मेडिकल कालेज में दवाओं का टोटा
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हर रोज ढाई से तीन हजार मरीजों को ओपीडी में देखने वाले लाला लाजपत राय मेमोरियल मेडिकल कालेज में दवाओं का खासा टोटा है। चुनाव के मद्देनजर कुछ आवश्यक दवायें इमरजेंसी की स्थिति के लिए लोकल पर्चे के जरिये खरीदी गई है लेकिन वो आम आदमी को नहीं मिल पा रहा है। मरीजों को बीते करीब तीन महीने से बेसिक दवायें भी बाहर से खरीदनी पड़ रही है। हालात कुछ इस तरह के हैं कि कालेज की झोली खाली है और अब अतिरिक्त बजट आचार संहिता के बीच मरीजों को मिल नहीं सकता है। ऐसे में जनता की जेब अच्छी खासी खाली हो रही है। ऐसे में मार्च के अंत तक ही मेडिकल कालेज को बजट मिलने की संभावना है।
नवंबर से लेकर अब तक मेडिकल कालेज में दवाओं को टोटा बना हुआ है, सर्जरी से लेकर अन्य सामान्य बीमारियों में मरीजों को दवायें निजी अस्पताल से खरीदनी पड़ रही है। क्योंकि मेडिकल कालेज में दवायें उपलब्ध होते हुए भी मरीज का कंप्लीट इलाज नहीं हो पा रहा है। दरअसल चिकित्सक मर्ज के हिसाब से जिस सॉल्ट एवं कॉम्बिनेशन की दवायें लिखते हैं वो पूरी अस्पताल में नहीं मिलती है। हल्की एंटीबायोटिक, पेनकिलर, मल्टी विटामिन जैसे ही सामान्य दवायें उपलब्ध हैं। ऐसे में सर्दी खांसी जैसे बीमारी में लोगों को बाहर से दवायें खरीदने की जरूरत पड़ रहे है। कालेज प्रशासन लंबे समय से कोशिशों में लगा था कि उसे बजट मिल जाये। दिसंबर में कुछ उम्मीद भी बंधी थी लेकिन उसके बाद जनवरी में आचार संहिता लगते हैं बजट मिलने की सारी उम्मीदें धूमिल हो गई है। अब आचार संहिता के बीच चुनाव आयोग दवायें खरीदने के स्वीकृति तो दे सकती है लेकिन बजट जारी नहीं कर सकता है। ऐसे में नई सरकार के गठन के बाद ही कुछ उम्मीद की जा सकती है।
केमिकल खरीद बन गई संकट का कारण
मेडिकल प्रशासन ने इस बार करीब डेढ़ करोड़ रुपया लैब के लिए केमिकल खरीदने पर खर्च किया। आरोप यह भी लगते रहे हैं कि इतने केमिकल की जरूरत ही नहीं थी लेकिन कालेज प्रशासन ने बड़ी रकम इसमें झोंकी। उधर, प्राचार्य डॉ. केके गुप्ता कहते आ रहे हैं कि अगर 24 घंटे मरीजों को जांच सुविधा मुहैया करानी थी तो उसके लिए केमिकल की खरीद जरूरी थी जिसके बाद अब मेडिकल कालेज कंप्लीट जांच करा पा रहा है। अब इसकी सच्चाई यह भी है कि जांच तो रही हैं लेकिन दवायें बाहर से खरीदनी पड़ रही हैं।