अमर उजाला की खास रिपोर्ट: वेस्ट यूपी में आधे हुए दुधारू गायों के दाम, ये रही बड़ी वजह
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प्रदेश में योगी सरकार आते ही गोवंश तस्करी और अवैध कटान पर सख्ती शुरू हो गई थी, लेकिन बुलंदशहर घटना के बाद से और कड़ी निगरानी हो रही है। इसके चलते मेरठ ही नहीं आसपास के जिलों में भी दुधारू गायों की कीमत घटकर औसतन आधी रह गई है। सरकार की सख्ती का परिणाम है कि बेसहारा गोवंशों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। वहीं पशु पैठ में भी कटान के लिए गोवंशों की खरीद फरोख्त बंद हो गई है।
वेस्ट यूपी के जिलों में यदि दुधारू गायों की नस्ल की बात करें तो फ्रीजवाल नस्ल की गायें सर्वाधिक हैं। 1989-90 में विदेशी नस्ल की गाय हॉलस्टीन और फ्रिजियन के ब्रीड से इसे तैयार किया गया था। यह औसतन दिन में 18 से 20 लीटर दूध देती है। वहीं साहीवाल नस्ल की गायें भी औसतन एक दिन में 15 से 20 लीटर तक दूध देती हैं। देशी गाय के बाद इस नस्ल की गाय के दूध की गुणवत्ता अच्छी होती है। इस नस्ल की कुछ गाय एक दिन में 28 लीटर तक दूध भी दे सकती हैं।
देश में 1990 के दशक तक देशी नस्ल की गाय सबसे अधिक मिलती थीं लेकिन यह नस्ल अब कम होती जा रही है। ये गायें 10 से 15 लीटर दूध ही प्रतिदिन देती हैं। इस नस्ल की गायों में बीमारी कम होती है, लेकिन बरसात में कम दूध देती हैं। वहीं गुजरात की गिर नस्ल की गाय भी यहां मिलने लगी हैं। इनकी संख्या बहुत कम है। ये रोजाना 12 से 15 लीटर दूध देती हैं।
दुधारू गायों की कीमत में गिरावट
निजी पशु चिकित्सक डॉ. आदेश कुमार का कहना है कि वेस्ट यूपी में बुलंदशहर के बाद हापुड़, मेरठ, मुजफ्फरगर, बागपत, शामली में अच्छी नस्ल की गायें मिलती हैं। जिन जिलों में दूध की डेयरियां अधिक हैं, वहां गाय की कीमत सबसे ज्यादा है। गायों का अवैध कटान बंद होने से पशु पालक गाय पालने से पीछे हटने लगे हैं। वजह गाय बांझ हो गई तो उसका खरीदार नहीं मिलेगा और वह मुफ्त में छोड़नी पड़ेगी।
प्रदेश में भाजपा सरकार आने के बाद से लगातार गाय की कीमतों में कमी आई है। औसतन 20 लीटर दूध देने वाली गाय जो पहले 55 हजार के आसपास थी, उनकी कीमत इस समय 30 हजार के करीब आ गई है। 15 लीटर दूध देने वाली गाय की कीमत 45 हजार से घटकर 25 हजार के आसपास रह गई है। जबकि 10 लीटर दूध देने वाली गाय की कीमत 18 से 20 हजार पर अटकी है।
आश्रय स्थल से भी नहीं होगा समाधान
अमित जिंदल के अनुसार गोवंश आश्रय स्थल में पशुओं को छोड़ने वाले को पैसा देना पड़ता है। ऐसे में वहां पर भी खर्च आने के कारण गोवंश पालक इससे दूर हो रहे हैं। इसके लिए सामाजिक और धार्मिक संस्थाएं यदि पहल करें तो गोवंश पालने की तरफ लोगों का रुझान बढ़ सकता है।
पशु पैठ में नहीं लाए जा रहे गोवंश
सभी जिलों में अलग-अलग साप्ताहिक पशु पैठ लगती हैं, लेकिन अधिकांश पैठ पिछले काफी समय से बंद हैं। गोवंश तो लाया ही नहीं जाता। गाय पालने वालों के लिए उसका बछड़ा सबसे ज्यादा मुसीबत का कारण बनता है क्योंकि खेतों में बैलों का प्रयोग अब नाममात्र ही है। ऐसे में गाय पालने वाले बछड़े को बेच देते थे। लेकिन सख्ती होने के बाद गोवंश पालक बछड़ों के साथ ही अनुपयुक्त गायों को भी आवारा छोड़ने लगे हैं। आवारा पशुओं को छोड़ने पर भी रोक लगी तो गोवंश के दाम तेजी से गिरने शुरू हो गए हैं।
यह बात जरूर सामने आयी है कि दुधारू गायों की कीमत में गिरावट हुई है। लेकिन पशु पालकों में गाय पालने का क्रेज अभी कम नहीं हुआ है। देशी नस्ल की गायों में कमी आई है। देखने में आ रहा है कि नर पशु ज्यादा छोड़े जा रहे हैं। - डॉ. एके सिंह, मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी
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