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कानून बना तो 10 गुना सस्ता हो जाएगा इलाज
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 19 Apr 2017 02:17 AM IST
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फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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मरीजों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के मकसद से सरकार कानून बनाने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संकेत दिए हैं कि सरकार ऐसा कानून लाएगी, जिसके तहत डॉक्टरों के लिए मरीजों को जेनेरिक दवाएं लिखना अनिवार्य होगा। अगर यह कानून बन गया तो मरीजों के इलाज का खर्च पांच से दस गुना तक सस्ता हो जाएगा। दरअसल, जेनेरिक दवाओं के मूल्य निर्धारण पर सरकारी अंकुश होता है, इसलिए वे सस्ती होती हैं। जबकि पेटेंट दवाओं की कीमत कंपनियां खुद तय करती हैं, इसलिए वे महंगी होती हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि यदि डॉक्टर मरीज को जेनेरिक दवाइयों की सलाह देने लगें तो सिर्फ धनी देशों में चिकित्सा व्यय पर 70 प्रतिशत तक कमी आ जाएगी। गरीब देशों के चिकित्सा व्यय में यह कमी और भी ज्यादा होगी। कई बार तो ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं की कीमतों में 90 प्रतिशत तक फर्क होता है। जेनेरिक दवाएं बिना किसी पेटेंट के बनाई और वितरित की जाती हैं। जेनेरिक दवा के फॉर्मुलेशन पर पेटेंट हो सकता है, लेकिन उसकी सामग्री पर पेटेंट नहीं हो सकता। जानकार बताते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय मानकों से बनी जेनेरिक दवाइयों की गुणवत्ता ब्रांडेड दवाइयों से कम नहीं होती। यह भी उतना ही असर करती हैं जितनी ब्रांडेड दवाएं। जेनेरिक दवाइयों को बाजार में लाने का लाइसेंस मिलने से पहले गुणवत्ता मानकों की सभी सख्त प्रक्रियाओं से गुजरना होता है। इन दवाओं के प्रचार-प्रसार पर कंपनियां कुछ खर्च नहीं करतीं। दूसरी तरफ, दवा कंपनियां ब्रांडेड दवा से बड़ा मुनाफा कमाती हैं। यही वजह है कि डॉक्टर जेनेरिक दवाएं लिखते ही नहीं और ब्रांडेड दवाओं का कारोबार दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।
ये होता है अंतर
अगर ब्रांडेड दवा की 14 गोलियों का एक पत्ता 786 रुपये का है, तो एक गोली की कीमत करीब 56 रुपये हुई। इसी सॉल्ट की जेनेरिक दवा की 10 गोलियों का पत्ता सिर्फ 59 रुपये में ही उपलब्ध हो जाएगा। इसकी एक गोली करीब 6 रुपये में पड़ेगी। वहीं किडनी, यूरिन, बर्न, दिल संबंधी रोग, न्यूरोलॉजी डायबिटीज जैसे बीमारियों में ब्रांडेड और जेनेरिक दवा की कीमत में बहुत ज्यादा अंतर देखने को मिलता है।
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ये होती हैं जेनेरिक दवाएं
किसी एक बीमारी के लिए तमाम शोधों के बाद एक रासायनिक यौगिक को विशेष दवा के रूप में देने की संस्तुति की जाती है। इस यौगिक को अलग-अलग कंपनियां अलग-अलग नामों से बेचती हैं। जेनेरिक दवाइयों का नाम उसमें उपस्थित सक्रिय यौगिक के नाम केआधार पर एक विशेषज्ञ समिति निर्धारित करती है। किसी भी दवा का जेनेरिक नाम पूरे विश्व में एक ही होता है। आपकी किसी भी बीमारी के लिए डॉक्टर जो दवा लिखते हैं, उसी दवा केसॉल्ट वाली जेनेरिक दवाएं उससे काफी कम कीमत पर आपको मिल सकती हैं। जेनेरिक दवाएं उत्पादक से सीधे रिटेलर तक पहुंचती हैं। कीमत का यह अंतर पांच से दस गुना तक हो सकता है। ज्यादातर कंपनियां ब्रांडेड के साथ-साथ कम कीमत वाली जेनेरिक दवाएं भी बनाती हैं।
मोबाइल एप से पता करें कीमत का अंतर
ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं की कीमत में अंतर का पता लगाने केलिए एक मोबाइल एप ‘समाधान और हेल्थकार्ट’ भी बाजार में उपलब्ध है।
जेेनेरिक दवा का नहीं कोई सरकारी स्टोर
मेरठ में जेनेरिक दवाओं का कोई सरकारी स्टोर नहीं है, एक प्राइवेट स्टोर कंकरखेड़ा में बताया जा रहा है। ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले जेनेरिक दवाओं से इलाज सस्ता होता है। सरकार अगर ऐसा कोई कानून बनाएगी तो इससे सस्ता इलाज हो सकेगा। सरकारी अस्पतालों में बाहर से दवाए लिखने पर पूरी तरह से प्रतिबंध है। - वीपी सिंह, सीएमओ
