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यूपी: मेजर मनोज हम शर्मिंदा हैं... तुम्हारी शहादत का यहां कोई मोल नहीं, सामने आई अफसरों की बड़ी लापरवाही

Sat, 19 Jun 2021 06:28 PM IST
कपिल kapil न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: कपिल kapil Updated Sat, 19 Jun 2021 06:28 PM IST
सार

कारगिल की लड़ाई में शहीद हुए मेजर मनोज तलवार की शहादत का यहां कोई मोल ही नहीं है। अफसरों की बड़ी लापरवाही सामने आई है।

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Meerut News: There has been negligence in the honor of martyr Major Manoj Talwar
मेरठ में कमिश्नरी चौराहे पर लगी मेजर शहीद मनोज तलवार की प्रतिमा। - फोटो : amar ujala

विस्तार

एक मेजर मनोज तलवार थे। जो कारगिल की लड़ाई में शहीद हो गए। जिनका पार्थिव शरीर घर पहुंचा तो चिट्ठी लेकर पीछे-पीछे डाकिया भी घर आ गया। ये चिट्ठी मेजर मनोज ने अपनी शहादत से एक दिन पहले माइनस 40 डिग्री तापमान में तोप के गोलों की आवाज के बीच बंकर में बैठकर लिखी थी। ऐसे माहौल में भी उन्होंने यही लिखा था डियर मम्मी-पापा... अपना ख्याल रखना। मेरी चिंता मत करना। आऊंगा तो जीतकर ही आऊंगा, चाहे तिरंगे में लिपटकर आऊंगा। ऐसे शहीद बेटे से आज हम माफी मांगते हैं। क्रांतिधरा का तमगा रखने वाला आज हमारा मेरठ ऐसे शहीदों की प्रतिमा को भी नहीं सहेज सका। मेजर मनोज हम शर्मिंदा हैं... तुम्हारी शहादत का यहां इतना ही मोल है। 

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ये कोई फिल्मी कहानी नहीं है। आपकी क्रांतिधरा और यहां तैनात रहने वाले अफसरों की कार्यशैली की हकीकत है। मेजर मनोज तलवार कारगिल की लड़ाई में 13 जून 1999 को शहीद हो गए। पार्थिव शरीर घर आया तो मुजफ्फरनगर तक से लोग यहां आए। कई किलोमीटर तक सड़क पर पैर रखने की जगह नहीं थी। जब तक सूरज चांद रहेगा, मनोज तेरा नाम रहेगा... नारे गूंज रहे थे। सांसद, विधायक, मंत्री और अफसर पता नहीं कौन-कौन जाने क्या-क्या वादे कर रहे थे। पिता सेना कैप्टन रहे डिफेंस कॉलोनी निवासी कैप्टन पीएल तलवार जवान बेटे के गम में बस आंसू बहाते रहे। उन्हें यकीन था कि बेटे की शहादत को मेरठ में पहचान मिलेगी लेकिन, ये उनकी भूल निकली। 
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मवाना बस स्टैंड चौराहे पर मेजर मनोज तलवार की प्रतिमा लगाई गई। कुछ सालों बाद चौराहे का सौंद्रयीकरण हुआ तो मनोज तलवार की प्रतिमा को वहां से किनारे लगा दिया। फुटपाथ पर। जहां लोग रोज शराब पीते थे। चप्पल निकालकर बैठते थे। 
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शहीद का ऐसा अपमान तो नहीं होता। आपके अखबार अमर उजाला ने अभियान छेड़ा और शहीद की प्रतिमा को दोबारा चौराहे पर स्थापित कराया। लेकिन जो पत्थर यहां लगा था कि उस पर मेजर मनोज की शहादत की तारीख 13 जून की जगह 23 जून लिखी थी।

सांसद ने लिखा था पत्र, ठीक कराओ तिथि 
पांच दिन पहले 13 जून को मेजर मनोज की शहादत के दिन सांसद राजेंद्र अग्रवाल ने मेयर को पत्र लिखकर इस तिथि को ठीक कराने को कहा। शहर के तमाम बड़े अधिकारियों ने बयान दिए कि तिथि ठीक करा दी जाएगी। नगर निगम ने शुक्रवार को शिलापट पर कारीगर-मजदूर भेजकर काम भी कराया। 

किसी पढ़े-लिखे को भेज देते तो अच्छा होता 
लापरवाही की इंतहा देखिए जिनको सरकार मोटी तनख्वाह देती है, जिनको सरकार गाड़ी-बंगला देती है। जो सरकारी अफसर होने का रसूख दिखाते हैं, उनको वहां पर जाने की शायद फुर्सत तक नहीं रही। यही वजह रही कि मेजर मनोज की शहादत की तिथि तो ठीक हुई नहीं बल्कि जब यहां 22 जुलाई 2002 को प्रतिमा का अनावरण हुआ था तो उस पत्थर की तिथि पर आज 13 जून 2002 कर दिया गया। यानि प्रतिमा के अनावरण की सही तिथि भी गलत कर दी गई है। बराबर में लगा पत्थर जिस पर मनोज तलवार की शहादत की गलत तिथि लिखी है, उसे शायद सरकारी विभागों के अफसर-कर्मचारी देख नहीं पाए... या जानबूझकर आंखें मूंद ली... ये सोचकर कि आज शहीद थोड़े हुआ है।  

जो इंजीनियर गए थे, उन्होंने बताया कि भ्रमवश गलती हो गई है। शनिवार को इस गलती को ठीक करा लिया जाएगा। - यशवंत कुमार, मुख्य अभियंता नगर निगम

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