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Meerut News: एमडी कार्यालय में हंगामे के 21 साल बाद दो व्यापारी दोषमुक्त
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- गवाहों से आरोपियों की शनाख्त नहीं कराई गई, स्वतंत्र साक्ष्य भी नहीं मिला
माई सिटी रिपोर्टर
मेरठ। पीवीवीएनएल के एमडी कार्यालय में वर्ष 2005 में बिजली आपूर्ति को लेकर हुए प्रदर्शन और हंगामे के मामले में अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय संख्या-10 ने संयुक्त व्यापार संघ संरक्षक अरुण वशिष्ठ और संजीव रस्तौगी को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में असफल रहा। इस फैसले में 21 साल का लंबा समय लग गया।
संयुक्त व्यापार संघ संरक्षक अरुण वशिष्ठ ने बताया कि अभियोजन पक्ष के अनुसार, 20 जून 2005 को विद्युत आपूर्ति के मामले में व्यापारी एमडी कार्यालय पर ज्ञापन देने पहुंचे थे। आरोप था कि व्यापारियों ने कार्यालय के चैनल पर ताला लगाने का प्रयास किया। मौके पर पहुंचे तत्कालीन अपर नगर मजिस्ट्रेट ध्यान प्रकाश श्रीवास्तव ने ज्ञापन उन्हें सौंपने को कहा लेकिन आरोप है कि उनके साथ कॉलर पकड़कर खींचतान, मारपीट और गाली गलौज की गई। उनकी शर्ट फटने और चोट लगने की बात भी मुकदमे में कही गई। मामले में अरुण वशिष्ठ, संजीव रस्तौगी, उदित गुप्ता और धर्मवीर आनंद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई।
मुकदमा चलता रहा और इस बीच उदित गुप्ता की मृत्यु हो गई। धर्मवीर आनंद की पत्रावली अलग कर दी गई। वर्तमान में अरुण वशिष्ठ और संजीव रस्तौगी के खिलाफ कार्यवाही चल रही थी। अदालत ने साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए कहा कि वादी ने मुख्य परीक्षा में आरोप लगाए लेकिन जिरह में स्वीकार किया कि आरोपियों की कोई शिनाख्त परेड नहीं कराई गई और वह बाद में उन्हें पहचान नहीं सके। अन्य गवाह ने भी कहा कि आरोपियों के नाम घटना वाले दिन पहली बार पता चले और उनकी शनाख्त नहीं कराई गई।
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अदालत ने यह भी माना कि अभियोजन ने विवेचक, एफआईआर लेखक, चिकित्सक और किसी स्वतंत्र गवाह को पेश नहीं किया। एक अन्य गवाह की मुख्य परीक्षा तो हुई लेकिन जिरह नहीं हो सकी। इसके अलावा धारा 147 के तहत पांच या अधिक लोगों के समूह का आवश्यक तत्व भी अदालत ने उल्लेखित किया। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को सही साबित नहीं कर सका। इसके चलते 10 सितंबर 2026 को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अंजुम सैफी ने अरुण वशिष्ठ और संजीव रस्तौगी को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।
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माई सिटी रिपोर्टर
मेरठ। पीवीवीएनएल के एमडी कार्यालय में वर्ष 2005 में बिजली आपूर्ति को लेकर हुए प्रदर्शन और हंगामे के मामले में अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय संख्या-10 ने संयुक्त व्यापार संघ संरक्षक अरुण वशिष्ठ और संजीव रस्तौगी को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में असफल रहा। इस फैसले में 21 साल का लंबा समय लग गया।
संयुक्त व्यापार संघ संरक्षक अरुण वशिष्ठ ने बताया कि अभियोजन पक्ष के अनुसार, 20 जून 2005 को विद्युत आपूर्ति के मामले में व्यापारी एमडी कार्यालय पर ज्ञापन देने पहुंचे थे। आरोप था कि व्यापारियों ने कार्यालय के चैनल पर ताला लगाने का प्रयास किया। मौके पर पहुंचे तत्कालीन अपर नगर मजिस्ट्रेट ध्यान प्रकाश श्रीवास्तव ने ज्ञापन उन्हें सौंपने को कहा लेकिन आरोप है कि उनके साथ कॉलर पकड़कर खींचतान, मारपीट और गाली गलौज की गई। उनकी शर्ट फटने और चोट लगने की बात भी मुकदमे में कही गई। मामले में अरुण वशिष्ठ, संजीव रस्तौगी, उदित गुप्ता और धर्मवीर आनंद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई।
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मुकदमा चलता रहा और इस बीच उदित गुप्ता की मृत्यु हो गई। धर्मवीर आनंद की पत्रावली अलग कर दी गई। वर्तमान में अरुण वशिष्ठ और संजीव रस्तौगी के खिलाफ कार्यवाही चल रही थी। अदालत ने साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए कहा कि वादी ने मुख्य परीक्षा में आरोप लगाए लेकिन जिरह में स्वीकार किया कि आरोपियों की कोई शिनाख्त परेड नहीं कराई गई और वह बाद में उन्हें पहचान नहीं सके। अन्य गवाह ने भी कहा कि आरोपियों के नाम घटना वाले दिन पहली बार पता चले और उनकी शनाख्त नहीं कराई गई।
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अदालत ने यह भी माना कि अभियोजन ने विवेचक, एफआईआर लेखक, चिकित्सक और किसी स्वतंत्र गवाह को पेश नहीं किया। एक अन्य गवाह की मुख्य परीक्षा तो हुई लेकिन जिरह नहीं हो सकी। इसके अलावा धारा 147 के तहत पांच या अधिक लोगों के समूह का आवश्यक तत्व भी अदालत ने उल्लेखित किया। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को सही साबित नहीं कर सका। इसके चलते 10 सितंबर 2026 को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अंजुम सैफी ने अरुण वशिष्ठ और संजीव रस्तौगी को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।