कारोबार होगा प्रभावित
मेरठ में रिटेलर और हॉलसेलर मिलाकर करीब 3200 मेडिकल स्टोर केलाइसेंस हैं। साढ़े तीन सौ तो खैरनगर में ही हैं। शहर में हर रोज तकरीबन तीन करोड़ से ज्यादा का दवा कारोबार होता है। महीने में यह एक अरब केआसपास पहुंच जाता है। जेनेरिक दवाएं आने से कारोबार काफी कम हो जाएगा। - रजनीश कौशल, महामंत्री, मेरठ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन
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विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि यदि डॉक्टर मरीज को जेनेरिक दवाइयों की सलाह देने लगें तो सिर्फ धनी देशों में चिकित्सा व्यय पर 70 प्रतिशत तक कमी आ जाएगी। गरीब देशों के चिकित्सा व्यय में यह कमी और भी ज्यादा होगी। कई बार तो ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं की कीमतों में 90 प्रतिशत तक फर्क होता है। जेनेरिक दवाएं बिना किसी पेटेंट के बनाई और वितरित की जाती हैं। जेनेरिक दवा के फॉर्मुलेशन पर पेटेंट हो सकता है, लेकिन उसकी सामग्री पर पेटेंट नहीं हो सकता। जानकार बताते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय मानकों से बनी जेनेरिक दवाइयों की गुणवत्ता ब्रांडेड दवाइयों से कम नहीं होती। यह भी उतना ही असर करती हैं जितनी ब्रांडेड दवाएं। जेनेरिक दवाइयों को बाजार में लाने का लाइसेंस मिलने से पहले गुणवत्ता मानकों की सभी सख्त प्रक्रियाओं से गुजरना होता है। इन दवाओं के प्रचार-प्रसार पर कंपनियां कुछ खर्च नहीं करतीं। दूसरी तरफ, दवा कंपनियां ब्रांडेड दवा से बड़ा मुनाफा कमाती हैं। यही वजह है कि डॉक्टर जेनेरिक दवाएं लिखते ही नहीं और ब्रांडेड दवाओं का कारोबार दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।
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ये होता है अंतर
अगर ब्रांडेड दवा की 14 गोलियों का एक पत्ता 786 रुपये का है, तो एक गोली की कीमत करीब 56 रुपये हुई। इसी सॉल्ट की जेनेरिक दवा की 10 गोलियों का पत्ता सिर्फ 59 रुपये में ही उपलब्ध हो जाएगा। इसकी एक गोली करीब 6 रुपये में पड़ेगी। वहीं किडनी, यूरिन, बर्न, दिल संबंधी रोग, न्यूरोलॉजी डायबिटीज जैसे बीमारियों में ब्रांडेड और जेनेरिक दवा की कीमत में बहुत ज्यादा अंतर देखने को मिलता है।
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ये होती हैं जेनेरिक दवाएं
किसी एक बीमारी के लिए तमाम शोधों के बाद एक रासायनिक यौगिक को विशेष दवा के रूप में देने की संस्तुति की जाती है। इस यौगिक को अलग-अलग कंपनियां अलग-अलग नामों से बेचती हैं। जेनेरिक दवाइयों का नाम उसमें उपस्थित सक्रिय यौगिक के नाम केआधार पर एक विशेषज्ञ समिति निर्धारित करती है। किसी भी दवा का जेनेरिक नाम पूरे विश्व में एक ही होता है। आपकी किसी भी बीमारी के लिए डॉक्टर जो दवा लिखते हैं, उसी दवा केसॉल्ट वाली जेनेरिक दवाएं उससे काफी कम कीमत पर आपको मिल सकती हैं। जेनेरिक दवाएं उत्पादक से सीधे रिटेलर तक पहुंचती हैं। कीमत का यह अंतर पांच से दस गुना तक हो सकता है। ज्यादातर कंपनियां ब्रांडेड के साथ-साथ कम कीमत वाली जेनेरिक दवाएं भी बनाती हैं।
मोबाइल एप से पता करें कीमत का अंतर
ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं की कीमत में अंतर का पता लगाने केलिए एक मोबाइल एप ‘समाधान और हेल्थकार्ट’ भी बाजार में उपलब्ध है।
जेेनेरिक दवा का नहीं कोई सरकारी स्टोर
मेरठ में जेनेरिक दवाओं का कोई सरकारी स्टोर नहीं है, एक प्राइवेट स्टोर कंकरखेड़ा में बताया जा रहा है। ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले जेनेरिक दवाओं से इलाज सस्ता होता है। सरकार अगर ऐसा कोई कानून बनाएगी तो इससे सस्ता इलाज हो सकेगा। सरकारी अस्पतालों में बाहर से दवाए लिखने पर पूरी तरह से प्रतिबंध है। - वीपी सिंह, सीएमओ
कारोबार होगा प्रभावित
मेरठ में रिटेलर और हॉलसेलर मिलाकर करीब 3200 मेडिकल स्टोर केलाइसेंस हैं। साढ़े तीन सौ तो खैरनगर में ही हैं। शहर में हर रोज तकरीबन तीन करोड़ से ज्यादा का दवा कारोबार होता है। महीने में यह एक अरब केआसपास पहुंच जाता है। जेनेरिक दवाएं आने से कारोबार काफी कम हो जाएगा। - रजनीश कौशल, महामंत्री, मेरठ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन