के जुल्म से परेशान होकर मां के साथ दिल्ली चली गई थीं। उन्होंने नृत्य को अपना पेशा बना लिया। इसी दौरान उनकी मुलाकात सरधना रियासत के हुक्मरान वाल्टर रेनार्ड समरू से हुई। रेनार्ड समरू और फरजाना प्रेम प्रसंग शुरू होने के बाद एक-दूसरे के हो गए। फरजाना नर्तकी से बेगम समरू बन गईं।
इस चर्च का निर्माण करीब चार लाख रुपये में हुआ था। बागपत के कोताना गांव में लतीफ खां के परिवार में जन्मी फरजाना बेगम अपने सौतेले भाइयों के जुल्म से परेशान होकर मां के साथ दिल्ली चली गई थीं। उन्होंने नृत्य को अपना पेशा बना लिया। इसी दौरान उनकी मुलाकात सरधना रियासत के हुक्मरान वाल्टर रेनार्ड समरू से हुई। रेनार्ड समरू और फरजाना प्रेम प्रसंग शुरू होने के बाद एक-दूसरे के हो गए। फरजाना नर्तकी से बेगम समरू बन गईं।