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भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बनेगा सपा-बसपा का गठबंधन, पढ़ें- क्या है वेस्ट यूपी का गणित?

Sun, 13 Jan 2019 03:10 AM IST
कपिल kapil अनुज मित्तल, अमर उजाला, मेरठ
अनुज मित्तल, अमर उजाला, मेरठ Published by: कपिल kapil Updated Sun, 13 Jan 2019 03:10 AM IST
सार

लोकसभा चुनाव में भाजपा के विजयी रथ को रोकने के लिए सपा और बसपा एक साथ मैदान में उतर चुके हैं। उपचुनावों में गठबंधन का ट्रायल पास होने के बाद विपक्षी दलों ने साझा रणनीति तैयार की।

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Meerut, SP BSP coalition will be a challenge for BJP
बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव - फोटो : amar ujala

विस्तार

लोकसभा चुनाव में भाजपा के विजयी रथ को रोकने के लिए सपा और बसपा एक साथ मैदान में उतर चुके हैं। उपचुनावों में गठबंधन का ट्रायल पास होने के बाद विपक्षी दलों ने साझा रणनीति तैयार की। यह बात अलग है कि कांग्रेस और रालोद को गठबंधन से दूर रखा गया है।

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पश्चिमी यूपी में जातिगत और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के आधार पर चुनाव होता रहा है। 2009 के लोकसभा चुनाव की अगर बात करें तो भाजपा ने रालोद से गठबंधन करते हुए यह चुनाव लड़ा था। जिसमें मेरठ सहित मुजफ्फरनगर, बागपत, बिजनौर और गाजियाबाद की लोकसभा सीटों के आंकड़े देखे तो रालोद से गठबंधन का फायदा भाजपा को मिला और बिना लहर के इन पांच सीटों में से चार सीटों पर भाजपा और रालोद गठबंधन ने चार सीटों पर कब्जा किया था। एक सीट बसपा के हाथ लगी थी।

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वहीं 2014 में मोदी लहर में सभी विपक्षी दल धराशायी हो गये थे। यह चुनाव कांग्रेस और रालोद ने जहां मिलकर लड़ा था तो सपा और बसपा अकेले दम पर मैदान में थे। इस चुनाव में भाजपा ने सभी पांचों सीटों पर बड़े अंतर से जीत हासिल की थी। जिसमें गाजियाबाद और मुजफ्फरनगर लोकसभा तो ऐसी रही, जहां पर तीनों प्रमुख दलों को मिले कुल मतों से भी ज्यादा भाजपा को वोट मिले थे।

इस बार बदली है हवा
लोकसभा चुनाव 2014 पूरी तरह मुजफ्फरनगर दंगे की सोच में डूबा हुआ था। इसके साथ ही तब मोदी लहर पूरे चरम पर थी। तब से अब तक इस सोच में बदलाव आया है। जाट बाहुल्य इस बेल्ट में रालोद मुख्य फैक्टर रहा है। यह बात अलग है कि 2014 में मुजफ्फरनगर दंगे की आग में रालोद को भी क्षति हुई थी। लेकिन इन चार सालों में इस तरफ से भरपाई का पूरा प्रयास हुआ है। वहीं 2014 में मुस्लिम मतों का भी बिखराव लगभग हर जगह नजर आया था। लेकिन सपा और बसपा गठबंधन के बाद मुस्लिम मतों का बिखराव होना इस बार मुश्किल नजर आ रहा है। सहारनपुर सीट पर ही मुस्लिम मतों का बिखराव हो सकता है।

लोकसभा चुनाव में एससी वोट पर नजर
लोकसभा चुनाव 2019 में महागठबंधन सहित भाजपा की भी एससी वोट पर नजर होगी। हालांकि पिछले तमाम आंकड़े यदि उठाकर देखें तो विधानसभा चुनाव में जहां एससी वोट बसपा की तरफ होता है तो लोकसभा चुनाव में उसका कुछ वोट बैंक छिटक जाता है। लेकिन पिछले दिनों हुए आरएसएस के राष्ट्रोदय के मिशन और भाजपा की रणनीति इसी एससी वोट बैंक को साधने की है। लेकिन एससी एक्ट को लेकर एक अप्रैल 2018 को हुए बवाल के बाद से एससी भाजपा से छिटका नजर आ रहा है।

रालोद के रुख पर रहेगी नजर
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद का रुख अभी स्पष्ट नहीं है। यदि वह सपा बसपा गठबंधन के साथ जाता है, तो भाजपा के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है। लेकिन पिछले चुनाव की तरह यदि रालोद कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव में उतरता है तो भाजपा के लिए राहत की सांस होगी। भाजपाई सूत्रों की मानें तो सपा बसपा गठबंधन के बाद भाजपा ने भी चौ. अजित सिंह से संपर्क साधने की कवायद शुरू कर दी है। यदि 2009 की तरह भाजपा को पश्चिम में रालोद का साथ मिलता है, तो भाजपा के लिए राह आसान हो सकती है।

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