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महाभारत : 'लाक्षागृह' की खुदाई आज से शुरू, खुलेंगे कई अहम राज

Wed, 10 Jan 2018 05:15 PM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, बागपत
यूपी डेस्क, अमर उजाला, बागपत Updated Wed, 10 Jan 2018 05:15 PM IST
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Mahabharata : the secret of lakshagraha will open, read in one click history
बरनावा लाक्षागृह गुफा - फोटो : अमर उजाला

बरनावा में उत्खनन से इतिहास के कई राज खुलने की संभावना है। बागपत से बरनावा और हस्तिनापुर तक के क्षेत्र को 12 साल पहले महाभारत सर्किट में शामिल किया। उत्तर प्रदेश के पर्यटन मंत्री रहे नवाब कोकब हमीद की पहल पर केंद्र सरकार ने सर्किट को मंजूरी दी। पांच करोड़ रुपये खर्च भी हुए, लेकिन क्षेत्र में पर्यटन की दृष्टि से कोई विकास नहीं हुआ।

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पूर्व पर्यटन मंत्री नवाब कोकब हमीद ने वर्ष 2005-06 में केंद्र सरकार को महाभारत सर्किट का प्रस्ताव भेजा। बरनावा, बागपत और हस्तिनापुर के एतिहासिक महत्व और इतिहास से इसके जुड़ाव का उदाहरण देकर महाभारत सर्किट का विकास कराने का आग्रह किया। केंद्र सरकार ने इस सर्किट को मंजूरी दी। यही नहीं आठ करोड़ रुपये मंजूर किए, इनमें से पांच करोड़ रुपये खर्च किए, लेकिन इस सर्किट का विकास नहीं हो सका। नवाब कोकब हमीद बताते हैं कि अधिकतर जगह स्टैंड, साइकिल स्टैंड तत्कालीन सरकार ने बनवाए, इससे पर्यटन के क्षेत्र में बहुत बड़ा फायदा नहीं हुआ। यूपी सरकार में रहते हुए उन्होंने पहल की और अपना काम करा दिया, लेकिन केंद्र सरकार इस सर्किट का विकास नहीं करा सकी। यही वजह है कि पर्यटन की दृष्टि से बरनावा कम ही लोग पहुंचते हैं। वह कहते हैं कि यह पूरा क्षेत्र महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। इसके विस्तृत विकास की जरूरत है।
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बरनावा से बागपत तक आज भी गुफा
बरनावा से बागपत तक करीब 30 किमी लंबी गुफा वर्तमान में भी मौजूद है। लोगों का दावा है कि इसी गुफा के जरिये वार्णावृत्त से पांडव बच निकलते हुए बागपत तक पहुंचे थे। पर्यटन सर्किट में शामिल होने के बाद सुरंग का आगे का हिस्सा पक्का करा दिया गया। बरनावा और बागपत की कश्यप कॉलोनी में यमुना किनारे स्थित खंडवारी में इसके प्रमाण आज भी मौजूद हैं।
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हस्तिनापुर, बरनावा और बागपत
पूर्व मंत्री नवाब कोकब हमीद कहते हैं कि खंडवारी की गुफा इतिहास में मिले प्रमाण और बुजुर्गों की कहानियां बताती हैं कि हस्तिानापुर, बरनावा और बागपत के खंडवारी क्षेत्र में ही महाभारत हुआ था। यह पूरा क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़ता है। हकीकत जानने के लिए लंबे समय तक अध्ययन  की जरूरत है। इतिहास को सहेजने के लिए गंभीरता से प्रयास भी करने चाहिए। बागपत के खंडवारी में रह रहे महाराज कंवर नाथ बताते हैं कि इस गुफा में जंगली जानवरों ने डेरा बना लिया था। करीब 60 साल पहले तेंदुए के गुफा में घुस जाने के कारण बाद में इसे बंद कराया गया। यहां पर उनसे पहले रहे साधुओं ने यह कहानी बताई है।

पढ़ें : अब खुलेगा 'लाक्षागृह' का राज, खुदाई के लिए बरनावा पहुंची टीम

बरनावा में आज से उत्खनन, पुरातत्व की टीम पहुंची

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बरनावा में उत्खनन - फोटो : अमर उजाला

बरनावा में इतिहास के राज जानने के लिए पुरातत्व संस्थान के निदेशक डॉ. एसके मंजुल के नेतृत्व में बुधवार से विधिवत उत्खनन होगा। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने बरनावा में उत्खनन की मंजूरी दी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग उत्खनन शाखा द्वितीय और भारतीय पुरातत्व संस्थान लाल किला की संयुक्त टीम उत्खनन करेगी। दोपहर दो बजे उत्खनन कार्य शुरू होगा। बरनावा हिंडन और कृष्णा नदी से घिरा हुआ है। इसके पास ही शेखपुरा में दोनों नदियां एक हो जाती है। टीले पर गुंबद है और यहीं से एक गुफा निकलती है।

सिनौली, चंदायन और अब बरनावा
वर्ष 2005 के सितंबर माह में सिनौली में खुदाई का कार्य कराया। यहां हड़प्पा कालीन शवादान गृह मिला। इससे इस क्षेत्र में हड़प्पा कालीन सभ्यता की पुष्टि हो गई। इसके बाद वर्ष 2015 में चंदायन गांव में उत्खनन का कार्य केंद्र सरकार करा चुकी है। चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति, कुषाण काल, गुप्त और राजपूत सभ्यताओं के प्रमाण भी मिल चुके हैं। निदेशक पुरावशेष डॉ. डीएन डिमरी ने बताया कि उत्खनन का उद्देश्य यह जानना है कि इस क्षेत्र में किन-किन सभ्यताओं के अवशेष हो सकते हैं। यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि बरनावा का महाभारत काल से कितना और कैसा संबंध रहा है। पुरातत्व संस्थान के निदेशक डॉ. एसके मंजुल के निर्देशन में खुदाई का कार्य किया जाएगा।

इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी की टीम पहुंची
उत्खनन में सहयोग के लिए इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी सर्वे ऑफ इंडिया के 15 छात्र-छात्राओं का दल भी बरनावा पहुंच चुका है। सहायक पुरातत्व विद डॉ. प्रियंक गुप्ता के नेतृत्व में छात्र पहुंचे हैं। बुधवार से होने वाले उत्खनन कार्य के दौरान  छात्र भी सहयोग करेंगे।

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